सुश्रुत संहिता
Sushruta Samhita
महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)
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सुश्रुतसंहिता
[ अ० ७ ]
उपचार-व्रण शोध एवं व्रण के समान ही किये जाते हैं ॥४२॥
इवश्रृगात्तरवृक्षस्याप्रादीनां यदाऽनिलः ।
श्लेष्मप्रदुष्टो मुष्णाति संज्ञां संज्ञावहाश्रितः ॥४३॥
तदा प्रसस्तलाङ्गलहनुस्तुक्ण्धोऽतिलालवान् ।
अत्यर्थबधिरोऽन्धश्च सोऽन्योन्यमभिधावति ॥४४॥
तेनोन्मत्तेन दृष्टस्य दंष्ट्रिणा सविषेष तु ।
सुप्तता जायते दंशे कृष्णं चातिष्ठवत्यसूक् ॥४५॥
दिग्धविद्वस्य लिङ्गेन प्रायशश्चोपलक्षितः ।
कुत्ता, गीदड़, तरलु (लकड़ मकड़), रीछ, व्याघ्र आदि में कफ से दूषित बायु जब संज्ञावह लोता का आश्रय करके सत्रा को नष्ट कर देती है, तब पशुकी पूँछ, हनु और कन्धे बहुत ठीले हो जाते हैं (उसका इनपर वश नहीं रहता), मुख से बहुत लाला बहती है, पशु अन्धा, बहरा हो जाता है, वह एक दूसरे की ओर भागता है। उस पागल विषवाले, दंष्ट्रि पशु के काटने से दंश में सुप्तता (बे भान पन) आ जाती है, और काले रंग का रक्त बहुत बहता है। प्रायः करके विषयुक्त शस्त्र से मारे के समान लक्षण उत्पन्न होते हैं।
वि० मन्तव्य—कुत्ता, सियार आदि उन्मत्त-पागल हो जाते हैं, यह उन्हीं का वर्णन है। “अत्यन्तबधिरोऽन्धश्च” के स्थान में “अन्यत्कबधिरान्धश्च” पाठान्तर है, और यही समीचीन भी है क्योंकि—उन्मत्त कुत्ता पूर्णरूप से न बधिर ही होता है और न अन्ध ही होता है, कुछ २ कभी २ सुनता भी है, हल्का होने पर भाग जाता है, और देखता भी है, लाठी आदि देखकर भाग जाता है। वस्तुतः यह उन्मत्त हो जाता है। ऐसे कुत्ता आदि का विष मानव नहीं पशुओं पर भी प्रभाव डालता है और इस विष से मानव एवं पशु भी उन्मत्त हो जाते हैं और काटने लगते हैं। तथा उन्हीं की सी चेष्टाएँ करने लगते हैं ॥४३-४५॥
यन चापि भवेद्वृष्टस्तस्य चेष्टां स्तं नरः ॥४६॥
बहुशः प्रतिकुर्वान्ः क्रियाहीनो विनश्यति ।
जिस प्राणी से काटा गया हो, यदि उसी प्राणी के समान चेष्टा और शब्द का रोगी बार-बार अनुकरण करता हो, एवं अपनी क्रियायें नष्ट हो गई हों, तो वह मनुष्य मर जाता है ॥४६॥
दंष्ट्रिणा येन दृष्टश्च तद्रूपं यस्तु पश्यति ॥४७॥
अस्यु वा यदि वाऽदृशंऽरिष्टं तस्य विनिर्दिशेत् ।
जिस पशु से मनुष्य काटा गया है, उसी पशु के रूप को यदि रोगी, जल में आईने (दर्पण) में देखता है, उसका अरिष्ट मृत्यु लक्षण समझे (वह मरेगा)।
वि० मन्तव्य—इस दंश के पूर्व यदि चिकित्सा हो जाती है तब कोई विकार नहीं होता ॥४७॥
त्रस्यत्यक्स्माद्योऽभीदणं दृष्ट्वा शृण्ववाऽपि वा जलम् ॥४८॥
जलत्रासं तु विद्यात् रिष्टं तदपि कीर्तितम् ।
जो मनुष्य बिना कारण के सहसा ही जल को देखकर या लूकर डर जाता है, उसको भी रिष्ट-मृत्यु सूचक लक्षण जानना। इस अवस्था को जलत्रास कहते हैं।
वि० मन्तव्य—जलत्रास-पागल कुत्ता आदि द्वारा काटने पर प्रातः जलत्रास हो जाता है। और यह दशा असाध्य है परन्तु यदि वैसे ही जलत्रास हो जाता है तो उसकी चिकित्सा हो सकती है (इल्हणाचार्य) ॥४८॥
अदृष्टो वा जलत्रासी न कथञ्चन सिध्यति ॥४९॥
प्रसुमोऽशोथितो वाऽपि स्वस्थच्छस्तो न सिध्यति ।
अथवा दंष्ट्रि पशु से बिना काटे भी जिसमें जलत्रास के लक्षण उत्पन्न हो जाते हैं, वह भी अच्छा नहीं होता। सोकर पीछे उठने पर जलत्रास हो, या स्वस्थ अवस्था में जलत्रास हो तो वह भी असाध्य है ॥
वक्तव्य—बिना पशु के काटे भी जलत्रास होता है। यथा-बुद्धिस्थानं यदा श्लेष्मा केवलं प्रतिपद्यते। तदा बुद्धौ निरुद्धाय श्लेष्मणाऽधिष्ठितो नरः। जाग्रत् सुप्तोऽथवाऽऽत्मानं मज्जनस्मिन् मन्यते। सलिले त्रस्यति तदा जलत्रासं तु तं विदुः। श्लेष्मज्जं तत्र कर्तव्यं शोषनं शमनानि च ॥ आहारस्य विधानेन यावत् प्रकृतिं व्रजेत् ॥४९॥
दंशं विज्ञान्य तैर्वृष्टे सर्पिषा परिदाहितम् ॥५०॥
प्रदिद्यादगदैः सर्पिः पुराणं पाययेत् च ।
अर्कक्षीरयुक्तं ह्रास्य दद्याच्छूचपि विशेषधनम् ॥५१॥
श्वेतां पुनर्नवां चास्य दद्याद्धूतूरकायुताम् ।
पल्ललं तिलतैलं च रूपिकायाः पयो गुडः ॥५२॥
निहन्ति विषमालकं मेघबुन्दस्मिवातिलः ।
इन पशुओं के काटने पर दंश को दबाकर रक्त निकालकर घी से जलाये। अगरदों से दंश पर लेप करे और पुराना घूँट पिलाये। आक के दूध से मिला विरेचन इसको देवे। चूर्दरे के साथ श्वेत कोयला और पुनर्नवा को दे। पल्लल (तिलकल्क), तिल तैल और आक का दूध, गुड इनको दे। यह पागल जानवरों के विष को ऐसे नष्ट करती है, जैसे कि वायु, बादलों को नष्ट करता है।
वक्तव्य—घूत स्नेह से गहराई में दाह होता है। यथा—अग्निवसंतो हि स्नेहः सूक्ष्मसिरानुषारिवाद् त्वगादीनुप्रविश्य आगु दहति। तस्मात् स्नेहदग्धोऽधिकारुजो भवति ॥५०॥
वि० मन्तव्य—दृष्टस्थान पर तत्काल लाल मरिच अथवा काठी मिरच पीसकर लेप करे। इससे दो लाभ होते हैं १—पता चल जाता है कि काटनेवाला कुत्ता आदि उन्मत्त है या अथवा नहीं क्योंकि उन्मत्त द्वारा काटने पर दृष्ट स्थान से