सुश्रुत संहिता
Sushruta Samhita
महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)
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कल्पस्थानम्
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सुप्ता अर्थात् शय्यता हो जाती है (श्लो० ४५) फलतः मरिच की तीक्ष्णता का अनुभव होता है। इस दशा में तत्काल उचित चिकित्सा में तत्पर हो जाना चाहिये। २—मरिच उच्चकोटि का विषनाशक अतः प्रारम्भिक उपचार हो जाता है ॥५०-५२॥
मूलस्य शरपुङ्गवाः कर्ष धन्वुराधिकम् ॥५३॥
तण्डुलोदकमादाय पेययेत्तण्डुलेः सह।
उन्मत्तकस्य पत्रैस्तु सचेष्टयापूपकं पचेत् ॥५४॥
खादेदौषधकाले तमलर्कविषद्विषितः।
करोति श्वविकारांस्तु तस्मिन्नीयति चौषधे ॥५५॥
विकाराः शिगिरे याप्या गृहे वारिविबर्जिते।
ततः शान्तविकारस्तु स्नात्वा चैवापरेऽहनि ॥५६॥
शालिषष्टिकयोर्भक्तं क्षोरेणोष्णेन भोजयेत्।
दिनत्रये पञ्चमे वा विधिरेषोऽसमात्रया ॥५७॥
कर्तव्यो भिषजाऽवश्यमलर्कविषनाशनः।
कृप्येत् स्वयं विषं यश्य न स जीवति मानवः ॥५८॥
तस्मात् प्रकोपयेदाशु स्वयं यावत् प्रकृप्यति।
शरपुंवा का मूल एक कर्ष, धन्वुरा आधा कर्ष, इनको चावलों के पानी के साथ चावलों के साथ ही देवे। इसको धन्वुर के पत्तों में पिड़ी की तरह भरकर अपूर (कचौरी) बनाये। इनको पागल पशु के विष से दूषित मनुष्य औषधि के समय में खाये। इस औषधि के पचने पर मनुष्य उन्मत्त कुत्ते की भाँति चेष्टाय करता है। पानी रहित शीतल घर में रोगी को ले जाने से विकार शान्त हो जाते हैं। विकार के शान्त हो जाने पर स्नान कराके दूसरे दिन शाली और साँठी के भात को गरम दूध से खाने को देवे। तीसरे दिन या पाँचवें दिन यही विधि आधी मात्रा में बरते। पागल कुत्ते आदि के विष को नष्ट करने के लिये यह विधि अवश्य वैद्य को करनी चाहिये। जिस मनुष्य में विष स्वयं कुपित हो जाता है, वह नहीं बचता। वह स्वयं कुपित हो, इससे पहिले उस विष को वैद्य कुपित करे। (धन्वुरा खिलाकर रोगी को धूप में रखते हैं, जिससे जल्दी प्रभाव हो)।
वि० मन्तव्य—धन्वुर के बीज एवं पत्र के प्रयोग से उन्माद हो जाता है और 'विषस्य विषं औषधं' के अनुसार जंगम विष में स्थावर विष औषध है जो विषम के प्रभाव को नष्ट कर देता है। विकाराः—विवर्जिते—रोगी के विकारों का थापन (शमन के लिये प्रतीक्षा) ऐसे घर में—स्थान में करनी चाहिये जो शीतल हो परन्तु वहाँ जल न हो अर्थात् वह जल द्वारा शीतल न किया गया हो। हम देखते हैं कि कुत्ते की विष की शान्ति के लिये जो २ अस्पताल बने हैं वे सब ऐसे स्थानों पर बनाए गये हैं, जहाँ जल की अधिकता नहीं है, परन्तु शीतल हैं, यथा—शिमला के पास कुसोली पर्वत। यह
ऊँचा है, शीतल है, परन्तु वहाँ जल के झरने नहीं हैं। पाठक ध्यान से देखें कि ये स्थान भगवान् धन्वन्तरि के उपदेशानुसार चुने गये हैं ॥५३-५८॥
बीजरत्नौषधीगर्भः कुम्भैः शोताम्वुपूरितैः ॥५९॥
स्नापयेत्तं नदीतीरे समन्त्रैर्वा चतुष्यथे।
बलि निवेश तत्रापि पिण्याकं पल्लवं दधि ॥६०॥
माल्यानि च विचित्राणि मांसं पकामकं तथा।
अलकाधिपते यक्ष सारमेयगणाधिप ॥६१॥
अलर्कजुष्टमेतन्मे निर्विषं कुरु माचिरात्।
बीज (तिलादि), रत्न, औषधि इनको जलपात्रों में डालकर इनको शीतल जल से भरकर पागल पशु से काटे मनुष्य को नदी के किनारे या चौराहे पर नहलाये। वहाँ पर तिलखल, तिलकरूक, दही की बलि देकर, नाना प्रकार की मालाएँ, कच्चे एवं पके मांस की बलि देवे। हे अलकाधिपति यक्ष, सारमेयगण के राजा! पागल कुत्ते से काटे हुए मुझको शीघ्र निर्विष करो ॥५९-६१॥
दद्यात् संशोधनं तीक्ष्णमेवं स्नातस्य देहितः ॥६२॥
अशुद्धस्य सुरुढेऽपि त्रणे कुप्यति तद्विषम्।
इस प्रकार स्नान किये व्यक्ति को तीक्ष्ण संशोधन देवे। क्योंकि अशुद्ध व्यक्ति में त्रण के भर जाने पर भी विष कुपित हो जाता है ॥६२॥
श्रादयोऽभिहिता न्याला येऽत्र दृष्ट्वाविषा मया ॥६३॥
अतः करोति दृष्टस्तु तेषां चेष्टां रूतं नरः।
बहुशः प्रतिकुर्वाणोन्चिरान्निग्रयेत् च सः ॥६४॥
यहाँ पर कुत्ते आदि दृष्ट्वाविषवाले जो हिंसक पशु मैंने कहे हैं, उनसे काटा हुआ मनुष्य उनके समान ही चेष्टा और शब्द को करता है। जो बार-बार इनका अनुकरण करता है, वह शीघ्र ही मर जाता है ॥६३,६४॥
नखदन्तक्षतं न्यालैर्येक्तुं तद्विषमर्दयेत्।
सिञ्चैत्तेलेन कोष्णेन ते हि वातप्रकोपाः ॥६५॥
हिंसक पशुओं के नख या दाँतों से जो क्षत बना हो, उसको मल देवे, और गरम सुहाते तेल से सेक करे। क्योंकि ये नख और दाँत वायु को प्रकुपित करते हैं।
वि० मन्तव्य—प्रकृतिस्थ—स्वस्थ—सिंह, बानर आदि के नख एवं दन्त के क्षत में विसर्प अर्थात् क्षतज विसर्प हो जाता है। सींग का क्षत भी नखक्षत के समान समझना चाहिये ॥६५॥
इति सुश्रुतसंहितायां कल्पस्थाने मूषिककल्पे
नाम सप्तमोऽध्यायः ॥७॥