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भारतकोश
सुश्रुत संहिता

सुश्रुत संहिता

Sushruta Samhita

महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished872 पृष्ठ

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पृष्ठ 646

‰€० सुश्रतसंहिता

~ अषमाव्वार्यः

अथातः कोटकस्पं व्याख्यास्यामः ॥१॥ यथोवाच भगवान्‌ धन्वन्तरिः ॥२॥ अव्र इसके आगे कौटकल्प का व्याख्यान करंगे-जेखा

कि भगवान्‌ धन्वन्तरि ने कहा था ।

वि° मन्तव्य--कीट-छोटे २ कीड़े इनके नाम तथा इनके

द्वारा काटने पर होनेवाछे विकार एवं उनको चिकित्छा इस अध्याय में वर्णित है ।१,२॥ सपोणां ज्॒छविण्मूत्र्वपूत्यण्डसंभवाः।

वाय्वग्न्यम्बुप्रकृतयः कीरास्तु विविधाः स्ताः ॥३॥

सवंदोषभ्रकृतिभियुंक्तास्ते परिणामतः

कोरटसत्वेऽपि सुघोराः स्युः सवं एव चतुर्विधाः ॥४॥

खापों के शुक्र मल-मूच-शव के सड़ने से तथा अण्डोँसे

उत्पन्न होनेवाठे, वायु-अग्नि (पित्त), अम्बु (कफ) कौ प्रकृति

के कीर नाना प्रकारके कहे हँ । परिणाम से ये कीट सव

दोर्घो की ग्रकृति से युक्त होते हं । कीट होने पर मी (छे

तुच्छ होने पर भी) ये अति भयानक होते, ये चार प्रकार के हे ॥२,४॥।

कुम्भीनसस्तुण्डिकेरी श्ंगी यतछुटीरकः। उचिटिङ्घोऽग्निनामा च चिच्चिटिगो मयूरिक्ा ॥५॥

आवतेकस्तथोरभः सारिकामुखवेदलो ।

शरावञ्र्दोऽमीराजिः परषिश्िचश्चीषकः ॥६॥ उतवाहुख यश्चापि रक्तराजिश्च को्तितः

अष्टादशेति वायन्याः कोटराः पवनकोपनाः ॥७॥ तेमवन्तोह्‌ दष्टानां योगा बातनिमित्तजाः।

कम्भीनख, वण्डोकेरी, शङ्धी, शतकुखीरक, उच्चिरिग

अग्निनामा, चिच्चिटिग, मयूरिका, आवत्तक, उरभ्र, सारिका,

मुखबदली, शरावकुद, अभिराजि, परुष, चित्रशीधक, तबाह,

रक्तराजी, ये अठारह, कोट वात स्वभावके हे, वायु को

कुपित करते हं । इनके काटने से वातजन्य रोग होते हे ॥५ ७.

छक, वर्ध, किटिभ, सूतच्तीद्ख, कृष्णगोधा, काषायवासिकं गदभक, चोरक, ये तेरह कीट सौम्य एवं कफ़ प्रकोपक है | ,

नके काटने से कफजन्य रोग होते ह ॥ १२-१४॥ |

मण्डलपुच्छकः, तुण्डनाभ, सखषपिका, वल्गकि, शम्बूके, अग्न

कीटये बारह प्राण नाद्यक द| इनके काटने पर सोरपोकी

माति वेग होते है। उखी प्रकारक वेदनायं होती दैः ओए

ये सन्निपात के लक्षण उसन्न करते दे। इनका दंश क्षारया

अग्निसे जलने की माँति-खार, पीठा, श्वेत या काला होता ६॥

{| ञ्वरांगमदरोमाश्चवेदनाभिः समन्वितः ।

विश्वम्भरः पच्चशुक्छः पत्चकृष्णोऽथ कोकिंरः | ॥१२॥ अ* |

सेरेयकः प्रचर्कछो वृर्भः किटिसस्तथा । सुचः छृष्णगोधा यश्च काषायवासिकः ॥१३॥ `

कोटो गदेभकश्चेव तथा त्रोरक्‌ एव च । त्रयोदशेते सोम्याः स्युः कीटः रटेष्मप्रकोपणाः ॥१४॥||

तेभवन्तीह्‌ दष्टानां रोगाः कुनिमित्तजाः |

विश्वम्भरः, पञ्चक, _पञ्चङृष्ण, कोकिल, सैरेयक, प्रच

तुंगीनासो विचिखकस्ताखको वाहकस्तथा ॥१५॥ कोश्ठागारी कृमिकयो यङच सण्डलपुच्छकः

तुण्ड (ङः) नाथः सषेपिको वल्गु लिः शम्बुकस्तथा १६

अग्निकोरश्च विज्ञेया द्वाद प्राणनाशनाः। तेभवन्तीह दष्टानां बेगज्ञानानि सपेवत्‌ ॥१५॥

तास्ताश्च वेदनास्तोना सेगा वे सान्निपातिकाः। क्षाराग्निदग्धवहशो रक्तपीतसितारुणः ॥१८॥

तुगीनाख, विचिखुक, कारक, वादक, कोष्ठ।ग[री, कृमिकर, ।


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छयतीसारतृष्णाश्च दाहो मूच्छा विजम्भिका ॥९९॥

वेपथुश्वासहिक्काश्च दाहः सीत्त च दारुणम्‌ । पिडकोपचयः ओष भ्रन्थयो मण्डलानि च ॥२०॥

द्द्रवः कर्णिकाश्चेव बिसपाः किटमानि च ।

तेभेवन्तीह दष्टानां यथास्वं चाप्युपद्रवाः ॥२१॥

- ~नि 2. ~ == नकन ये ~~ ऋक

- गव दन र

बराह्मणिका, विन्दुक, भ्रमर, बाह्मणिका, विच्चट, कुम्भी, वचः

कीट, अरिमेदक, पद्यकीट

पञ्चाटक) पाकमत्स्य, ङष्णवुण्ड, गदभी, कीत, कृमिखारी, `

उत्क्छेशक, ये चोवीस कौर)पित्तपरकृति के हैँ । इनके काटने

` भे पित्तप्रकोपजन्य रोग होते ई ।=-१२॥ |

कोण्डिन्यकः कृणभको वरटी पवृश्चिकः ॥८॥

विनासिका ्ाद्यणिका बिन्दलो अमरस्तथा ।

वाह्यकी पिच्चिटः छुम्भी वचःकीटोऽरिमेदकः ॥€॥ पद्यकीरोदुन्दुभिको मकरः सतपादकः।

पश्चाटकः पाकमत्स्यः कृष्णतुण्डोऽथ गद्भी ॥१५॥

क्टीतः कृमिसरारी च यश्चाप्युक्छेशक्स्तथा। ` एते ह्यग्निप्रकृतयश्चतुर्विंशतिरेव च ॥११॥

` तेभवन्तीह दष्टानां रोगाः पित्तनिमित्तजाः।

कौण्डिन्य, कंणमक, वरटी, पत्नद्रश्चिक, विनासिका

दुन्दुभिक), मकर, शतपादक

येऽन्ये तेषां विशेषास्तु तूण तेषां समादिशेत्‌ । दूषो विभ्रकोपाच्च तथेव विषङेपनात्‌ ॥२२॥

छग तोद्णविषेष्वेतत्‌

इन काटा के तीच्ण विष मे--उ्वर अङ्गां का टध्न।

रोमांच; वेदनाओं के कारण छदि, अतिसार व्रष्णः; द&

मृच्छां, जम्भाई आना, कम्पन, श्वास, हिक्का, दाहः अति शीत, पिड़काओं की बृद्धि, शोफ, गड) मण्डल, दढ!

काय, बिसपं, किटिभ, इनके काटने से दषो के अपन,

उपद्रव होते द ओर जो अन्य उपद्रव हँ, उनके मेदी $ |

इसी विष के लक्षणों से, विषके आहार से, तीच्ण

लक्षण जाने । वि° मन्तव्य--ये चान्ये--उक्त उपद्रवं क “जवो | जो अन्य उपद्रव हो जाते ह अथवा हौ ज

चिकित्सक शीभ्र जान केव तथा रोगी बतला देवे ओ ध |

„1 कीटो मे डुक दूषीबिषवारे कीट भी ` हँ (उकं (५८ ।

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