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भारतकोश
सुश्रुत संहिता

सुश्रुत संहिता

Sushruta Samhita

महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished872 पृष्ठ

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पृष्ठ 647

अ० ८

कल्पस्थानम्

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अमुककाल आदि में प्रकोप होने पर उक्त उपद्रव हो जाते हैं तथा विषैले कीटों का लेप करने पर भी उपद्रव हो जाते हैं जैसे शिरन पर लेप लगाने आदि से शूकदोष हो जाते हैं। परन्तु उक्त ज्वर, अङ्गमर्द आदि लक्षण तीक्ष्ण विषवाले कीटों से उत्पन्न होते हैं और मन्द विषवाले कीटों के विष से उत्पन्न होनेवाले लक्षण नीचे श्लो० २३ में देखिये ॥१६-२२॥

च्छृणु सन्दविषैष्वतः।

प्रसेकारोऽवकच्छद्विशिरोगौरवगोतकाः ॥२३॥

पिडकाकोठकण्डूनां जन्म दोषविभागतः।

मन्द विषों को अब सुनो—मुख से लाळाबाब, अरोचक, वमन, घिर में भारीपन, शीत की न्यूनता, पिडका, कोठ, कण्डू की उत्पत्ति यह लक्षण कीटों के दोषों के अनुसार होते हैं ॥२३॥

योगैर्नानाविधरेषां चूर्णाणि गरमादिशेत् ॥२४॥

दूषीविषप्रकाराणां तथा चाप्यनुलेपनात्।

इन कीटों के नानाप्रकार के योगों से बने हुए चूर्णों को गर कहना चाहिये। इसी प्रकार दूषीविष की भाँति लेप करने से भी इनसे गर विष उत्पन्न होता है।

वि० मन्तव्य—जैसे केसुआ, वीरबहूटी, रेगमाही ( बालू में रहनेवाली मछली एवं साँढा आदि प्राणियों का प्रयोग )—यूनानी चिकित्सानुसार योगों—लेपन एवं खाद्य योगों में किया जाता है वैसे ही यदि उक्त विषैले कृमियों का प्रयोग करने पर विष जनित उपद्रव उत्पन्न हो जाते हैं और वह “गर विष” कहलाता है ॥२४॥

एकजातीनतस्तुर्ध्वं कीटान् वक्ष्यामि भेदतः ॥२५॥

सामान्यतो दृष्टिल्लैः साध्यसाध्यकमेव च।

त्रिकण्टः करिणी चापि हस्तिकक्षोऽपराजितः ॥

चत्वार एते कणभा न्याख्यातास्तीव्रवेदनाः ॥२६॥

तैर्वृष्टस्य श्वयशुरङ्गमर्दो गुरुता गात्राणां दंशः कृणश्च भवति ॥२७॥

इसके आगे एक जातिवाले कीटों को सामान्य भेदों, काटने के लक्षणों से, साथ असाध्य की दृष्टि से कहूँगा। त्रिकण्ट, करिणी, हस्तिकक्ष, अपराजित, ये चार कणभ हैं, इनसे तीव्र वेदना होती है। इनके काटने पर शोथ, अङ्गों का द्रव्घ्ना, अङ्गों में भारीपन और दंशस्थान काला होता है ॥२५-२७॥

प्रतिसूर्यकः, पिङ्गाभासो, बहुवर्णो, निरूपमो गोधेरक इति पञ्च गोधेरकाः; तैर्वृष्टस्य शोफो दाहुरजी च भवतः, गोधेरकेणैतदेव प्रनियम्रादुर्भावो ज्वरश्च ॥२८॥

प्रतिसूर्यक, पिङ्गाभास, बहुवर्ण, निरूपम, गोधेरक ये पाँच गोधेरक हैं। इनके काटने से शोफ, दाह और पीड़ा होती है, गोधेरक से इन लक्षणों के साथ ज्वर और प्रनियमों भी उत्पन्न होती हैं ॥२८॥

गलगोली-श्वेता, कृष्णा, रक्तराजी, रक्तमण्डला, सर्वश्वेता, सर्पपिकेत्येवं षट्। ताभिर्दृष्टे सर्पपिकावज

दाहशोफकलेदा भवन्ति, सर्पपिकया हृदयपीडाऽतिसारश्च, तासु मध्ये सर्पपिका प्राणहरी ॥२९॥

गलगोलिका—श्वेता, कृष्णा, रक्तराजी, रक्तमण्डला सर्वश्वेता, सर्पपिका ये छै हैं। इनके काटने पर सर्पपिका को छोड़कर दाह, सूजन और क्लेद होता है। सर्पपिका से हृदय में पीड़ा और अतिसार होता है। इनके मध्य में सर्पपिका प्राणनाशक है ॥२९॥

अतपद्यस्तु-परुषा, कृष्णा, चित्रा, कपिला, पीतिका, रक्ता, श्वेता, अग्निप्रभा इत्यष्टौ, ताभिर्दृष्टे शोफो वेदना दाहश्च हृदये, श्वेताग्निप्रभाभ्यामेतदेव, दाहो मूर्च्छां चातिमात्रं श्वेतपिडकोत्पत्तिश्च ॥३०॥

शतपदी ( गोजर ) पक्ष, कृष्ण, चित्रा, कपिला, पीतिका, रक्ता, श्वेता, अग्निप्रभा, ये आठ प्रकार की हैं। इनके काटने पर शोफ, वेदना, और हृदय में दाह होता है। श्वेता और अग्निप्रभा से दाह और मूर्च्छा इन लक्षणों के साथ विशेष रूप में होते हैं और श्वेत पिडकायें उत्पन्न होती हैं ॥३०॥

मण्डूकाः—कृष्णः, सारः, कुहको, हरितो, रक्तो, यववर्णाभो, भृकुटी, कोटिकश्चेत्यष्टौ, तैर्वृष्टस्य दंशे कण्डु भैवति पीतफेनागमश्च वक्रन्ता भृकुटीकोटिकाभ्यामेतदेव दाहश्चद्विर्भूच्छां चातिमात्रम् ॥३१॥

मण्डूक ( मेण्डक ) कृष्ण, सार, कुहक, हरित, रक्त, यववर्णाभ, भृकुटी, कोटिक ये आठ हैं। इनके काटने पर दंश में कण्डु होती है, पीछे रंग की झग मुख से आती है। भृकुटी और कोटिक से इन लक्षणों के साथ दाह, वमन और मूर्च्छा अधिक मात्रा में होती है ॥३१॥

विश्वम्भरामिर्दृष्टे दंशः सर्पपाकारामिः पिडकामिः सरुजाभिरचीयते, शीतज्वरातीक्ष्ण पुरुषो भवति ॥३२॥

विश्वम्भराम के काटने पर दंश सरसों के आकार की एवं वेदना करनेवाली पिडकाओं से भरा होता है। रोगी को शीत पूर्वक ज्वर आता है ॥३२॥

अहिण्डुकाभिर्दृष्टे तोददाहकण्डुश्वयश्वो भवन्ति सोहन्न, कण्डुमकाभिर्दृष्टे पीताङ्गरुखीतीसारज्वरादिभिरभिहन्त्यते, शूकघ्नताभिर्दृष्टे कण्डकोटाः प्रवर्धन्ते शूकं चान्न लक्ष्यते ॥३३॥

अहिण्डुका के काटने पर तोद, दाह, कण्डु, श्वयश्व और मूर्च्छा होती है। कण्डुमका के काटने पर रोगी के अङ्ग पीछे पड़ जाते हैं, वमन, अतिसार, ज्वर आदि के कारण रोगी मर जाता है। शूक घ्नत के काटने पर कण्डु और कोठ बढ़ते हैं, और दंश स्थान पर शूक ( डंक ) दिखाई देता है ॥३३॥

पिपीलिकाः—स्थूलशीर्षा, संवाहिका, ब्राह्मणिका, अकुलिका, कपिलिका, चित्रवर्णति षट्, ताभिर्दृष्टे दंशे श्वयशुरग्निसर्पशंवादाहशोफो भवतः ॥३४॥