सुश्रुत संहिता
Sushruta Samhita
महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)
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मुश्रुतसंहिता
[ ३०८ ]
पिपिलिका ( चिऊटियाँ )—स्थूलशीर्षा, संवाहिका, ब्राह्मणिका, अङ्गुलिका, कपिलिका और चित्रवर्णा ये लै हैं। इनके काटने पर दंश में शोथ एवं अग्नि से जलने की भाँति दाह और शोफ होता है ॥३५॥
मक्षिकाः—कान्तारिका, कृष्णा, पिङ्गला, मधूलिका, काषायी, स्थालिकेत्येवं षट्, तामिर्दृष्टस्य कण्डुशोफदाहसृजो भवन्ति, स्थालिकाकाषायीभ्यामेतदेव श्यावपिडकोत्पत्तिरुपद्रवाश्च ज्वरादयो भवन्ति, काषायी स्थालिका च प्राणहरे ॥३५॥
मखिखर्या—कान्तारिका, कृष्णा, पिंगला, मधूलिका, कषायी, स्थालिका ये लै हैं। इनके काटने पर कण्डु, शोफ, दाह, वेदना होती हैं। स्थालिका और काषायी से इन लक्षणों के साथ में श्याम पिङ्काओं की उत्पत्ति और ज्वर आदि उपद्रव होते हैं। काषायी और स्थालिका ये दोनों प्राणनाशक हैं ॥३५॥
मशकाः—सामुद्रः, परिमण्डलो, हस्तिमशकः, कृष्णः पार्वतीय इति पञ्च, तैर्दृष्टस्य तीव्रा कण्डूर् शशोफश्च, पार्वतीयस्तु कीटैः प्राणहरेस्तुल्यलक्षणः ॥३६॥
मशक—सामुद्र, परिमण्डल, हस्तिमशक, कृष्ण, पार्वतीय ये पाँच हैं। इनके काटने पर तीव्र कण्डु और दंश में सूजन होती हैं। पार्वतीय मशक ( पर्वत के मच्छर ) प्राणहर कीटों के समान लक्षणवाले होते हैं ॥३६॥
नखावकुट्टेऽत्यर्थे पिङ्कादाहपाका भवन्ति। जलौकसां दृष्टलक्षणमुक्तं चिकित्सितं च ॥३७॥
नख से घुसट देने पर अतिशय दाह, पाक, पिङ्कायें होती हैं। जोंक के काटने के लक्षण और चिकित्सा सूत्र स्थान में कह दी हैं ॥३७॥
भवन्ति चात्र— गोघेरकः स्थालिका च ये च श्वेताग्निनसप्रभे ।
भुक्तुं कोटिकश्चैव न सिध्यन्त्येकजातिषु ॥३८॥
इसमें श्लोक भी हैं—एक जाति कीटों में गोघेरक, स्थालिका, श्वेता, अग्निप्रभा, भुक्तुं और कोटिक ये असाध्य हैं ॥ शवमूत्रपुरीषैस्तु सविघैरवमर्जन्तात् ।
स्युः कण्डूदाहकोटाः पिङ्कातोद्वेदनाः ॥३९॥
प्रकलेदवास्तथा खावो भृशं संपाचयेत्त्वचम् ।
दिग्धविद्भक्तियास्तत्र यथावदवचारयेत् ॥४०॥
विपैले शव, मूत्र, मल के स्पर्श से कण्डु, दाह, कोठ अर्ध-पिङ्कायें, पिङ्का, तोद, वेदना, क्लेशोन्नता ( सड़ना ), खावत्वचा का पकना ये लक्षण होते हैं। इसमें विपैले शस्त्र आदि के लगने के समान चिकित्सा करनी चाहिये ॥३९,४०॥
नावसन्नं न चोत्सन्नमतिसरंभवेदनम् ।
दंशादौ विपरीताति कीटदृष्ट सुबाधकम् ॥४१॥
जो दंश न बहुत दबा, न बहुत उभरा, बहुत सुखे या सूजनवाला अति वेदनावाला, दंश के प्रारम्भ में विपरीत पीड़ा-
वाला ( अनुग्र विष दंश में तीव्र पीड़ा का, उपविष दंश में पीड़ा का ) होता है, वह कीट दृष्ट कष्टसाध्य होता है ॥४१॥
दृष्टानुग्रविषैः कीटः सर्पेवत् समुपाचरेत् ।
विविधानां तु पूर्वेषां त्रैविध्येन क्रिया हितः ॥४२॥
उपविषवाले कीटों के काटने पर सर्प विष की भाँति चिकित्सा करे। दर्वाकर, मण्डलि, राजिमान् की शुक्रादि योनि भेद से पूर्वोक्त तीन प्रकार के कीटों की चिकित्सा वातादि भेद से करे ॥४२॥
श्वेदमालेपनं सेकं चोष्णमन्नावचारयेत् ।
अन्यत्र मूर्च्छिताहं शान्तं पाककोथप्रपौडितात् ॥४३॥
विषक्तं च विधिं सर्वं बहुशः शोधनानि च ।
श्वेदन, आलेपन और सेक ये उष्ण ही इनमें बरते।
मूर्च्छावस्था में, दंश के पकने सड़ने में केवल शीतल श्वेदन, आलेप, परिषेक करे। सम्पूर्णविषनाशक विधि बरते, और बार-बार शोधन देवे ॥४३॥
शिरोषकटुकाकुष्ठवचारजनिसैन्यैः ॥४४॥
क्षीरमञ्जवसासपिः शुण्ठीपिप्पलिदारुषु ।
उत्कारिका स्थिरादौ वा सुकृता श्वेदनं हितः ॥४५॥
शिरीष, कुटकी, कूठ, हल्दी, सेन्धव, दूध, मञ्जा, वसा, घो, सोंत, पिप्पली, दारुहल्दी इनसे अथवा शालिपर्णी आदि लघुपंचमूल से बनाई उत्कारिका ( पुलटिस-लपसी सी ) श्वेदन में उत्तम है ॥४४, ४५॥
न श्वेदयेत् चादंशं धूमं वक्ष्यामि वृश्चिके ।
वृश्चिक के दंश में श्वेदन नहीं करे, अपितु आगे कहा धूम देवे।
अगदानेकजातीषु प्रवक्ष्यामि पृथक् पृथक् ॥४६॥
एक जातिवाले कीटों के लिये पृथक् पृथक् अगदों को कहता हूँ ॥४६॥
कुष्ठं वक्रं वचा पाठा विल्वमूलं सुवर्चिका ।
गृहधूमं हरिद्रं द्वे त्रिकण्टकविषे हितः ॥४७॥
कूठ, तगर, वच, पाठा, विल्वमूल, हुल्ल-हुल्ल, घर का धुँवासा, हल्दी, दारुहल्दी, यह त्रिकण्टकविष में उत्तम है। ( सुवर्चिका-स्वर्जिका क्षार, डल्हण ) ॥४७॥
रजन्त्यागारधूमश्च वक्रं कुष्ठं पलाशजम् ।
गलगोलिकदृष्टानासगदो विषनाशनः ॥४८॥
हल्दी, घर का धुँवासा, तगर, कूठ, दाक के बीज, यह अगद गलगोलिका के विष को नष्ट करता है ॥४८॥
कुडुर्मं तगरं शिम्बु पद्मकं रजनीद्रयम् ।
अगदो जलपिष्टोऽयं शतपद्मिषनाशनः ॥४९॥
मेघशुद्धी वचा पाठा निचुलो रोहिणी जलम् ।
सर्वमण्डूकदृष्टानासगदोऽयं विषापहः ॥५०॥
केसर, तगर, सहजन, पद्माल, हल्दी, दारुहल्दी, इनकी जल से पीसकर बनाया यह अगद शतपद ( कान खजुरा ) के विष