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भारतकोश
सुश्रुत संहिता

सुश्रुत संहिता

Sushruta Samhita

महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished872 पृष्ठ

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अ० ८ ] ७२ कल्पस्थानम्

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को नष्ट करता है । मेदासिणी, वच, पाठा, जलवेतस, कुटकी, वालक, यह अगद सब मण्डुओं के विष को नष्ट करता है ॥ धवाश्वगन्धातिबलाबलासातिगुहागुहा । विश्वम्भराभिदण्डानामगदोऽयं विषापहः ॥५१॥ धावड़ी, अश्वगन्धा, अतिबला, बला, शालिपर्णी, पुश्पिन्पर्णी, इनसे बना अगद विश्वम्भरा जाति के कीटों के लिये विष नाशक है ॥५१॥

शिरीषं तगरं कुष्ठं शालिपर्णीं सद्वा निशे । अहिण्डुकाभिदण्डानामगदो विषनाशनः ॥५२॥ शिरीष, तगर, कूठ, शालिपर्णी, सुदुरपर्णी, हल्दी, दारुहल्दी, इनका अगद अहिण्डुका जाति के कीटों के लिये विष-नाशक है ॥५२॥

कण्डूमकाभिदण्डानां राज्ञो शीताः क्रिया हिताः । दिवा ते नैव सिध्यन्ति सूर्यरश्मिबलादिताः ॥५३॥ चक्रं कुष्ठमपामार्गः शूकवृन्तविषेऽगदः । भृंगस्वरसपिष्टा वा कुष्णवल्लोकमृत्तिका ॥५४॥ पिपीलिकाभिदण्डानां सखिकामशकैस्तथा । गोमूत्रेण युतो लेपः कुष्णवल्लोकमृत्तिका ॥५५॥ नखावघृष्टसंजाते शोफे भुञ्जरसो हिताः ।

कण्डूमका से काटने पर रात्रि में शीतल उपचार करे । क्योंकि दिन में सूर्य की किरणों से बल पाकर ये अच्छे नहीं होते । तगर, कूठ, चिरचिटा, इनका अगद शूकवृन्त के विष में औषधि है । अथवा बम्बी काली मिट्टी को भांगरे के स्वरस में पीसकर लेप करे । चिकंडी मक्खी और मच्छर के काटने पर बम्बी की काली मिट्टी को गोमूत्र में मिलाकर लेप करे । नख के लगने से उत्पन्न शोथ में भांगरे का रस उत्तम है ॥५३-५५॥

प्रतिसूर्यकदण्डानां सर्पदण्डवदाचरेत् । प्रतिसूर्यक के दंश में सर्पदंश की चिकित्सा करे । त्रिविधा वृश्चिकाः प्रोक्ता मन्दमध्यमहाविषाः ॥५६॥ बिच्छू तीन प्रकार के हैं—मन्द विष, मध्य विष और महाविष ॥५६॥

गोशकुलोथजा मन्दा मध्याः काष्ठेष्टिकोदभवः । सर्पकोथोदभवस्तीक्ष्णा ये चान्ये विषसंभवाः ॥५७॥ गाय के गोबर के सड़ने से उत्पन्न मन्दविषवाले, लकड़ी, ईट के सड़ने से उत्पन्न मध्यमविष के, सांप से सड़ने से उत्पन्न बिच्छू तीव्र विषवाले होते हैं, और जो भी बिच्छू दूसरे विषों से उत्पन्न होते हैं, वे भी तीव्र हैं ।

वक्तव्य—गोबर आदि के सड़ने से बिच्छू उत्पन्न होते नहीं देखे जाते । इसका सम्भवतः यह अर्थ है कि जहाँ पर गोबर पाया जाता है, इकट्ठा करके गोहरों को रखते हैं वहाँ पर मिलनेवाले बिच्छू मन्द विष वाले हैं । ईट-लकड़ी आदिमें भी

मिलनेवाले बिच्छू मन्दविष के हैं । सांप आदि विषैली वस्तुओं के स्थान पर मिलनेवाले बिच्छू तीव्र विषवाले हैं ॥५७॥

मन्दा द्वादश मध्यास्तु त्रयः पञ्चदशोत्तमाः । दश विशतिरित्येते संख्यया परिकीर्तिताः ॥५८॥ बिच्छू तीस हैं, इनमें बारह मन्द विष के, तीन मध्यम विषवाले और पन्द्रह उत्तम विषवाले हैं ॥५८॥

कृष्णः स्यावः कर्बुरः पाण्डुवर्णो गोमूत्राम्भः कर्कशो मेचकश्च । पीतो धूम्रो रोमशः शाड्वलाभो रक्तः श्वेतोदोदरेणोति मन्दाः ॥५९॥ युक्ताश्चैते वृश्चिकाः पुच्छद्वेशो स्थुभूयोभिः पर्वभिश्चैतरेभ्यः । एभिर्दण्डे वेदना वेपथुश्च गात्रस्तम्भः कृष्णरक्तागमश्च ॥६०॥ शाखादण्डे वेदना चोर्ध्वमेति दाहस्वेदो दंशशोको ज्वरश्च ।

मन्दविषबिच्छू—कृष्ण, स्याव, कर्बुर, पाण्डुवर्ण, गोमूत्राम्भ, कर्कश, मेचक, पीला, धूम्र, रोमश, शाड्वलाभ (नीली हरी दूब के रंग का) और लाल ये बारह पेट पर से श्वेत होते हैं । ये मन्द विष बिच्छू दूसरे बिच्छुओं को अपेक्षा पुच्छ भाग पर बहुत से पगों से (जोड़ों से) युक्त होते हैं । इनकी पूँछ पर बहुत से जोड़ होते हैं, दूसरों पर उतने नहीं होते । इनके काटने पर वेदना, कम्पन, गात्रस्तम्भ, काले रक्त का आना होता है । हाथ-पैर में काटने पर वेदना ऊपर की चढ़ती है, दाह, स्वेद, दंश पर सूजन और ज्वर होता है ॥५९,६०॥

रक्तः पीतः कापिलेनोदरेण सर्वे धूम्राः पर्वभिश्च त्रिभिः स्थुः ॥६१॥ एते मूत्रोत्कापापृत्थण्डजाता मध्या ज्ञेयाञ्चिप्रकारो रगाणाम् । यस्त्यैतेषामन्वयाद्यः प्रसृतो दोषोत्पत्तिं तत्स्वरूपां स कुर्यात् ॥६२॥ जिह्वाशोको भोजनस्यावरोधो

मूच्छां चोष्मा मध्यवीर्याभिदण्डे । मध्यमविषबिच्छू लाल, पीला और कपिल वर्ण होता है । इनका पेट काला होता है । इनकी पूँछ पर तीन पर्व-जोड़ होते हैं । दर्बीकर, मण्डलि और राजिमान् तीन प्रकार के साँपों के मूत्र-मल सड़ने एवं उनके अण्डों से उत्पन्न होते हैं । जो बिच्छू जिस प्रकार के सांप से उत्पन्न होता है, वह बिच्छू उसी के अनुसार दोषोत्पत्ति को करता है । जिह्वा में शोथ, भोजन का अवरोध और तीव्र मूच्छा, मध्यवीर्य वाले बिच्छुओं के काटने पर उत्पन्न होती है ॥६१,६२॥

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