सुश्रुत संहिता
Sushruta Samhita
महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)
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सुश्रुतसंहिता
[ मं० ]
श्वेतश्चित्रः श्यामलो लोहिताभो
रक्तः श्वेतो रक्तनीलोदरी च ॥६३॥
पीतोऽरक्तो नीलपीतोऽपरस्तु
रक्तो नीलो नीलशुक्लस्तथा च
रक्तो वभ्रः पूर्ववर्चचैकपर्वा
यश्चापर्वा पूर्वणी द्वे च यस्य ॥६४॥
नानारूपा वर्णतश्चापि घोरा
ज्ञेयाश्चैते वृश्चिकाः प्राणचौराः ।
जन्मैतेषां सर्पकोथात् प्रदिष्टं
देहेभ्यो वा घातितानां विषेण ॥६५॥
एभिर्दण्डैः सर्पवेगप्रवृत्तिः
स्फोटोत्पत्तिर्भोन्तिदाहौ ज्वरश्च ।
खेभ्यः कृष्णं शोणितं याति तीव्रं
तस्मात् प्राणेस्त्यज्यते शीघ्रमेव ॥६६॥
तीक्ष्ण विषवाले बिच्छू—श्वेत, चित्र, श्यामल, लोहिताभ, रक्त, श्वेत, रक्तोदर, नीलोदर, पीला, लाल, नीला, नीला श्वेत, लाल पिगल, पूँछ पर एक पर्ववाला, पूँछ पर पर्व रहित, दो पर्ववाला, इस प्रकार नाना आकृति एवं वर्णवाले भयानक बिच्छू प्राणहर जानने चाहिये । इनकी उत्पत्ति सर्पों के सड़ने से या विष से मृत प्राणी के शरीर से होती है । इनके काटने पर सर्प वेग के लक्षण, छालों की उत्पत्ति, आति, दाह, ज्वर होता है । रोम कूपों से या नाक मुख से काला रक्त तेजी से जाता है । इसलिये रोगी शीघ्र मर जाता है ॥६३-६६॥
उग्रमध्यविर्गैर्दण्डं चिकित्सेत् सर्पदष्टवत् ।
आदंशं स्वेदितं चूर्णैः प्रच्छितं प्रतिसारयेत् ॥६७॥
रजनीसैन्यवन्धोषशिरीषफलपुष्पजैः ।
तीव्र और मध्य विषवाले बिच्छूओं के काटने पर सर्प दष्ट की भांति चिकित्सा करे । दंश के चारों ओर स्वेदन करके, वहां पर पाछकर हल्दी, सैन्यव, चिकडु, शिरीष के फल और फूलों के चूर्ण से प्रतिसारण करे—रगड़े ॥६७॥
मातुलुकाम्लगोमूत्रपिष्टं च सुरस्रागजम् ॥६८॥
लेपे, स्वेदे मुखोष्णं च गोमयं हितमिष्यते ।
पाने श्चोद्रयुतं सर्पिः क्षीरं वा बहुशुक्ररम् ॥६९॥
दंशं मन्दविषाणां तु चक्रतैलेन सेचयेत् ।
विदारीगणसिद्धेन मुखोष्णेनाथवा पुनः ॥७०॥
कुर्याच्छोत्कारिकास्वेदं विषन्नेरुपनाहयेत् ।
गुडोदकं वा सुहिमं चातुर्जातकसंयुतम् ॥७१॥
पानमस्मै प्रदातव्यं क्षीरं वा सगुडं हिमम् ।
श्लिखुकुक्कुटबर्हीणि सैन्यवं तैलसर्पिषी ॥७२॥
घृसो हन्ति प्रयुक्तस्तु शीघ्रं वृश्चिकजं विषम् ।
कुसुम्भपुष्पं रजनी निशा वा कोद्वरं तृणम् ॥७३॥
एभिर्घृताकैर्घृप्तस्तु पायुदेशे प्रयोजितः ।
नाशयेदाशु कीटोत्थं वृश्चिकस्य च यद्विषम् ॥७४॥
तुलसी के पत्तों को बिजौरा के रस और गोमूत्र में पीसकर लेप करे । स्वेद के लिये सूखे गोबर से सुहाता हुआ गरम सेक देवे । पीने के लिये घी को मधु के साथ प्रचुर शर्करावाला दूध देवे । मन्द विष वृश्चिकों में कोल्हू के ताजे तेल से परिवेक करे । अथवा विदारीगण से खिड़ तैल से सुहाता हुआ गरम सेक करे । शिरपादि विषहर द्रव्यों से बनाई उत्कारिका से स्वेद करे । विषन्मद्व्रव्यों से उपनाह बर्षे । दाळचीनी, इलायची, तेजपात, नागकेसर से मिले गुड के शर्बत को बहुत ठण्डा करके पिठाये । अथवा गुडवाले दूध को ठण्डा करके पीने के लिये देना चाहिये । मोर, मुर्गों के पंख, सैन्यव, तैल, घी इनका धूम बिच्छू के विष को शीघ्र नष्ट करता है । कुसुम्भ के फूल और हल्दी, या हल्दी और कोदा, घास इनको घी से मिलाकर गुदा पर दिया गया धूम कीटों के और बिच्छू के विष को नष्ट करता है ॥६८-७४॥
वृत्ताविषं घोरतमं दुर्विज्ञेयतमं च तत् ।
दुश्चिकित्सयतमं चापि भिषग्भिर्मन्नुद्विभिः ॥७५॥
सविषं निर्विषं चैतदित्येवं परिशङ्किते ।
विषन्ममेव कर्तव्यमविरोधि यदोषधम् ॥७६॥
मकड़ीविष अतिभयानक और कठिनाई से जाना जाता है । मन्दवुद्धिवाले वैद्यों से कठिनाई से चिकित्सा की जाती है । यह विषवाला स्थान है या निर्विष यह शंका होने पर इसमें विषनाशक एवं रसादि धातुओं से अविरोधि ही औषध बरतनी चाहिये ॥७५, ७६॥
अगदानां हि संयोगो विषजुष्टस्य युज्यते ।
निर्विषे मानवे युक्तोऽगदः संपद्यतेऽसुखम् ॥७७॥
तस्मात् सर्वप्रथत्वेन ज्ञातव्यो विषनिश्चयः ।
अज्ञात्वा विषसद्भावं भिषग्ग्यापादयेन्नरम् ॥७८॥
विषवाले व्यक्ति में ही अगदों का प्रयोग उत्तम है । विष रहित मनुष्यों में अगदों के प्रयोग से कष्ट होता है । इसलिये सम्पूर्ण प्रयत्न से विष का निश्चय करना चाहिये । विष की उपस्थिति को न समझकर वैद्य मनुष्य को मार देता है ।
वि० मन्तव्य—उपरि लिखित श्लोक ७६ में सविष दंश है, अथवा निर्विष ऐसी शंका—सन्देह होने पर विषन्म एवं अविरोध औषध का प्रयोग करने का उपदेश है, और श्लोक ७७ में अगद के प्रयोग का निषेध है यह दोनों उपदेश परस्पर विरोधी हैं, परन्तु हमारा विचार है, कि शंका होने पर विषमिश्रित अगद का प्रयोग नहीं करना चाहिये यही तात्पर्य है, और अल्पबुद्धि चिकित्सक को ही शंका भी हो सकती है, विमल बुद्धि को नहीं । परन्तु मन्दविष में विमलबुद्धि चिकि