सुश्रुत संहिता
Sushruta Samhita
महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)
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कल्पस्थानम्
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सक को भी शंका हो सकती है क्योंकि मन्दविष कालान्तर में कुपित होता है, तत्काल नहीं अतः सर्व प्रयत्न से विष का निश्चय कर लेना चाहिये। इसे समझने के लिये निम्न श्लोक ७६ देखिये। लताओं के विष में शंका हो सकती है। देखिये श्लोक ८०-८२ ॥७७,७८॥
प्रोद्भिद्यमानस्तु यथाङ्गुरेण न व्यक्तजातिः प्रविभाति वृक्षः ।
तद्वदुत्तुलद्वयतमं हि तासां विषं शरीरे प्रविकोणमात्रम् ॥७९॥
फूटते हुए अंकुर से जिस प्रकार वृक्ष की जाति का पता नहीं चलता, इसी प्रकार मकड़ियों का विष शरीर में थोड़ी मात्रा में फैला हुआ कठिनाई से जाना जाता है ॥७९॥
ईषत्सकण्डु प्रचलं सकोठ- मव्यक्तवर्णं प्रथमेऽहनि स्यात् ।
अन्तेषु शूनं परिनिम्नमध्यं प्रव्यक्तरूपं च दिने द्वितीये ॥८०॥
उग्रहेण तद्दशयतीह रूपं विषं चतुर्थेऽहनि कोपमेति ।
अतोऽधिकेऽह्नि प्रकरोति जनतो- विषप्रकोपप्रभवान् विकारान् ॥८१॥
षष्ठे दिने विप्रस्तृतं तु सर्वान् समप्रदेशान् भूशमावृणोति ।
तत् सममेऽत्यर्थपरीतगात्रं व्यापादयेन्मत्स्यमतिप्रवृद्धम् ॥८२॥
मकड़ी का विष प्रथम दिन थोड़ी कण्डूवाला, फैलनेवाला, कोठयुक्त और अस्पष्ट रंग का (खचा के समान ही प्रायः रंग रहता है) होता है। दूसरे दिन यह किनारों पर सूजा, बीच में दबा हुआ और स्पष्ट लक्षणोंवाला होता है। तीसरे दिन और भी स्पष्ट हो जाता है। चौथे दिन विष कुपित हो जाता है। इससे आगे के दिन में विष प्रकोपजन्य रोगों को मनुष्य में उत्पन्न करता है। छठे दिन फैलकर सब मर्म प्रदेशों को विशेष रूप में ढांप लेता है। फिर सातवें दिन बहुत बढ़कर, विष से व्याप्त इस रोगी को मार देता है।
वक्तव्य—तृतीये सज्जरो रोमहर्षकृद्दरक्तमण्डलः । शराव- रुपस्तोबाज्यो रोमकृपेषु सासवाः । वृद्धवाग्मह ॥८०-८२॥
यास्तीक्ष्णचण्डोप्रविषा हि लूता- स्ताः सप्तरात्रेण नरं निहन्तुः ।
अतोऽधिकेनापि निहन्त्युरन्या यासां विषं मध्यमवीर्यमुक्तम् ॥८३॥
यासां कनीयो विषवीर्यमुक्तं ताः पक्षमात्राण विनाशयन्ति ।
तस्मात् प्रयत्नं भिषगत्र कुर्या- दादृशपाताद्विषवातियोगैः ॥८४॥
जो मकड़ियां तीक्ष्ण, चण्ड और उग्र (असह्य) विष-वाली होती हैं, वे सात दिन में रोगी को मार देती हैं। जो मध्यम वीर्यवाली होती हैं वे इनसे अधिक दिनों में भी मार सकती हैं। और जो मन्द वीर्यवाली होती हैं, वे पन्द्रह दिन में मार देती हैं। इसलिये वैद्य प्रयत्न के साथ दंश के कारण रोगी के मरने से पूर्व ही विष नाशक योगों से चिकित्सा करे ॥
विषं तु लालानखमूत्रदंष्ट्रा- रजःपुरीषैरथ चैन्द्रियेण ।
सप्तप्रकारं विस्तुजन्ति लूता- स्तदुग्रमध्यावरवीर्ययुक्तम् ॥८५॥
सकण्डुकोठं स्थिरमल्पमूलं लालाकृतं मन्दरुजं वदन्ति ।
शोफश्च कण्डुश्च पुलालिका च धूम्रायनं चैव नखाप्रदंशे ॥८६॥
दंशं तु मूत्रेण सकृष्णमध्यं सरत्कृपवन्तमवेहि दीर्णम् ।
दंष्ट्राभिरुधं कठिनं विवर्णं जानीहि दंशं स्थिरमण्डलं च ॥८७॥
रजःपुरीषैन्द्रियजं हि विद्धि स्फोटं विपक्वामलपोलुपाण्डुम् ।
मकड़ियां सात प्रकार से विष निकालती हैं। यथा—लाला, नख, मूत्र, दंष्ट्रा, रस, मल और शुक्र से। यह विष उग्र-मध्य और मन्दभेद से तीन प्रकार का है। जिस विष में कण्डू, कोठ, स्थिरता (आगे न फैलना), थोड़ा आधार हो वह लाला के कारण उत्पन्न होता है, और वह मन्द पीड़ावाला होता है। शोफ, कण्डू, रोमांच, एवं धूम्रदुग्गर नख के दंश में होते हैं। दंश बीच में काला हो, किनारों पर लाल तथा फटा हुआ हो (किनारे समान न हो), तो विष का कारण मूत्र होता है। जो दंश दांतों के कारण उत्पन्न हो जाता है, वह कठिन, विवर्ण, स्थिर मण्डलोंवाला होता है, उसे उग्रवीर्य जानना। रज, मल और शुक्र से उत्पन्न दंश में छाले, तथा दंश पके हुए आंवले, या पीछु के समान पाण्डु वर्ण होता है ॥८५-८७॥
एतावदेतत् समुदाहृतं तु वक्ष्यामि लूताप्रभवं पुराणम् ॥८८॥
सामान्यतो दृष्टमसाध्यसाध्यं चिकित्सतं चापि यथाविशेषम् ॥८९॥
लताओं के विषय में इतना तो कहा है, अब इनकी उत्पत्ति का पुराना इतिहास, काटने के सामान्य लक्षण, साध्या-साध्य और भेदों के साथ चिकित्सा को कहूँगा ॥८८,८९॥