सुश्रुत संहिता
Sushruta Samhita
महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)
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ही बदधि पत्र से इनके दंश को सम्पूणं सूपे भली
निका देवे ॥ १२८]
खाध्याभिराभिद्तामिद्टमात्रस्य देहिनः।
वृद्धिपत्रेण मतिमान् सम्यगादंशमुद्धरेत् ॥१२९॥
अममणि विधानज्ञो वजितस्य उवरादिभिः।
दु्स्योत्कतेनं कयो दस्पश्वयथुकस्य च ॥१३०॥ मधघुसेन्धव खंयुकतेरगदे रपयेत्ततः ।
प्रियङ्खरजनीङ्वष्टसमङ्गासधुकेस्तथा ॥१२१॥
सारिवां मधुकं द्राक्षां पयस्यां क्षीरमोरटम्।
विदारीगो्चरक्षोद्रमधुकं पाययेत वा ॥१३२॥
विधान को समन्चनेवाला वेद्य, ममं रदित स्थान मे उ्वरादि
से रदित तथा थोडी सूजनवङे पुरषमें दंश को काटकर
निकाले । फिर मधु ओर सैन्धव मिरे अगदोंँसे लेप करे । इसी
प्रकार प्रियंगु, हल्दी, कूठ, मंजीठ ओर मुरेदटी का केप करे । सारिवा, मटेहटी, द्राक्चा, विदारी, क्षीरमोरट इनको या विदारी,
गोखरू, मधु ओर सुठेहटी इम क्वाथ पिकाये | वरद्
आदि क्षीरी इक्षो के अतिशीतल क्वाय से परिषेक करे । दोषों
के अनुसार उपद्रवो कौ विषध्न ओषधिर्यो से चिकित्सा करे
॥ १२६-१३२।
क्षीरिणां स्वक्कषायेण सुशीतेन च सेचयेत् ।
उपद्रवान् यथादोषं विषध्नेरेव साधयेत् ॥१३३॥
नस्याञ्जनाभ्यञ्जनपानधूमं तथाऽव पीडं कवलग्रह च ।
संज्ञोधनं चोभयतः प्रगाढं कयात्सिरामोक्षणमेव चात्र १३४
कोटदष्ब्रणान् सवोनहिदष्टब्रणानपि । । आदाहपाकात्तान् सवाोख्िकित्सेद् दुष्टवद्धिषग् ॥१३५॥
कीटो के काटने से उत्पन्न वर्णो की, सर्पो के सब दूषित वरणो कौ दाह, एवं पाक. कौ अवस्था तक वेदय दूषित वणो की
भांति सव चिकित्सा करे ॥१३५॥ विनिवृत्ते ततः ओोफे कर्णिकापातनं हितम् ।
निम्बपत्रं ्रिवद् दन्ती ऊुघुम्भं कुुमं मधु ॥१३६॥ गुगुदुः सेन्धवं किण्व वचः पारावतस्य च ।
विषवृ द्धकर चान्नं हित्वा संभोजनं हितम् ॥१३७॥
शोफ के हट जाने पर कर्णिका को निकाल्ना चाहिये । खक व्यि नीम के पत्त, नि्ोथ, जमाल्गोय, कुसुम्भ का फू, मधु, गुग्गुक-खेन्धव, सुराबीज, कवूतर की वीठ उत्तम है ।
तिक कुत्थी आदि विष को बद़नेवाङे भोजनं को छोड़कर
शेष सव अन्न-मोजन उत्तमहै |(किका-मासकन्दी)।। १२६,१३२७॥ विषेभ्यः खडु सवभ्यः कणिकामरुजां स्थिराम् |
परच्छयिस्वा मधून्मिश्रेः सोधनीयेरुपाचरेत् ॥१३८॥
सब प्रकार के विर्घो में से वेदना रहित, स्थिर कर्णिका को
पाछकर-निम्बपत्र; दन्तीषूढ आदि शोधनीय दर्व्यो को मधु में
मिलाकर ठेप करके निकटे ॥१३६॥
सुश्रतसरंितां
सप्रषष्ठस्य कीटानां शतस्येतद्विभागजः। दष्टलक्षणमाख्यातं चिकित्सा चाप्यनन्तरम् ॥१ ३९।
एक सौ सरसठ कीटो के दष्ट लक्षण अलग-अलग दिये, उनकी चिकित्सा मी पीछे से कह दी हे ॥१३ ॥ सविशमभ्यायश्तमेतदुक्तं बिभागयः।
इहोदिदष्टाननिदिष्टानथान् वदयाम्यथोत्तरे ॥१४०॥ | सूत्र स्थान, नि दान स्थान, शारीर स्थान, चिकित्सा स्थान, | कल्पस्थान के विभाग से एकसो बीस अध्याय भी क दिये हे । इन स्थानों मे नाममात्र से कहे हए, जो कि विस्तार पे । | नदीं कदे, उन विषया को उत्तरस्थान मे कटूगा ॥१४०॥
सनातनतवाद्रदानामक्षरस्वात्तथेव च ।
तथा इष्टफङ्लाच्च हिमत्वाद पि देहिनाम् ॥९४१॥ वाक्समूहाथेविस्तारात् पूजितत्वाचच देहिभिः ॥ चिकित्सितात् पुण्यतमं न कंचिदपि जुश्रमः ॥१४२॥
ऋषेरिन्द्र्रभावस्याखतयोनेभिषग्गुरोः।
धारयित्वा तु विम मतं परमसंमतम् ।
उक्ताहारसमाचार इह प्रेत्य य मोदते ॥२४३॥ इति भगवता भ्रीघन्वन्तरिणोपदिष्टायां तच्छिष्ये
महषिणा सुश्रुतेन विरचितायां सुश्रुतसंहितायां
पञ्चमं कल्पस्थानं समाप्तम् ॥५ वेदां के सनातन (अनादि) होनेसे, तथा आयुवेद के अंगो के अक्षर (अविचल) होने से, प्रस्यक्चफठ देखने से, मनुष्यों क
कल्याणक।री होने के कारण, बाणीसमूह (संततेप) मे अथ का
विस्तार रहने के कारण मनुष्यों से पूजा किये जाने के
कारण, चिकित्सा से बढ़कर ओर कोई अधिक पुण्यशाली
वस्तु को हम नहीं खुनते। अमृत की योनि, वेयं के गुख
श्र्टप्रभाववाछे ऋषि के अतिशय संमत, निम॑रु मत (ज्ञान) कौ धारण करके, कडे इए अनुसार कायं करने पर मनुष्य इस लो मे ओर परलोक मं सुखी होता है । वक्तव्य--आयुवेद दोनों लोक मे कल्याणकारी दै, यथा- “तस्थायुषः पुण्यतमो वेदो वेदविदां मतः। वच्यते यन्मनुष्या। लोकथोरुमयोर्हितम् ॥ आयुवंद अनादि दै-“सोऽयमाुः व॑दः शाश्वतो निर्दिश्यते, अनादित्वारस्वमावसंसिद्धलक्षणलत् भावस्वभावनितयत्वाच्च । नदि नामूकदाचिदायुषः उन्तान .
वा, शाश्वतश्चायुषो वेदिता अनादि च सुखदुःखं
लक्षणमपरापरयोगात् ।' च० सू अ० ३०।
अन्यानि शाख्राणि विनोदमात्रं
न तेषु किञ्चिद् अविद्रष्टुमस्ति। चिकित्सितज्योतिषतंनवादाः. स
पदे पदे प्रत्ययमावहन्ति ॥ कश्चित् ॥
इति भ्रीुशरुतसंहितायां कल्पस्थाने कीटकल्प । नामष्टमोऽष्यायः॥८॥
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