सुश्रुत संहिता
Sushruta Samhita
महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)
पृष्ठ 655, कुल 872 में से
संदर्भ में पढ़ेंअथ उत्तरतन्त्रम्
प्रथमोऽध्यायः
अथात औपद्रविकमध्यायं व्याख्यास्यामः ॥१॥
यथोवाच भगवान् धन्वन्तरिः ॥२॥
अब इसके आगे औपद्रविक अध्याय का व्याख्यान करेंगे— जैता कि भगवान् धन्वन्तरि ने कहा था ॥१,२॥
अध्यायानां शते विंशे यदुक्तमसकृन्मया ।
बद्ध्यामि बहुधा सम्यगुत्तरेऽर्थानिमानिति ॥३॥
एक सौ बीस अध्यायों में मैंने जो बार बार यह कहा है कि “इन विषयों को उत्तरस्थान में विस्तार से कहूँगा”— उसे इस उत्तम उत्तर तन्त्र में कहता हूँ ॥३॥
इदानीं तत् प्रवद्यामि तन्त्रमुत्तरमुत्तमम् ।
निखिलेनोपदिश्यन्ते यत्र रोगाः पृथग्विधाः ॥४॥
शालाकयतन्त्राभिहिता विदेहाधिपकीर्तिताः ।
ये च विस्तरतो दृष्टाः कुमारबाधहेतवः ॥५॥
षट्सु कायचिकित्सासु ये चोक्ताःपरमर्षिभिः ।
उपसर्गादयो रोगा ये चाप्यागन्तवः स्मृताः ॥६॥
त्रिषष्टी रससंसर्गाः स्वस्थवृत्तं तथैव च ।
युक्तार्थो युक्त्यश्चैव दोषभेदास्तथैव च ॥७॥
यत्रोक्ता विविधा अर्था रोगसाधनहेतवः ।
इसमें पृथग प्रकार के रोग जहाँ सम्पूर्ण रूप से कहे गये हैं, जैसे—विदेहाधिप से कहे हुए शालाकय तन्त्र के रोग, कुमारों को पीड़ा करनेवाले जो रोग विस्तार से देखे हैं, अग्नि-वंश, मेड़, जतुकर्ण, पराशर, हारीत और क्षारपाणि इन छः की काय चिकित्सा में श्रुषियों ने जो रोग कहे हैं, अमानुषोप-सर्गादि जो आगन्तुज रोग कहे हैं, रसों के तिरसठ संयोग, स्वस्थवृत्त, युक्तार्थ तन्त्रयुक्तियाँ, दोषभेद, रोग साधन के हेतु जो नाना प्रकार के अर्थ-विषय जिसमें कहे हैं, उस अन्तिम उत्तरतंत्र को कहता हूँ ॥४-७॥
महत्तस्तस्य तन्त्रस्य दुर्गाधस्थाम्बुधेरिव ॥८॥
१—अतः परं स्वनाम्ना एव तन्त्रं उत्तरम् उच्यते । श्रेष्ठत्वात् उत्तरं हि एतत् तन्त्रं आहुः महर्षयः । बहु अर्थसंग्रहात् श्रेष्ठं उत्तरं वा अपि परिचमम् । सू० अ० ३-४३ । अर्थात् इस प्रकरण का नाम ही उत्तरतन्त्र है अथवा बहुत अर्थों का एकत्र संग्रह होने के कारण श्रेष्ठ होने से अथवा ग्रन्थ का अन्तिम भाग होने से उत्तर तन्त्र कहलाता है । श्रीडल्लताचार्य के शब्दों में इस संहिता के १२० अध्यायों को समाप्त करके उनके परिशिष्ट रूप में उत्तर-तन्त्र का प्रतिपादन किया है ।
आदाविवोत्तमाङ्गस्थान् रोगानभिदधाभ्यहम् ।
सङ्ख्यया लक्षणैश्चापि साध्यासाध्यक्रमेण च ॥९॥
इस अत्यन्त गम्भीर समुद्र के समान इस बड़े तंत्र में सबसे प्रथम शिर के रोगों को कहूँगा । इनकी संख्या, लक्षण, साध्य-विधि से कहूँगा ॥
चरक में—
“प्राणाः प्राणभूतां यत्र श्रिताः सर्वेन्द्रियाणि च ।
यदुत्तमांगमंगानां शिरस्तदभिधीयते ॥
अथवेवेद में—
शिरस्तात्त्वन्तरगतं सर्वेन्द्रियपरं मनः ।
तत्रस्थं तद्विषयानिन्द्रियाणां रसादिकम् ॥
समीपस्थान् विजानाति व्रीन् भावांश्च गच्छति ।
तन्मनःप्रभवं चापि सर्वेन्द्रियभवं बलम् ॥
ऊर्ध्वमूलमधःशालं श्रूषयः पुरुषं विदुः ।
मूलप्रहारिणस्तस्माद् रोगान् शीघ्रतरं जयेत् ॥
सर्वेन्द्रियाणि येनास्मिन् प्राणा येन च संश्रिताः ।
तेन तस्योत्तमांगस्थ रक्षायामाहतो भवेत् ॥
वाग्भट्ट ॥
विद्यादृद्ययङ्कुलबाहुल्यं स्वाङ्गुष्ठोदरसंमितम् ।
द्वयङ्कुलं सर्वतः सार्धं भिषङ्कन्यनबुदबुदम् ॥१०॥
सुवृत्तं गोस्तनाकारं सर्वभूतगुणोद्भवम् ।
अपने अंगूठे के मध्यमांग के बराबर जो अंगुल है, उन दो अंगुल के बराबर नेत्र बुदबुद के अन्तः प्रविष्ट नेत्र हैं । अक्षिगोलक लम्बाई और चौड़ाई में अढ़ाई अंगुल है । यह आँख सुन्दर गोलाकार, गाय के स्तन के समान, पृथ्वी आदि पाँचों भूतों के गुणों से बनी है ।
वि० मन्तव्य—नयन बुदबुद—इसे “डेला, कहते हैं यह नेत्र के गड्ढा में स्थापित रहता है और वत्सं नेत्रछेदों से आच्छादित एवं सुरक्षित रहता है, यही चक्षुः इन्द्रिय का अधिष्ठान है, पानी के बुलबुल के समान आकृति होने के कारण इसे नयन का “बुदबुद” कहते हैं । इसके द्वारा ही रूप का ज्ञान होता है । यह बुदबुद सब नर नारियों में एक परिमाण का नहीं होता है, किसी का छोटा और बड़ा, नेत्रसाव के कारण बड़े से छोटा भी हो जाता है देखिये “शुष्काक्षिपाक” और नेत्र का तर्पण करने से छोटे से बड़ा भी हो जाता है । इस श्लोक में जो बाहुल्य-स्थौल्य-मोटाई, चौड़ाई एवं लम्बाई