सुश्रुत संहिता
Sushruta Samhita
महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)
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सुश्रुतसंहिता
[ अ० १ ]
वतलाई गई है वह मध्यम श्रेणी के बुद्धुद की है। यह तेजोमय अवयव है। इसमें पित्तवाहिनी १० सिरा पहुँचती हैं (सु० शा० अ० ७)। सर्वभूतगुणोद्भव-पृथ्वी आदि पञ्चमहाभूतों के सार-भाग से इसका निर्माण होता है। यह आलोचक पित्त का अधिष्ठान है। चक्षु के पाश्चात्य ध्रुव पर इस आन्तरिक सांवे-दिक पटल के भीतरी पृष्ठ में एक गोल या अण्डाकार पीला धन्वा होता है इसको 'पीतविन्दु' कहते हैं पीत विन्दु का व्यास ३३ से ३२ इञ्च होता है उसके बीच में एक गढा होता है। जब हम कोई चीज देखते हैं तो अक्षिगोलक इस प्रकार गति करता है कि जिससे वह स्थान उस चीज के सम्मुख आ जावे ताकि प्रतिबिम्ब का कुछ भाग उस पर भी पड़े। इस गढ़े को पीतविन्दु नामि कहते हैं। और स्थानों की अपेक्षा पीतविन्दु में देखने की शक्ति सबसे अधिक होती है (हमारे शरीर की रचना अ० २३)। हमारा दृढ़ विश्वास है कि आयुर्वेद का 'आलोचक पित्त' यही पीतविन्दु है ॥१०॥
पलं भवोऽग्निनितो रक्तं वातात् क्रुष्णं सितं जलात् ॥११॥ आकाशादश्रमागंश्च जायन्ते नेत्रबुद्धेः।
इस नेत्र बुद्धुद में मांस पृथ्वी से, रक्त अग्नि से, क्रुष्ण-भाग वायु से, श्वेत भाग जल से, अश्रुक्षोत आकाश से उत्पन्न होते हैं।
वि० मन्तव्य—नेत्र में मांस (द्वे नेत्रयोः सु० शा० अ० ५) दो मांस पेशियों के रूप में विद्यमान है। मांस के अतिरिक्त पटल आदि भी पार्थिव तत्त्व से निर्मित हैं। यह दो पेशियाँ नेत्र बुद्धुद की हैं। रक्त एवं पीतविन्दु अग्नि तत्त्व से निर्मित हैं, क्रुष्ण मण्डल की क्रुष्णता वायु तत्त्व से निर्मित है, श्वेतमण्डल की श्वेतता और जलीयांश जल तत्त्व का भाग हैं और उसमें जो क्षोतस् हैं जिनमें से होकर रक्त एवं जल या अश्रु बहते हैं वे अकाश तत्त्व के भाग हैं। इस प्रकार यद्यपि नेत्र भी पाञ्चभौतिक हैं तथापि इसमें अग्नि तत्त्व तेजस् गुण अधिक है यथा—चक्षुः तेजोमयं (अ० ८० अ० २) तथा (च० सू० अ० ५) ॥१२॥
दृष्टिं चात्र तथा वक्ष्ये यथा ब्रूयाद्विशारदः ॥१३॥
नेत्रायामत्रिभागं तु क्रुष्णमण्डलमुच्यते।
क्रुष्णात् सममसिच्छन्ति दृष्टिं दृष्टिविशारदाः ॥१३॥
विदेह ने दृष्टि को जिस प्रकार कहा था, उसी प्रकार दृष्टि को कहता हूँ। नेत्र की लम्बाई का एक तिहाई भाग (३) क्रुष्णमण्डल का सातवां भाग (६) दृष्टि है, ऐसा शालाक्य विद्वान् कहते हैं ॥१२,१३॥
मण्डलानि च सन्धीश्च पटलानि च लोचने।
यथाक्रमं विजानीयात् पञ्च षट् च षडेव च ॥१४॥
आँख में मण्डल पाँच, सन्धियाँ छै और पटल छै हैं।
दूसरे इनकी संख्या—
लोचने मण्डलान्यन्तान् संधीश्च पटलानि च।
जानीयात् क्रमशः पञ्च चतुरः षड् षडेव च ॥
वि० मन्तव्य—धेरा अर्थात् यदि पद्म एवं वत्सम समेत समस्त नेत्र को विछा दिया जाय तो ५ मण्डल बन जाते हैं। सन्धि-इन मण्डलों (बेरो) की सन्धि अर्थात् जोड़। ५ मण्डलों की ४ सन्धियाँ और कनीनिका (अर्थात् कोया-नेत्र के समीप का कोना) और अपाङ्ग (अर्थात् नेत्र का बाहरी-पुटपुटी की ओर का कोना) की २ सन्धियाँ इस प्रकार ६ सन्धियाँ हैं। पटल-परदा दृष्टि को ढकनेवाला। यथा—२ वत्सम नेत्रच्छद जो बुद्धुद को ढकते हैं और ४ बुद्धुद में जिनसे नेत्र बुद्धुद बना है। पद्म-वत्सम पर के बाल और उनके कृप तथा वत्सम का भीतरी तल। कनीनिका-अमरकोश, शीगणनाथ सेन का प्रत्यक्ष शारीरम् तथा त्रिलोक की नाथ वर्मा की हमारे शरीर की रचना कनीनिका शब्द से दृष्टि मण्डल मानते हैं परन्तु सुश्रुत कोका को कनीनिका मानता है ॥१४॥
पद्मवत्समश्चेतक्रुष्णदृष्टीनां मण्डलानि तु।
अनुपूर्वं तु ते मध्यश्चत्वारोऽन्यथा यथोत्तरम् ॥१५॥
पाँच मण्डल—पद्ममण्डल, वत्सममण्डल, श्वेतमण्डल, क्रुष्णमण्डल, और दृष्टिमण्डल, ये पाँच मण्डल हैं। इनमें आनु-पूर्विक क्रम से अन्दर की ओर हैं। अर्थात् सबसे बाहर पद्म, उसके आगे वत्स, फिर श्वेतमण्डल, फिर क्रुष्ण और सबसे पीछे दृष्टि है। परन्तु उत्तरोत्तर क्रम में दृष्टि मण्डल के बाहर क्रुष्ण मण्डल, फिर श्वेतमण्डल, फिर वत्सममण्डल, फिर पद्म मण्डल है ॥१५॥
पद्मवत्समगतः सन्धिवत्समशुक्लगतोऽपरः।
शुक्लक्रुष्णगतस्त्वन्व्यः क्रुष्णदृष्टिगतोऽपरः।
ततः कनीनकगतः षष्ठश्चापाङ्गगः स्मृतः ॥१६॥
छै सन्धियाँ—पद्म और वत्स की सन्धि, वत्स और शुक्लभाग की सन्धि, शुक्ल और क्रुष्ण भाग की सन्धि, क्रुष्ण और दृष्टि भाग की सन्धि, कनीनिका भाग की (नासा समीप की), और छठी अपांग की सन्धि (आँख के बाह्य प्रान्त की कान के पार्श्व की) ॥१६॥
द्वे वत्समपटले विद्याश्चत्वार्यन्यानि चाक्षिणि।
जायते तिसिरं येषु न्याधिः परमदारुणः ॥१७॥
छै पटल—आँख वत्स में पटल दो, शेष चार पटल हैं, जिन चार पटलों में अतिदारुण तिसिर रोग होता है ॥१७॥
तेजोजलाश्रितं बाह्यं तेष्ट्वन्यत् पिणितश्रितम्।
मेदस्त्रुतीयं पटलमाश्रितं त्वस्थि चापरम् ॥१८॥