सुश्रुत संहिता
Sushruta Samhita
महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)
पृष्ठ 657, कुल 872 में से
संदर्भ में पढ़ेंअ० १ ] ७६
उत्तरतन्त्रम्
६०१
पञ्चमांशसमं हृष्टेस्तेषां बाह्युत्पत्तिमिष्यते ।
चार पटल—इनमें बाह्यपटल—जलाश्रित तेज (सिराश्रित रक्त) है दूसरा पटल मांस में आश्रित है। तीसरा पटल मेंद में आश्रित है, चौथा पटल अस्थि में आश्रित है। इन पटलों की मोटाई दृष्टि का पाँचवाँ भाग (३) है।
वि० मन्तव्य—बाह्य पटल में तेजस् अग्निनतस्व एवं जल-तस्व अधिक होता है, श्री त्रिलोकी नाथ वर्मा के शब्दों में—बाह्यपटल-यह पीले और श्वेत सौत्रिक तन्तुओं से निर्मित है; और शेष दोनों पटलों की अपेक्षा अधिक मजबूत मोटा और मल्ट होता है ॥१८॥
सिराणां कण्डराणां च मेदसः कालकस्थ च ॥१९॥
गुणाः कालात् परः इलेष्मा बन्धनेऽद्विगोः सिरायुतः ।
सिरा से आरम्भ करके कालकास्थ पर्यन्त यथोत्तर उत्कृष्ट प्रसाद (गुण) आंख को बनाने में (एक दूसरे भाग के साथ मिलाने में) मुख्य रूप से भाग लेते हैं। इससे कालकास्थ के सभी में स्थित श्लेष्मा सिराओं के साथ मिलकर आंखों को बांधती है। दूसरे आचार्यसिरा से लेकर मेद पर्यन्त गुण को आंख के कृष्ण भाग को बांधते हैं, ऐसा अर्थ करते हैं। कृष्ण भाग से अङ्गों, जो शुक्लका भाग है, उनको बांधनेवाली सिरायुत श्लेष्मा है। (कण्डरा का अर्थ स्नायु है) ॥१९॥
सिरानुसारिभिर्दोषैर्विगुणैरुर्ध्वभागतैः ॥२०॥
जायन्ते नेत्रभागेषु रोगाः परमदार्शुणाः ।
नेत्रस्थ सिराओं का आश्रय लेकर, विपरीत गतिवाले दोष ऊपर की ओर (सिर की तरफ) आकर नेत्र भागों में अतिशय भयानक रोगों को उत्पन्न करते हैं ॥२०॥
तत्राविलं ससंरम्भमश्रकण्डूपदेहवत् ॥२१॥
गुरुषातोदराग, वैयुक्तं चान्यकलक्षणैः ।
सशूलं वर्त्मकोषेषु शुक्लपूणाभमेव च ॥२२॥
विह्वन्यमानं रूपं वा क्रियास्वस्वि यथा पुरा ।
दृष्ट्वैव धीमान् बुध्येत दोषेणाधिष्ठितं तु तत् ॥२३॥
रोगों का पूर्वरूप—इनमें नेत्र गदला, शोथ युक्त, अशु-कण्डू-मल (ग्रीष) युक्त, भारी, जलन तोद (बुभने का दर्द), सुखी आदि से युक्त, अस्पष्ट लक्षणों का होता है। पलकों के कोषों में थोड़ा दर्द, शुक्ल (जो आदि की बाल के रोग के समान) से भरे हुए पलक आंख क्रियाओं में या रूप को (प्रकाश को सहने में) देखने में पहले की भांति काम नहीं करती, इन लक्षणों को देखकर बुद्धिमान् आंख को दोष से युक्त समझे ॥२१-२३॥
तत्र संभवमासाद्य यथादोषं भिषग्विजितम् ।
विदुष्यान्नेत्रजा रोगा बलवन्तः स्युरन्यथा ॥२४॥
आंखों के उत्पन्न रोगों में पूर्वरूप देखकर वैद्य औषध करे। ऐसा न करने पर नेत्रजन्य रोग बलवान् हो जाते हैं ॥
सन्धेपतः क्रियायोगो निदानपरिवर्जनम् ।
वाताद्दीनां प्रतीघातः प्रोक्तो विस्तरतः पुनः ॥२५॥
सन्धेप में संशमन, संशोधन क्रियाओं का सम्यग् योग यही है कि कारण का परित्याग करे (दोष कारक रोग कारक दोनों प्रकार के कारणों को छोड़ देवे)। फिर इसके पीछे बात आदि दोषों को, विस्तर से नष्ट करना कहा है ॥२५॥
उष्णाभितमस्य जलप्रवेशाद्-
दूरेक्षणान् स्वप्नविपर्ययाच्च ।
प्रसक्तसंरोदनकोपशोक-
कलेशभिघाताद्वितिभैयुत्तान् ॥२६॥
शुक्तरनाटाम्लकुलथमाष-
विषेवणाद्गविनिग्रहान्च ।
स्वेदादथो धूमन्तिषेवणाच्च
छर्दविघाताद्भ्रमनात्तियोगान् ॥
बाष्पमहात् सूदमनिरीक्षणाच्च
नेत्रे विकारान् जनयन्ति दोषाः ॥२७॥
शरीर के गरम होने पर सहसा जल में घुस जाने से, दूर दृष्टि रखने से (जैसे झईवर), नौद न आने से, निरन्तर रोना, क्रोध या शोक करते रहने से, क्लेश (मानसिक उद्विग्नता) से, चोट लगने से, अति स्त्री सेवन से, शुक्त-कांजी-खटाई-कुलथी-उडद का सेवन करने से, मल मूत्रादि के उपस्थित वेगों को रोकने से, पसीने से, धूम्रपान करने से (विशेषकर नाक से धूम्र निकालने पर), वमन के रुक जाने से, वमन के अतियोग से, आँसुओं को रोकने से, बारीक काम (सीना, पिरौना, काढ़ना आदि) करने से दोष नेत्र में रोग उत्पन्न करते हैं ॥
वक्तव्य—
‘दृष्टिस्तेजोमयी प्रोक्ता शुक्लं तेजश्च केवलं ।
तस्माद् दृष्टिबलापेक्षी तेजोद्विद्वि समाचरेत् ॥२६, २७॥
वाताद्दश तथा पितात् कृफान्चैव त्रयोदश ।
रक्तात् घोडश विज्ञेया सर्वजाः पञ्चविंशतिः ॥२८॥
तथा बाह्यौ पुनद्वौ च रोगाः षट्सप्ततिः स्मृताः ।
आंख के रोग छिहत्तर हैं, यथा—वातजन्य दस, पित्त-जन्य दस, कफजन्य तेरह, रक्तजन्य सोलह, सर्वजन्य पच्चीस, बाह्यज-दो, इस प्रकार, नेत्र रोग छिहत्तर हैं ॥२८॥
हताधिमन्थो निमिषो दृष्टिर्गम्भीरिका च या ॥२९॥
यच्छ वातहतं वत्स न ते सिध्यन्ति वातजाः ।
याप्योऽथ तन्मयः काचः साध्याः स्युः साध्यमार्कताः ।
शुष्काक्षिपाकाधीमन्थस्यन्दमारुतपर्यथाः ॥३०॥