सुश्रुत संहिता
Sushruta Samhita
महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)
पृष्ठ 670, कुल 872 में से
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: तन्नाक्षि विस्पष्टमिवावभाति
बेड्यंवणौ बिमला च दृष्टिः ॥४४॥
अनिमित्तज लिगनारा- देवता, ऋषि, गन्धव, बडे (अजगर) तथा सूय कं देखने के कारण जिस मनुष्य की दष्ट
जाती रहती है. इस लिगनाश को अनिमित्तज कहते हं । इसमें
` आंख अतिशय निम रहती रहै, दृष्टि स्वाभाविक वण को एवं
स्वच्छ रहती है, परन्छ॒ दिखता नहीं दे ॥४४॥
विदीयते सीदति हीयते वा थ चणाममीघातहता तु दृष्टयः ॥४५॥
चोट ल्गने से मनुष्यों की दष्टि-फट जाती है, नी
बैठ जाती दै याकम हो जाती ई ।४५॥।
इत्येते नयनगता मया विकारा
संख्याताः प्रथगिह षट् च सप्रतिश्च ।
` एतेषां प्रथ गिह विस्तरेण सवं
वच्येऽहं तदयु चिकित्सितं यथावत् ॥४६॥
आंख के ये छिदहत्तर रोग प्रथग प्रथग मेने भटी प्रकार से
कृह दिये हँ । इन्हीं की यहाँ पर प्रथग प्रथग् चिकित्वा विस्तार से कर्हरगा ।४६॥
इति श्रीपुश्चतसंहितायामुत्तरतन्वान्तगते शााकषयतन्तर
दष्टिगतरोगविज्चानीयो नाम सप्तमोऽध्यायः ॥७॥
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-. -अष्टपाध्याय
अथातश्चि कित्सितप्रविभागविज्ञानीय
मध्याय व्याख्यास्यामः ॥१॥ यथोवाच भगवान् धन्वन्तरिः (खुश्रताय) ॥।२॥
अब् इसके आगे चिकिस्वित प्रविभागविज्ञानीय अध्याय
की व्याख्या करेगे-जेसा क्रि भगवाय् धन्वन्तरि ने कहा था ॥ ||.
षटसघ्रतियऽभिहिता व्याधयो नामङक्षणेः चिकित्सितमिदं तेषां समासव्यासतः णु ॥३॥ ; नाम ओर श्चणोसेजो ये छत्तर नेत्र रोग के हँ उनकी चिकित्खा को खक्ञेप ओर विस्तार में सुनो ॥३॥ छेदयास्तेषु दञ्चकश्च नव ठेख्याः प्रकौर्तिताः
भेदयाः.पञ्च विकाराः स्युग्यध्याः पञ्चदञेव तु ॥४।
दादशाऽगख्कृत्यार्च याप्याः सप्र भवन्ति हि। रोगा वजयितन्याः स्युदंश पच्च च जानता । तः ५ ~° असाध्यो वा भवेतां तु याप्यो चागन्तुसंक्ञितौ ॥५॥
क छे योग्य है, पांच रोग मेदन क योग्य, ओर पन्द्रह रोग वेधन ^ केयोग्य, बारह रोग ओषधवाध्य ( शाख कमं से अयोग्य ) ओरं खात रोग य।प्य या असाध्य होते दै ॥४५॥ |
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„ ॐ यत्तथ १ {ज्य
ऽवुदमयो _
सुश्चुतसंहिता
्युषित्, शुक्र, अजुन, पिष्टक, अक्लिन्िवत्म, धूमकर्शी, शक्ति |
: | दूषित होने से ये बारह रोग. खक म के अयोग्य हे ॥६,१०॥
इन रोगों मे ग्यारह रोग छेदन करने योग्य है । नौ खेलन | `
अधाष्टका रुधिरजाश्चःगदालिदोषा न खिदो
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| जारं सिराजमपि पञ्चविधं तथाऽमं || छे्या भवन्ति सह पवेणिकामयेन ॥६॥ छेदरोग--अशोंवत्म, शुष्काश, अत्रुद, सिरा पिडका
जाल, पांच तरह का अम ( प्रस्ताय॑स, शुष्काम, रक्तां अधि
मांखाम, स्नाय्वमं ) ओर पवणिका, ये ग्यारह रोग छे है ॥९॥
उतसङ्किनी बहट्कदेमवत्मेनी च रयावं च यच्च पठितं सिविह वद्धवत्य। किरष्टं च पोथकियुतं खद यच्च वत्से कुम्भीकिनी च सह् अकरया च छेख्याः ॥७| उस्संगिनी, बहख्वत्म; .कद्मवत्म, श्याववत्मे, बद्धवछ |
(वत्मवन्ध), विलष्टवत्मं पोथकी, कुम्भीका ओर वत्मशकयाये, | रेखन के योग्य हँ ॥७॥ ॥।
सृरेष्मोपनाहछ्गणो च विसं च भ्या
ग्रन्थिरच यः कृमिकृतोऽञ्जननामिका च ।
श्टेष्मोपनाह, ठगण, विसबत्मं, कृमिकृतम्रन्थि ओर अंजन नामिक्रा ये पच मेय हैं ।
आदो सिरा निगदितास्तु ययोः प्रयोगे
पाको च यो नयनयोः पवनोऽन्यतरच ॥८॥
पूयारुसानिख्विपययमन्थसंज्ञाः .. स्यन्दास्तु यान्द्युपशमं हि सिरान्यधेन। `
जिन दो रोगों के पहले सिरा शब्द कहा गया है, यथा-
सिरोत्पात, सिराहष, दो तरह का नेचपाक, अन्यतोवात, पूयः || लस, वात विपयय, अंधिमन्थ (चार), ओर अभिष्यस्द (चार यनद्रह् रोग-शिरावेषन से शन्त होते `, |
` आष्काक्षिपाककफपित्तविदग्धट्ष्टि
ष्वम्छाख्यशुक्रसहि ताजुनपिष्टकेषु ॥€॥ अङ्ञिन्नवत्महुतसुरध्वजदरिञुक्ति- ` प्रकिछन्नवत्मसु तथेव वखाससंज्ञे । आगन्तुनाऽऽमययुगेन च दूषितायां
दष्टो न रखपतनं भ्रवदन्ति तज्ज्ञाः ॥१०॥ . | शुष्काक्षिपाक, कफविद्ग्धदष्टि, पित्तविद्ग्धदष्टि अट ||
संपश्यतः षडपि येऽभिहितास्तु काचा- . | | स्ते पदमकोपसदितास्तु भवन्ति याप्याः। ... | के हुए छ काच, लिनमें रोगी को दीखता रहता 2, ° , ॥ काच तथा सात पद्धमकोप ये सात रोग याप्य ६ । | चत्वार एव पवनप्रभवास्त्वसाध्या ध; दवौ पित्तजौ कफनिमित्तज एक. एव ।
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