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भारतकोश
सुश्रुत संहिता

सुश्रुत संहिता

Sushruta Samhita

महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished872 पृष्ठ

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उत्तरतन्त्रम्

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झाई का या पीला होता है। कफ के कारण मोटा, चिकना, शंख कुन्द (मोगरे का फूल) और चन्द्रमा के समान श्वेत, हिलते हुए कमल पत्र पर रक्खे पानी की बूँद के समान श्वेत, धूप में बहुत सिकुड़नेवाला, और छाया में फैलनेवाला मण्डल होता है। आँख के मलने पर यह मण्डल फैलता है। रक्तजन्य मण्डल कमल पत्र की चमक का— या मूंगे की चमक का होता है। त्रिदोषजन्य लिंगनाश में दृष्टि में रंग नाना प्रकार के होते हैं। इन सब में अपने अपने दोष के अनुसार दोषों के लक्षण होते हैं।

वक्तव्य—यहाँ पर कुछ थोड़ा सा दोखने लगने पर परिष्ठाति रोग होता है, इस प्रकार से छेँ लिंगनाश पूरे होते हैं ऐसा डर्रण का कहना है ॥

वि० मन्तव्य—यह मण्डलों अर्थात् काचों— मोतियों पर वातादि दोषों से होनेवाले प्रभाव बतलाये गये हैं ॥२६-३३॥

पङ्क्तिङ्गनाशः षड्भिरे च रोगा

दृष्ट्याश्रयाः षट् च षडेव च स्युः ।

तथा नरः पित्तविदग्धदृष्टिः

कफेन चान्यस्त्वथ धूमदर्शी ॥३४॥

यो हृस्वजाङ्घो (त्यो) नकुलान्धता च

गम्भीरसंज्ञा च तथैव दृष्टिः ।

यह छेँ लिंगनाश, कह दिये हैं, ये आगे कहे जानेवाले छेँ रोग हैं। इस प्रकार दृष्टि के बारह रोग हैं, ये छेँ-छेँ ही हैं। रोग-पित्तविदग्धदृष्टि, कफविदग्धदृष्टि, धूमदर्शी, हृस्व-जाङ्घ, नकुलान्ध, और गम्भीरिका ये छेँ रोग हैं ॥३४॥

पित्तेन दुष्टेन गतेन दृष्टि

पीता भवेद्यस्य नरस्य दृष्टिः ॥३५॥

पीतानि रूपाणि च मन्यते यः

स मानवः पित्तविदग्धदृष्टिः ।

प्राप्ते तृतीयं पटलं तु दोषे

दिवा न पश्येन्नशि बौक्षते च ॥३६॥

(रात्रौ स शीतानुगृहीतदृष्टिः)

पित्ताल्पभावादपि तानि पश्येत्)

दृष्टि हुए पित्त के कारण जिस मनुष्य की दृष्टि पीली हो जाये, जो मनुष्य रूपों को पीला मानता हो, उस मनुष्य की दृष्टि पित्तविदग्ध दृष्टि होती है। दोष के तीसरे पटल में पहुँच जाने पर रोगी दिन में ठीक प्रकार से नहीं देखता, परन्तु रात को देखता है। (रात्रि में शीतलता के कारण दृष्टि के छुल जाने पर पित्त के कम हो जाने से वह देख सकता है ॥

तथा नरः श्लेष्मविदग्धदृष्टि-

स्तान्येव शुक्लानि हि मन्यते तु ॥३७॥

त्रिषु स्थितोऽल्पः पटलेषु दोषो

नक्तान्ध्यामापादयति प्रसद्य ।

दिवा स सूर्यानुगृहीतचक्षु-

रीक्षेत रूपाणि कफाल्पभावात् ॥३८॥

कफ से विदग्धदृष्टिवाला मनुष्य उन्हीं रूपों को श्वेत मानता है। तीनों पटलों में थोड़ा स्थित दोष रात्र्यन्धता (रात में न दोखना) उत्पन्न कर देता है। दिन में सूर्य की दया से कफ के कम होने पर इसको दृष्टि मिल जाने पर यह देख सकता है ॥३७,३८॥

शोकञ्चरायासशिरोभितापै-

रभ्याहता यस्य नरस्य दृष्टिः ।

सधूमकान् पश्यति सर्वभावां-

स्तधूमकशीति वदन्ति रोगम् ॥३९॥

शोक, ज्वर, परिश्रम (जैसा रेलवे ड्राईवर), शिर का दुखना आदि कारणों से जिस मनुष्य की दृष्टि आहत हो जाये, वह मनुष्य सब वस्तुओं को धुँध्याला देखता है, इस रोग को धूमदर्शी कहते हैं ॥३९॥

स हृस्वजाङ्घो दिवसेषु कृच्छ्रा-

दध्रस्वानि रूपाणि च येन पश्येत् ।

जो मनुष्य दिन में कठिनाई से रूपों को छोटे आकार में देखता है, उसे हृस्वजाङ्घ कहते हैं।

विद्योत्तये येन नरस्य दृष्टि-

द्वीषामिपन्ना नकुलस्य यद्वत् ॥४०॥

चित्राणि रूपाणि दिवा स पश्येत्

स वै विकारो नकुलान्धसंज्ञः ।

दोषों से आक्रान्त होने पर जिस पुरुष की दृष्टि नेवले के समान चमकती है, वह दिन में सब दोषों के वर्णवाले रूपों को देखता है, इस रोग को नकुलान्ध कहते हैं ॥४०॥

दृष्टिविरूपा श्वसनोपसृष्टा

संकुल्यतेऽभ्यन्तरतश्च याति ॥४१॥

रुजावगाढा च तमश्चिरोगं

गम्भीरिकेति प्रवदन्ति तज्ज्ञाः ।

बायु से युक्त दृष्टि—विकृत रूपवाली, संकुचित, और अन्दर की ओर बैठती जाती है। इसमें अतिशय वेदना होती है, इस रोग को गम्भीरिका कहते हैं ॥४१॥

बाह्यो पुनर्द्वीषिह संप्रदिष्टो

निमित्ततश्चाप्यनिमित्ततश्च ॥४२॥

निमित्ततस्तत्र शिरोभितापा-

ञ्च्येत्स्यभिष्यन्दनिदर्शतेश्च ।

बाहर से होनेवाले जो दो रोग—निमित्तजन्य और अनिमित्तजन्य हैं, उनमें निमित्तजन्य रोग—शिर के दुःख के कारण होता है, इसके लक्षण अभिष्यन्द के समान होते हैं ॥

सुरसिगन्धर्वमहोरगाणां

सन्दर्शनेनापि च भास्वराणाम् ॥४३॥

हन्येत दृष्टिर्भुजस्य यस्य

स लिङ्गनाशस्त्वनिमित्तसंज्ञः ।