सुश्रुत संहिता
Sushruta Samhita
महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)
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सुश्रुतसंहिता
[ अ० ७ ]
कफेन पर्येद्रूपाणि स्तिग्धाणि च सितानि च ॥२०॥ गौरचामरगौराणि इवेताभ्रप्रतिमानि च । पर्येदसूक्ष्माण्यत्यर्थं न्यभ्रे चैवाभ्रसंख्वम् ॥२१॥ सलिलल्लावितानीव परिजाड्यानि मानवः ।
कफज तिमिर में-रूपों को चिकना, श्वेतचैवर के समान शुक्ल, श्वेतबादल की भाँति के देखता है। स्थूलरूपों को देखता है, बादलों रहित आकाश में भी बादलों का जाना देखता है, चारों ओर जल से भरे हुए-श्वेत, स्तिमित ( जड़ बने ) रूपों को देखता है ॥२०, २१॥
तथा रक्तेन रक्तानि तमसि विविधानि च ॥२२॥
हरितश्यावकृष्णानि धूमधूम्राणि चेक्षते ॥
रक्तज तिमिर में लाल, अन्धकारयुक्त, नानाप्रकार के हरे, श्यामवर्ण या कृष्ण, धुंवे से धुंधयालेपन रूप देखता है ॥२२॥
सन्निपातेन चित्राणि विप्लुतानि च पश्यति ॥२३॥
बहुधा वा द्विधा वाडपि सर्वाण्येव समन्ततः ।
हीनाधिकान्नान्यथवा ज्योतीष्यपि च पश्यति ॥२४॥
सन्निपातज तिमिर में—नानावर्ण के, विप्लुत ( सब जगह विखरे ), बहुत ( संख्या में कई ), या दो में फटे, सब रूपों को हीन या अधिक अङ्गोंवाला, चमक ( तारक ) को चारों ओर देखता है ॥२३, २४॥
पित्तं कुर्यात् परिम्लायि मृछितं रक्ततेजसा ।
पीता दिशस्तथोद्यन्तमादित्यमिव पश्यति ॥२५॥
विकीर्णमाणान् खद्योतेवृक्षान्तेजोभिरेव च ।
रक्त के तेज ( प्रसाद ) से मिला पित्त परिम्लायि रोग उत्पन्न करता है, इससे रोगी को दिशायें पीली दीखती हैं, उसे उगता हुआ सूर्य चारों ओर दीखता है। वृक्ष जुगुनुओं से भरे प्रतीत होते हैं—चमक दिखाई देती है ( जिस तिमिर में राग रंग आ जाता है, उसे कांच कहते हैं। जिसमें राग नहीं होता है, उसे परिम्लायि कहते हैं। जिसमें थोड़ा दिखाई दे—वह लिंगनाश है )।
वि० मन्तव्य—तिमिर की दशा में जैसे ऐनक के शीशों-भिन्न-भिन्न वर्ण के शीशों में से भिन्न-भिन्न वर्ण दिखते हैं, वैसे भिन्न वर्ण दिखते हैं ॥२५॥
वक्ष्यामि षड्विधं रागैलिङ्गनाशमतः परम् ॥२६॥
राग-रंग दृष्टि से छेः प्रकार का लिंगनाश इसके आगे कहता हूँ ।
वि० मन्तव्य—वर्ण के मेद से लिङ्गनाश ( मोतिया ) ६ प्रकार का माना जाता है ॥२६॥
रागोऽरणो मास्तजः प्रदिष्टः
पित्तात् परिम्लाय्यथवाडपि नीलः ।
कफात् सितः शोणितजस्तु रक्तः
समस्तदोषोऽथ विचित्ररूपः ॥२७॥
अरुण रंग वायु के कारण से, परिम्लायि ( पीला ) या नीलारंग पित्त से, श्वेत रंग कफ से, लाल रंग रक्त से तथा नानारंग सन्निपात से होते हैं ।
वक्तव्य—ये पाँच कांच ( रंगवाले लिंगनाश हैं ), छठा परिम्लायि रोग है, इसमें पीला रंग सात्विकी के वचन से मानकर छे कांच होते हैं, ऐसा डल्हन का कहना है ।
वि० मन्तव्य—अरुण आदि रङ्गों की अत्यन्त थोड़ी आमा होती है जो बहुत ध्यान देने पर ज्ञात होती है। नेत्रचिकित्सकों द्वारा निकाले गये बहुत से मोतियों को एक साथ रखकर देखा जाय तो अरुण आदि वर्णों की प्रतीति होती है ॥२७॥
रक्तजं मण्डलं दृष्टो स्थूलकाचानलप्रभम् ।
परिम्लायिनि रोगे स्यान्म्लाय्यानीलं च मण्डलम् ॥२८
दोषक्षयात् कदाचित् स्यात्स्वयं तत्र च दर्शनम् ।
लाया परिम्लायि ( रंगवाला कांच ) रोग में—मण्डल दृष्टि में रक्त से उत्पन्न होता है। मोटे कांच ( शीशा ) के समान, आग के समान ( लाली लिये ), घटनेवाला, तथा थोड़ी सी नीली झाँई का मण्डल होता है। कभी दोषों के क्षय से, स्वयं ही दृष्टि आ जाती है ।
वि० मन्तव्य—परिम्लायी नामक लिङ्गनाश रक्त एवं पित्त के संसर्ग से होता है ( देखिये श्लो० २५ ) इसलिये जिसमें रक्त बलवान् रहता है वह स्थूल ( मोटे ) कांच का सा तथा अरुणवर्ण की आभावाला होता है अन्यथा पित्त की प्रधानता रहने पर परिम्लायी नामक मण्डल ( मोतिया ) आनील-कुछ नीला होता है। इस रोग में पित्त एवं रक्त की अधिकता होने के कारण कभी कभी दोष अर्थात् संचित मल का स्वयं चिकित्सा के बिना ही क्षय-नाश हो जाने पर दर्शन—(दिखाई देना) हो जाता है अर्थात् पित्त की ऊष्मा से दोष संवय स्वयं भी कभी कभी पिघलकर बिलीन हो जाता है फलतः दिखने लगता है ॥२८॥
अरुणं मण्डलं वाताच्छव्वलं पुरुषं तथा ॥२९॥
पित्तान्मण्डलमानीलं कांस्याभं पीतमेव वा ।
श्लेष्मणा बहलं स्तिग्धं शङ्कुकुन्देन्दुपाण्डुरम् ॥३०॥
चक्षुष्यपलाशस्थः शुक्लो विन्दुरिवान्मभसः ।
संकुचत्यातपेऽत्यर्थं छायायां विस्तृतो भवेत् ॥३१॥
मुद्यमाने च नयने मण्डलं तद्विस्पृति ।
प्रवालपद्मपत्राभं मण्डलं शोणिताम्कम् ॥३२॥
दृष्टिरागो भवेत्चित्रो लिङ्गनाशे त्रिदोषजे ।
यथार्वं दोषलिङ्गानि सर्वेष्वेव भवन्ति हि ॥३३॥
वायु के कारण मण्डल अरुण वर्ण, चंचल और कठोर होता है। पित्त के कारण मण्डल ईषत् नीला, काँची की