सुश्रुत संहिता
Sushruta Samhita
महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)
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उत्तरतन्त्रम्
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दूरस्थान्यपि रूपाणि मन्यते च समीपतः ॥६॥ समीपस्थाणि दूरे च दृष्टेगोचरविभ्रमात् ।
यत्नवानपि चात्यर्थं सूचीपाशं न पश्यति ॥१०॥
दोष के दूसरे पटल में पहुँच जानेपर ( मेद में आश्रित होनेपर ) दृष्टि पहले पटल की अपेक्षा अधिक मलीन हो जाती है । रोगी आँखों के सामने मक्खी, मच्छर, बाल, जाले से, मण्डल, पताकायें, मृगवृष्णा की भाँति, कर्णकुण्डल, नक्षत्र आदि—अस्थिर नाना प्रकार की वस्तुएँ, वर्षा, अन्न (बादल), अन्धकार को देखता है । दृष्टि का विभ्रम होने से समीप की वस्तु को दूर और दूर की वस्तु को समीप में स्थित मानता है । बहुत कोशिश करने पर भी सूर्य की नोक को नहीं देख सकता ( सूर्य में धागा नहीं डाल सकता ) ॥७-१०॥
कश्चं पश्यति नाधस्तात्तृतीयं पटलं गते । महान्त्यपि च रूपाणि च्छादितानोब वाससा ॥११॥ कर्णनासाक्षियुक्तानि विपरीतानि वीक्षते । यथादोषं च रज्यते दृष्टिदोषे बलीयसि ॥१२॥ अधःस्थिते समीपस्थं दूरस्थं चोपरिस्थिते । पाश्वस्थिते तथा दोषे पाश्वस्थानि न पश्यति ॥१३॥ समन्ततः स्थिते दोषे संकुलानोब पश्यति । दृष्टिमध्यगते दोषे स एकं मन्यते द्विधा ॥१४॥ द्विधास्थिते त्रिधा पश्येद् बहुधा चानवस्थिते ।
दोष के तीसरे पटल में स्थित हो जाने पर रोगी ऊपर देख सकता है, परन्तु नीचे नहीं देख सकता । बड़े भारी रूपों को भी कपड़े से ढँपा अनुभव करता है । कान, नाक, आँख से युक्त होनेपर भी इनको कान-नाक आँख से हीन मानता है । दोष के दृष्टि के निचले भाग में स्थित होनेपर समीपस्थ वस्तु को नहीं देखता है । दोष के ऊपर के भाग में ( दृष्टि में ) स्थित होने पर दूर की वस्तु को नहीं देखता है । दोष के पाश्व में स्थित होने पर-पाश्व की वस्तु को नहीं देखता । दोष के दृष्टि में चारों ओर स्थित होने पर वस्तु को संकुचित हुआ देखता है । दोष के दृष्टि के मध्य में स्थित होने पर एक वस्तु के दो भाग देखता है । दोष के दो स्थानों पर स्थित होने पर वस्तु को तीन प्रकार से ( तीन भागों में ) देखता है । दोष के चंचल होने पर अनेक प्रकार से-अनेक भागों में देखता है । इस दोष को तिमिर कहते हैं ।
वि० मन्तव्य—जब तक दोष प्रथम, द्वितीय तथा तृतीय पटल में रहता है तब तक उत्क ( श्लो० ६-१४ ) लक्षण होते हैं—इस दशा का नाम “तिमिर” है । इसे पञ्चाव में “घुन्द” कहते हैं । यदि स्वस्थबुद्ध के अनुसार-पञ्चरात्रे सप्तरात्रे वा सावणार्ये रसाञ्जनम्—पाँच सात दिन पर रात्रि के समय रसवत अथवा किसी भी खाद्य अन्न का प्रयोग होता रहे तो
दृष्टि में दोष संख्य हो न हो और फलतः तिमिर नामक रोग भी न हो ॥११-१४॥
तिमिराख्यः स वै दोषः चतुर्थं पटलं गतः ॥१५॥ रुणद्वि सर्वतो दृष्टि लिङ्गनाशः स उच्यते । तस्मिन्नपि तमोभूते नाति रुढे महागदे ॥१६॥ चन्द्रादित्यौ सतक्षत्रावन्तरीचे च विद्युतः ।
निर्मलानि च तेजांसि भ्राजिष्णूनि च पश्यति ॥१७॥ चौथे पटल में पहुँचते ही दोष दृष्टि को सम्पूर्ण रूप में रोक देते हैं, इसको लिंगनाश कहते हैं । इस लिंगनाश में-अन्धेरा हो जाने पर, इस बड़े रोग के बहुत न बढ़ने पर, रोगी चन्द्रमा, सूर्य, नक्षत्र, अन्तरिक्ष में विद्युत, निर्मलतेज ( अग्नि आदि ), चमकनेवाले दूसरे रूपों को देख सकता है अन्य को नहीं ।
वि० मन्तव्य—वही दोष ( तिमिरोत्पादक दोष संख्य ) जब चतुर्थ पटल तक भर जाता है तब “लिङ्गनाश” कहलाता है इस दशा में लिङ्ग-दृष्टि का नाश हो जाता है किन्तु इसको प्रारम्भिक दशा में चन्द्र आदि चमकीली वस्तुएँ दिखलाई पड़ती हैं अन्य नहीं । यही ‘मोतियाविन्दु’ है । वाग्भट के शब्दों में-लिङ्गनाशं मलः कुर्वन् छादयेत् दृष्टिमण्डलम् । अर्थात् मल ( दोष संख्य ) लिंगनाश को करता हुआ दृष्टिमण्डल को ढँक लेता है । दिखना बन्द हो जाता है । यह स्मरणीय है कि इस रोग में दृष्टि का सर्वथा नाश नहीं होता है केवल दोष उसे ढँक देता है । क्योंकि जब यह दोष दूर हो जाता है-दृष्टि के आगे से हट जाता है-अथवा हटा दिया जाता है तब दिखने लगता है । देखिये लिंगनाश की चिकित्सा अगले अ० १७ में । इस लिंगनाश के दो नाम हैं १-नीलिका-नीला-काला मोतिया और २-काच-श्वेत मोतिया । यह दोष सन्नित होते-होते जब मोती का सा या मसूर की दाल का सा हो जाता है तब दिखना सर्वथा बन्द हो जाता है । वाग्भट के शब्दों में—दृढः कांचो दृशं कुर्यात् रजोधू-माऽऽवृताम् इव । ( वा० उ० अ० १२ ) ॥१५-१७॥
स एव लिङ्गनाशस्तु नीलिकाकाचसन्नितः । इसी लिंगनाश को नीलिका, काच नाम से कहते हैं । तत्र वातेन रूपाणि अमन्तीव स पश्यति ॥१८॥ आविलान्यरुणभानि व्याविद्धानि च मानवः । वायु के कारण उत्पन्न तिमिर में-मनुष्य रूपों को घूमता हुआ, मलिन ( धुंधलाया ), लाल वर्ण का, और टेढ़ा-मेढ़ा देखता है ॥१८॥
पितेनादित्यस्खोतशकचापतद्विदुगुणान् ॥१९॥ श्रिखबह्विचित्राणि नीलकुण्ठानि पश्यति । पित्तज तिमिर में-सूर्य, जुगन्, इन्द्रघनुष, विद्युत के उमान, या मोर की पिच्छा की भाँति विचित्र, नीला-काला देखता है ॥१९॥