सुश्रुत संहिता
Sushruta Samhita
महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)
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सुश्रुतसंहिता
[ अ० ७ ]
मुदार्कणं यत् प्रतिबोधने च
शुष्काक्षिपाकोपहतं तदक्षि ॥२६॥
जिसमें पलक सिकुड़ी हुई, कठिन, रूक्ष होती है, देखने में धुंधलापन दिखाई दे, आँख को खोलने में जब अतिशय कठिनाई हो, उस आँख को शुष्काक्षिपाक कहते हैं ॥२६॥
यस्यावटूकर्णशिरोहनुस्थो
मन्यागतो वाऽप्यनिलोऽन्यतो वा ।
कुर्यादुजोऽति भ्रवि लोचने वा
तमन्यतो वातमुदाहरन्ति ॥२७॥
जिसमें वायु-श्रीवा के पिछले भाग, कान, शिर, हनु, या मन्या में स्थित, अथवा पीठ में स्थित होकर, भ्रू में और आँख में तीव्र वेदना करती है उसको अन्यतोवात कहते हैं ॥२७॥
अस्लेन मुक्तेन विदाहिना च ।
संज्ञाद्यते सर्वत एव नेत्रम् ।
शोफान्वितं लोहितकैः सनीलै-
रेतादगम्लाध्युषितं वदन्ति ॥२८॥
खटाई एवं विदाही भोजन के खाने से आँख सम्पूर्णरूप में शोफयुक्त, सुखी और थोड़े नीलेपन से ढँप जाती है। इस प्रकार की आँख को अम्लाध्युषित कहते हैं ॥२८॥
अवेदना वाऽपि सवेदना वा
यस्याक्षिराज्यो हि भवन्ति ताभ्राः ।
मुहुर्विरज्यन्ति च ताः समन्ताद्
न्याधिः सिरोत्पात इति प्रदिष्टः ॥२९॥
वेदना के बिना या वेदना के साथ जिसकी आँख की रेखायें ताम्रवर्ण हो जाती हैं, ये रेखायें बार-बार चारों ओर से सुखी रहित हो जाती हों, इस रोग को सिरोत्पात कहते हैं ॥
मोहात् सिरोत्पात उपेक्षितस्तु
जायेत रोगस्तु सिराप्रहर्षः ।
ताभ्राच्छमच्छं स्रवति प्रगाढं
तथा न शक्नोत्यभिबीक्षितुं च ॥३०॥
अज्ञानवश सिरोत्पात रोग की उपेक्षा करने से सिराप्रहर्ष रोग होता है। इससे ताम्रवर्ण, निर्मल, गाढ़ा अश्रु बहता है। इसमें रोगी निरन्तर नहीं देख सकता।
वि० मन्तव्य—सिरोत्पात रोग में सिराओं में बार २ रक्त भर जाता है, फलतः वे लाल हो जाती हैं और रक्त लोट जाने पर पुनः पूर्ववत् हो जाती हैं। सिराप्रहर्ष में उन रक्तपूर्ण सिराओं में से रक्त चूने लगता है फलतः लाल अश्रु बहने लगते हैं ॥३०॥
इति सुश्रुतसंहितायामुत्तरतन्त्रे सर्वगतरोगविज्ञानीयोः
नाम षष्ठोऽध्यायः ॥६॥
सप्तमोऽध्यायः
अथातो दृष्टिगतरोगविज्ञानीयसम्भ्यायं व्याख्यास्यामः ॥१॥ यथोवाच भगवान् धन्वन्तरिः ॥२॥
अय इसके आगे दृष्टिगत रोगविज्ञानीय अध्याय का व्याख्यान करेंगे—जैसा कि भगवान् धन्वन्तरि ने कहा था।
वि० मन्तव्य—इस अध्याय में दृष्टिमण्डल के रोगों का वर्णन है ॥१,२॥
मसूरदलमात्रां तु पञ्चभूतप्रसादजाम् ।
खयोतबिस्फुलिङ्गाभामिन्द्रां तेजोभिरज्ययैः ॥३॥
आवृतां पटलेनाङ्गुषोर्बहिन् विवराकृतिम् ।
जीतसात्स्यां नृणां दृष्टिमाहुर्नयनचिन्तकाः ॥४॥
दृष्टि—का प्रमाण मसूर के पत्ते के बराबर है, यह पृथ्वी आदि पांच भूतों के सार से उत्पन्न हुई है। जुगन् के एवं सूक्ष्म अग्निकण के समान चमकनेवाले, उपचय एवं अपचय रहित तेजसे युक्त, आँख के बाह्यपटल से ढँपी, गोल छेदवाली (बिल के समान), शीतलवस्तु के सात्त्व्यवाली मनुष्यों की दृष्टि है, ऐसा आँख को समझनेवाले कहते हैं।
वक्तव्य—कहा भी है—दृष्टिस्तेजोमयीप्रोक्ताः शुक्लं तेजश्च केवलम्। तस्माद् दृष्टिबलापेक्षी तेजोबुद्धि समाचरेत् ॥ आँख को शीत सात्त्व्य है, इसीसे कहा है—“पद्मोत्पलपलाशोर्वा स्वेद्यः संवृत्य चक्षुषी” ॥ च० चि० सू० अ० १४। पृथ्वी-अप-तेज का आपस में कोई विरोध नहीं, चूँकि ये एक साथ उत्पन्न होते हैं, और इनका कार्य भी एक है। अथवा प्रभाव के कारण—जल के अन्दर रहनेवाला तेज भी नष्ट नहीं होता (यथा वङ्गवानल-विद्युत्शक्ति)। इसीसे कहा है—“विरुद्धेरपि न त्वेते गुणैर्नन्ति परस्परम्। दोषाः सहजसात्त्व्यत्वाद् विषं घोरम-हीनिव ॥ चरक० चि० अ० २६, २६३ ॥३,४॥
रोगास्तद्वशाश्यान् घोरान् षट् च षट् च प्रचक्षमहे ।
पटलानुप्रविष्टस्य तिमिरस्य च लक्षणम् ॥५॥
दृष्टि में आश्रित भयानक बारह रोगों के तथा पटल में प्रविष्ट तिमिररोग के लक्षणों को कहूँगा ॥५॥
सिराभिरभिषंप्राप्य विगुणोऽभ्यन्तरे भुञ्जाम् ।
प्रथमे पटले दोषो यश्य दृष्टो व्यवस्थितः ॥६॥
अव्यक्तानि स रूपाणि सर्वाण्येव प्रपश्यति ।
दूषित हुए दोष सिराओं द्वारा बहुत अन्दर प्रविष्ट होकर दृष्टि में प्रथम पटल के अन्दर स्थित हो जाते हैं, तब रोगी सब रूपों को धुंधला सा देखता है ॥६॥
दृष्टिभूशं बिह्वलति द्वितीयं पटलं गते ॥७॥
मक्षिका मशकान् केशाञ्चालकानि च पश्यति ।
मण्डलानि पताकाश्च मरीचीः कुण्डलानि च ॥८॥
परिप्लवाश्च विविधान् वर्षमधं तमांसि च ।