सामग्री पर जाएँ
भारतकोश
सुश्रुत संहिता

सुश्रुत संहिता

Sushruta Samhita

महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished872 पृष्ठ

पृष्ठ 665, कुल 872 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 665

अ० ६ ] ७७

उत्तरतन्त्रम्

६०६

हो—ऐसा जलता है, पका हुआ, किनारे सजे हुए, पसीना-युक्त, पीला दीखता है, रोगी को मूँछों, शिर में दाह रहता है ॥ शोफजन्नाति संरुधं स्नायकण्डूसमन्वितम् । शैत्यगौरवपैच्छित्यदृषिकाहर्षणान्वितम् ॥१६॥ रूपं परयति दुःखेन पांशुपूर्णमिवोविलम् । नासाधमानशिरोदुःखयुतं श्लेष्माधिमन्थितम् ॥१७॥ कफज अधिमन्थ में—आँख सूजी हुई, बहुत अधिक लाल नहीं, स्नाय एवं कण्डूयुक्त, शीतल, भारी, पिच्छलता, मैल (गीच), हर्ष (रोमाञ्चता पलकों के बाल खड़े) युक्त होती है । रूप को कठिनाई से देखती है, और जो देखती है, वह पुष्पाला-धूल से भरा मैला दीखता है । इसमें नासा का आध्यान, शिर में वेदना रहती है ॥१६,१७॥

बन्धुजीवप्रतीकांशं तास्यति स्पर्शनाक्षमम् । रक्तास्त्रावं सनित्तोदं परयत्यग्निनिभा दिशः ॥१८॥ रक्तभग्नाग्निघ्नवृच्छ कृष्णभागश्च लक्ष्यते । यहीमं रक्तपयनं तद्रक्षतेनाधिमन्थितम् ॥१९॥

रक्ताधिमन्थ में—आँख दुपहरिया के फूल के समान लाल, पुष्पाली सी, देखने में असमर्थ, आँसू में लाली, चुभने की दर्द, चारों ओर आग लगी सी देखती है । आँख का काला भाग रक्त में लाल किये अरीठे की भांति दीखता है । दाह युक्त होता है किनारों पर लाली रहती है ॥१८,१९॥

हन्यादृष्टि सप्तरात्रात् कफोत्थोऽधीमन्थोऽस्तु कसंभवः पञ्चरात्रात् । पङ्कात्राहि मारुतोत्थो निहन्थान् मिथ्याचारात् पैत्तिकः सद्य एव ॥२०॥

कफजन्थ अधिमन्थ सात दिन में, रक्तजन्थ अधिमन्थ पाँच दिन में, वातजन्थ अधिमन्थ छै दिन में, पैत्तिक अधिमन्थ मिथ्या आचार से तुरन्त ही दृष्टि को नष्ट कर देता है ।

वि० मन्तव्य—मिथ्याचारात्—अधिमन्थ मिथ्या आहार विहार करने से उक्त अवधि में दृष्टि को नष्ट करता है अन्यथा नहीं ॥२०॥

कण्डूपदेहाश्रयुतः पक्वोदुम्बरसन्निभः । दाहसंहर्षताम्रत्वशोफनिस्तोदगौरवैः ॥२१॥

जुष्टो मुहुः स्नेवेच्छास्त्रमुष्णशीताम्बु पिच्छलम् । सरम्भो पक्ष्यते यश्च नेत्रपाकः सशोफजः ॥२२॥

सशोफ पाक—जिस नेत्र पाक में—कण्डू, गीच का आना, आंसू, पके हुए गूलर के समान आँख (लाल), आँख में जलन, रगड़, लाली, सूजन, चुभने की सी दर्द, भारीपन के साथ उष्ण, या शीत पिच्छल आंसू बार-बार बहते हों, सूजन-पक जाये, वह नेत्रपाक सशोफज है ।

वि० मन्तव्य—नेत्रपाक—यह दो प्रकार का होता है, १—शोफजन्तित । इसमें नेत्र बुदबुद फोड़ा बन जाता है और आगे चलकर नष्ट हो जाता है और “काना” हो जाता है । २—अशोफज-फोड़ा न होकर बुदबुद सूख जाता है, कभी २ बहुत छोटा होकर रह भी जाता है ॥२१,२२॥

शोफहीनानि लिङ्गानि नेत्रपाके त्वशोफजे । अशोफज नेत्रपाक में सूजन से रहित सब लक्षण रहते हैं ।

उपेक्षणादक्षि यदाऽधिमन्थो वातात्मकः सादयति प्रसन्नः ।

रुजाभिरुग्राभिरसाध्य एष हताधिमन्थः खलु नाम रोगः ॥२३॥

वातज अधिमन्थ जब उपेक्षा करने पर आँख को बलात् सुखा देता है, इसमें अतिशय तीव्र वेदना होती हो, तब यह हताधिमन्थ नाम का रोग कहा जाता है ।

वि० मन्तव्य—हताधिमन्थ—इसमें नेत्र की ज्योति—दृष्टि नष्ट हो जाती है और बुदबुद सूखकर छोटा भी हो जाता है । इसके पश्चात् वेदना आदि शान्त हो जाते हैं । कभी २ कृष्ण-मण्डल श्वेत भी हो जाता है । हताधिमन्थ का वर्णन विदेह के शब्दों में सुनिये—

अन्तर्गतः खिराणां तु यदा विष्टति मारुतः । स तदा नयनं प्राप्य शीघ्रं दृष्टि निरस्यति ।

तस्यां निरस्यमानायां निर्मन्यन् इव मारुतः । नयनं निर्वमति—आशु शूलतोदाधिमन्थनैः ।

अथवा शोषयेत् अक्षि क्षीणतेजो बलात् अयम् । तत् पञ्चमिव संशुष्कं अवसीदति लोचनम् ।

हताधिमन्थं तं विद्यात् असाध्यं वातकोपतः ॥२३॥ अन्तःखिराणां श्वसनः स्थितो दृष्टि प्रतिलिपन ।

हताधिमन्थं जनयेत्तमसाध्यं विदुर्बुधाः ॥२४॥ जब वायु अन्दर की खिराओं में स्थित होकर दृष्टि को बाहर की ओर निकालती प्रतीत होती है (दृष्टि बाहर निकलती प्रतीत हो), तब यह हताधिमन्थ असाध्य है ॥२४॥

पद्मद्वयाक्षिभ्रुवमाश्रितस्तु यत्रानिलः संचरति प्रदुष्टः ।

प्रयौयशश्चापि रुजः करोति तं वातप्रयौयमुदाहरन्ति ॥२५॥

दूषितवायु जिसमें दोनों पलक, आँख, भ्रू, में आश्रित होकर गति करती है, और कभी भ्रू में कभी आँख में कभी पलकों में वेदना करती है, इसको वातप्रयौय कहते हैं ॥२५॥

यत् कृणितं दारुणरूक्षवत्सं विलोकने चाविलदर्शनं यत् ।