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भारतकोश
सुश्रुत संहिता

सुश्रुत संहिता

Sushruta Samhita

महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished872 पृष्ठ

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पृष्ठ 664

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षष्ठो ऽध्यायः

अथातः स्ेगतरोगविज्ञानीयमध्यायं |

॥९॥ यथोवाच भगवान्‌ धन्वन्तरिः ॥२॥

अब इसके आगे सवगत रोगविज्ञानीय अध्याय का व्याख्यान

करेगे- जेखा कि भगवान्‌ धन्वतरि ने कदा था।

ते - ५ वि° मन्तव्य- इस अध्यायमे उन रोगोंका वणन है जिनका प्रभाव नेच के सब्र अवयवो पर पड़ता है ॥१,२॥

स्यन्दास्तु चत्वार इहोपदिष्टा-

स्तावन्त एवेह तथाऽधिमन्थाः।

शोफान्वितोऽओोष्ठयुतश्च पाका-

वित्येवमेते द संप्रदिष्टाः ।३॥ ह ताधिमन्थोऽनिख्पयंयश्च |

शष्काक्षिपाकोऽन्यत एव वातः | ष्टिस्तथाऽम्छाध्युषिता सिराणा- स॒त्पातहरषीवपि सबंभागाः॥४।॥ खवंगत रोगों मे-अभिष्यन्द चार-चार ही अधिमन्ध, सशोफपाक, गर अशोफयाक, ये दस रोग, इताधिमन्थ, वात- पयय, शुष्काश्चिपाक, अन्यतोवात, अग्लाध्यु घट्ट, सिरोलात ओर सिराहषं ये सात, कु भिलाक्रर सतरह रोग दै ।

वि° मन्तव्य--अमिष्यन्द-- यह “ओंख दुखनाः “आंख आना” कहकाता है। अधिमन्थ--अभिष्यन्द्‌ की उचित चिकितसा न होने पर अथवा मिथ्या आहार विहार से हयो जातां हे यह “सम्बर वायुः” तथा पंजाब मे ““उल्लं” कहता है ॥ प्रायेण सवे नयनामथास्तु |

भवन्त्यभिष्यन्दनिमित्तमूखाः । <. तस्मादभिष्यन्दमुदीयमाण- ` | सुपाचरेदाञ॒ हिताय धोमान्‌ ॥(५॥

प्रायः करके आंख के सव रोग अभिष्यन्द के कारण से

उत्पन्न होते हे । इसल्यि बुद्धिमान्‌ मनुष्य बढ़ते दए अभि-

ष्य॒न्द कौ चिकित्सा शोध करे ॥५॥

निस्तोदनं स्तम्भनरोमहष-

| संघषपारुष्यशिरोभितापाः। विञयुष्कभावः शिचिरश्रताच

वाताभिपन्ने नयने भवन्ति ॥६॥ वातामिष्यन्द्‌ मेँ सुह चुमने की वेदना स्तन्धता,. रोमांच; रगढ़ का अनुभव, कठोरता, शिर मे ददं, आंख में शुष्कता, ठण्डे आसुरो का आना होता है 1 (साध्य) ॥६॥ दाहशरपाको शिशिराभिनन्दा धूमायनं बाष्पससुच्छंयश्च । खष्णाश्रता पीतकनेत्रता च . पित्ताभिपन्ने नयने भवन्ति ॥७॥ पित्तामिष्यन्द्‌ मेदा, पकना, शीत कौ चाह,

सुश्रतसंहिता ।

निकलने का अनुमव, अभु की अधिकता, आसुरं का गरम ।

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च ॥ 4 ~ ` 1 .

॥ अश ६ | &

होना, आंखों मे पीलापन होता है (साध्य है) ।७॥ उष्णाभिनन्दा गुरुताऽक्षिशोष्ठः कण्डूपदेहो सितताऽतिशेस्यम्‌ । स्राघो सुहुः पिच्छिख एव चापि `

कृफाथिपन्ने नयने भवन्ति ॥६॥

कफामिष्यन्द मं--उष्ण को चाह, भारीपन, आंखों प

सूजन, कण्ट, मेर का आना, सफेदी, बहुत शौतलता, बार-बार ओर पिच्छिल साव होता है ॥८] ताभ्राश्रृता खोहितनेत्रता च

राञ्यः समन्तादतिरोष्िताश्च |

पित्तस्य चिङ्गानि च यानि तानि

रक्ताभिपन्ने नयने भवन्ति ॥€॥ हः रक्तामिष्यन्द मेरु लाली ल्थि, आंखों में सुलीं

चारों ओर आख मे बहुत लार रेखयं, तथा पित्त के अभि. ष्य॒न्द्‌ के लक्षण रहते हैँ ॥६॥ रद्रेतेरभिष्यन्देनेराणामक्रियावताम्‌ । तावन्तस्स्वधिमन्थाः स्युनेयने तीघ्रवेदनाः ॥१०॥ चिकित्सा न करने बाहे मनुष्यों में बही अभिष्यन्द्‌ बद़कर |

इतने ही (चार हो) अधिमन्य करते दै, जिनसे आंखों मे तीर वेदना होती है ॥१०॥ | उत्पाठ्यत इवात्यथे नेत्रं निमंथ्यते तथा । शिरसोऽधः च तं विद्याद्धिमन्थं स्वरक्चणेः ॥११॥ ने बाहर निकलता (करता) प्रतीत होता है, नेत्र ओर ॥

शिर का आधा भाग (जिधर की जख हो) मथता हआ प्रतीत |

होता हे (वेदना बहुत होती है), ये अधिमन्थ के सामान्य

लक्षण हे ॥११॥ |

नेत्रमुखाख्यत इव मथ्यतेऽरणिवच्च यत्‌ ।' संघषेतोदनिभमदमांससंरब्धमाविलम्‌ ॥१२॥ कुच्चनास्फोटनाभ्मानवेपथुभ्यथतेयतम्‌। शिरसोऽध" च येन स्यादधिमन्थः स मारुतात्‌ ॥११॥ | वातज अधिमन्थ मै- ने उखङता ( बाहर अता) || प्रतीत होता. दै, अरण से मथने के समान नेत्र में पीडा, रग, ,॥ तोद्‌ श्र से चीरने की सी वेदना, सूजन, गदलापन, संडचित ||

होना (सिकुड़ना; प्रकाश मे भिचना), फटना, आध्मानः. कमनः || आधे शिर में पीड़ा होती है ॥१२,९३॥ रक्तराजिचितं सावि वहिनेवावदद्यते । यङपिण्डोपमं दाहि क्षारेणाक्तमिव क्षतम्‌ ॥१४॥ प्पक्वोच्छूनवतमान्तं सस्वेदं पीतदञनम्‌। ` ^

मूच्छोलिरोदाहयुतं पित्तनाद्यधिसन्थितम्‌॥१५॥ 1

` पित्तज अधिमन्थ में-र्आख लार रेखाओं से -भरी लाव

युक्त, अग्नि की मतिं जलती है, यह नेत्र यकृत्‌ पिण्ड क.मा

धूम , ( लाल-काला ) जकनयुक्त; मे नण पर जैसे नमक मक 1१ | त + {

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