सुश्रुत संहिता
Sushruta Samhita
महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)
पृष्ठ 663, कुल 872 में से
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उत्तरतन्त्रम्
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पञ्चमोऽध्यायः
अथातः कृष्णगतरोगविज्ञानीयसध्यायं व्याख्यास्यामः ।
यथोवाच भगवान् धन्वन्तरिः ॥१॥
अब इसके आगे कृष्णगतरोगविज्ञानीय अध्याय का व्याख्यान करेंगे—जैसा कि भगवान् धन्वन्तरि ने कहा था ।
वि० मन्तव्य—इस अध्याय में कृष्ण मण्डल के रोगों का वर्णन है ॥१,२॥
यत् सन्नपं शुक्रं (कल) मथात्रणं वा
पाकात्ययश्चाप्यजका तथैव ।
चत्वार एतेऽभिहिता विकाराः
कृष्णाश्रयाः संप्रहृताः पुरस्तात् ॥१॥
सन्नपशुक्र, अन्नपशुक्र पाकात्यय और अजका, ये चार रोग कृष्ण भाग में होनेवाले पहले कह दिये हैं ॥१॥
निसर्गरूपं हि भवेत्तु कृष्णे
सूच्येयं विद्वं प्रतिभाति यद्भे ।
स्त्रावं स्रवेदुष्णमतीव रक्तं च
तत् सन्नपं शुक्रं (कल) मुदाहरन्ति ॥४॥
कृष्ण भाग में अन्दर को दवा हुआ एवं सूर्य से विद्व हुआ (गोल) प्रतीत होता है, अति उष्ण स्त्राव बहता है, वेदना होती है, इसको सन्नप शुक्र कहते हैं । (विदेह ने—इसे रक्त-राजीनिमें कृष्णे विद्वमायं प्रलक्ष्यते । सूच्यग्रेणैव तच्छुक्रमुष्णा-शुखावि सन्नपम्) ॥४॥
हृष्टेः समीपं न भवेत्तु यन्म
न चावगाढं न च संस्रवेद्वि ।
अवेदनावन्न च युग्मशुक्रं
तस्मिन्निमाप्नोति कदाचिदेव ॥५॥
जो शुक्र हृष्टि के समीप न हो और न तो बहुत गहरा हो, न उससे स्त्राव होता हो, किसी प्रकार की वेदना न हो और दो-एक साथ न हो (अकेला हो), वह सन्नप शुक्र कभी ठीक हो सकता है ॥५॥
विच्छिन्नमध्यं पिशिताश्रुतं वा
चलं सिरासक्तमहट्टिकृच्छ्र ।
द्वित्वमगतं लोहितमन्ततश्च
चिरोस्थितं चापि विवर्जनीयम् ॥६॥
उष्णाश्रुपातः पिडका च कृष्णे
यस्मिन् भवेन्मुदगतिभं च शुक्रम ।
तदप्यसाध्यं प्रबदन्ति केचि—
दन्त्यश्च यत्तिस्तिरिपक्षतुल्यम् ॥७॥
जो शुक्र बीच से कटा हो (दो में विभक्त), या माँस से टंगा हो, सिराओं में आसक्त हो, चिपका हो, हिलता रहता हो, देखने में बाधा करता हो, दो स्वचाओं के बीच में आया हो,
किनारों से लाल हो, पुरातन हो, वह असाध्य है । जिस शुक्र में गरम आंसू झरते हों, कृष्ण भाग में पिडिका हो, शुक्र मूँग के समान हो उसे भी कई असाध्य कहते हैं, इसी प्रकार जो शुक्र तीतर के पक्ष के समान (कई रंग का चित्र कबरा) होता है, वह भी असाध्य है ॥६॥
सितं यदा भात्यसितप्रदेशे
स्यन्दात्मकं नातिरुगश्रुयुक्तम् ।
विहायसीवाच्छ्वनानुकारि
तदन्नपं साध्यतमं वदन्ति ॥८॥
कृष्णभाग में जब सफेदी दीखती हो, जो सफेदी अभि-ष्यन्द के कारण से उत्पन्न हुई हो, जिसमें बहुत वेदना एवं बहुत अश्रु न हों, आकाश में निर्मल पतले मेघ के समान दीखता हो, वह अन्नप शुक्र साध्य है । (यह रक्तज है, साध्य है) ।
वि० मन्तव्य—शुक्र—इसे फूल या फूली कहते हैं यह कृष्णमण्डल में श्वेत या श्वेताभ दिखाई पड़ता है । यह दो प्रकार का होता है—१—सन्नपशुक्र—यह आँख चुभने से होता है और २अन्नपशुक्र—यह आँख दुखने से हो जाता है । शीतला के कारण जो शुक्र होता है वह असाध्य होता है ॥८॥
गम्भीरजातं बहलं च शुक्रं
चिरोस्थितं चापि वदन्ति कृच्छ्रम् ।
जो शुक्र गहरा हो, मोटा हो, देर का उत्पन्न हो, वह (अन्नप) शुक्र भी कष्ट साध्य है ।
सच्छाद्यते श्वेतनिभेन सर्वं
दोषेण यस्यासितमण्डलं तु ॥९॥
तमस्मिपाकात्ययमस्मिकोप-
समुत्थितं तीव्ररुजं वदन्ति ।
सफेदी के समान दोष से जिस पुरुष का सारा काला भाग ढांप लिया जाता है, जो कि आंख के दुखने से उत्पन्न होता है, अतिशय वेदना होती है उसे अस्मिपाकात्यय कहते हैं ॥९॥
अजापुरीषप्रतिभो रुजावान्
सलोहितो लोहितपिच्छलाश्रुः ।
विद्वार्य कृष्णं प्रचयोऽभ्युपैति
तं चाजकाजातमिति व्यवस्येत् ॥१०॥
जो बकरी की माँगनी के समान आकार में, वेदना युक्त, थोड़ा लाल, लाल एवं पिच्छल, आंसू जिसमें बहते हों, कृष्ण-भाग को विदीर्ण करके, जो कि (मेद से) बढ़ता है, उसको 'अजका' कहते हैं । (कफजन्म एवं असाध्य है) ॥१०॥
इति सुश्रुतसंहितायामुत्तरतन्त्रे कृष्णगतरोगविज्ञानोऽयं नाम पञ्चमोऽध्यायः ॥