सुश्रुत संहिता
Sushruta Samhita
महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)
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सुश्रुतसंहिता
[ अ० ४ ]
का प्रतिधारण करने पर बाल का मार्ग ही अवरुद्ध हो जाता है, अतः सदा के लिये उस रोग से मुक्ति मिल जाती है ॥१६,३०॥
इति सुश्रुतसंहितायामुत्तरतन्त्रे वर्त्तगतरोगविज्ञानीयो नाम तृतीयोऽध्यायः ॥ ३ ॥
चतुर्थोऽध्यायः
अथातः शुक्लगतरोगविज्ञानीयमध्यायं व्याख्यास्यामः ॥१॥
यथोवाच भगवान् धन्वन्तरिः ॥२॥
अब इसके आगे शुक्लगत रोग विज्ञानीय अध्याय का व्याख्यान करेगे—जैसा कि भगवान् धन्वन्तरि ने कहा था ।
वि० मन्तव्य—इस अध्याय में शुक्ल मण्डल के रोगों का वर्णन है ॥१,२॥
प्रस्तारिशुक्लक्षतजाधिमांस-
स्नाय्वर्मसंज्ञाः खलु पञ्च रोगाः ।
स्युः शुक्तिका चार्जुनपिष्टको च
जालं सिराणां पिडकाश्च याः स्युः ॥३॥
रोगा बलासप्रथितेन सार्ध-
मेकादशाङ्गोः खलु शुक्लभागे ।
आँख के शुक्ल भाग में ग्यारह रोग होते हैं, यथा—प्रस्तारिअर्म, शुक्लअर्म, क्षतअर्म, अधिमांसअर्म, स्नायुअर्म ये पाँच, शुक्तिका, अर्जुन, पिष्टक, सिराजाल, सिरापिडिका, और बलासप्रथित ये ग्यारह रोग आँख के शुक्ल भाग में होते हैं ॥३॥
प्रस्तारि प्रथितमिहार्म शुक्लभागे
विस्तीर्णं तनु रुधिरप्रभं सुनीलम् ॥४॥
प्रस्तारिअर्म—शुक्लभाग में—फैला हुआ पतला, रक्त की आभावाला थोड़ी सी नीली झाँके लिये होता है ।
वि० मन्तव्य—अर्म नेत्र के शुक्ल मण्डल में ( श्वेत भाग में होनेवाला चिह्न है । इसे समझने के लिये विदेह का वचन सहायक हो सकता है । यथा—
समन्तात् विस्तृतः श्यावो रक्तो वा मांससञ्चयः ।
सन्निपातेन दोषाणां प्रस्तारि अर्मं तत् उच्यते । ६० टी०
नेत्र के दूसरे पटल में मांस रहता है, वही विकृत हो जाता है, जो अर्म का रूप धारण कर लेता है । देखिये उ० अ० १ श्लो० १८ ॥ ४ ॥
शुक्लाख्यं मृदु कथयन्ति शुक्लभागे
सरवेतं सममिह वर्धते चिरेण ।
शुक्लअर्म—शुक्लभाग में ईषत् श्वेतवर्ण कोमल, समान, ढेर में बढ़ता है । साध्य है ।
यन्मांसं प्रचयमुपैति शुक्लभागे
पद्मार्भं तदुपदिशन्ति लोहिताम् ॥५॥
जो मांस शुक्लभाग में बढ़ जाता है, लाल कमल के रंग का रहता है, उसको लोहितार्भ कहते हैं ॥५॥
विस्तीर्णं मृदु बहलं यकृतप्रकाशं
श्यावं वा तदधिकमांसजार्भं विद्यात् ।
जो अर्म—फैला हुआ, कोमल, मोटा, यकृत के समान या काला होता है, उसको अधिक मांसजअर्म कहते हैं ।
शुक्ले यत् पिशितमुपैति वृद्धिमेतत्
स्नाय्वर्मत्यभिपठितं खरं प्रपाण्डु ॥६॥
शुक्लभाग में जो मांस बढ़कर कर्कश एवं पाण्डुवर्ण हो जाता है, उसको स्नाय्वर्म कहते हैं ॥६॥
श्यावाः स्युः पिशितनिभाश्च बिन्दवो ये
शुक्त्याभाः सितनयने स शुक्तिसंज्ञः ।
काले, मांस के समान (लाल), जो बिन्दु सिन्धु के समान (कुछ लम्बे) श्वेतभाग में होते हैं, उनको शुक्ति कहते हैं ।
एको यः शङ्करधिरोपमस्तु बिन्दुः
शुक्लस्थो भवति तमर्जुनं बद्धन्ति ॥७॥
शुक्ल भाग में, शंशक के रक्त के सहरशु अकेला ही जो एक बिन्दु होता है, उसको अर्जुन कहते हैं ॥७॥
उत्सन्नः सलिलनिभोऽथ पिष्टशुक्लो
बिन्दुयोर्यो भवति स पिष्टकः सुवृत्तः ।
चावलों की पिडी के समान श्वेत, पानी के समान निर्मल, उठा हुआ बिन्दु होता है, उसे पिष्टक कहते हैं, यह गोल होता है । ( कफजन्य एवं साध्य है ) ।
जाठाभः कठिनसिरो महान् सरक्तः
सन्तानः स्मृत इव जालसंज्ञितस्तु ॥८॥
अनुलोम—विलोम रूप, फैले सिरा समूहों के कारण जाल की भाँति—कान्तिवाला, कठिन सिराओंसे युक्त, बड़ा, ईषत्तर्क, सिराओं के सन्तानयुक्त (एक-दूसरे से लगातार मिली सिराका) सिराजाल कहलाता है, यह रक्तज और साध्य है ॥८॥
शुक्लस्थाः सितपिडकाः सिराद्युता यास्ता
विद्यादसितसमीपजाः सिराजाः ।
शुक्ल भाग में काले भाग के समीप, सिराओं से घिरी जो श्वेत पिडका है, उसे सिराज पिडका कहते हैं ।
कांस्याभो भवति सितेऽम्बुबिन्दुतुल्यः
स ज्ञेयोऽमृदुररुजो बलासकारव्यः ॥९॥
श्वेत भाग में जल बिन्दु के समान, कांसी की झाँकेवाला, कठिन, वेदना रहित-बलासक कहाता है ॥९॥
इति सुश्रुतसंहितायामुत्तरतन्त्रे शुक्लगतरोगविज्ञानीयो
नाम चतुर्थोऽध्यायः ॥४॥