सुश्रुत संहिता
Sushruta Samhita
महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)
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उत्तरतन्त्रम्
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धो भी दिया जाता है तथापि निमेष के समय जब दोनों वर्त्म मिलते हैं तब चिपक जाते हैं—सट जाते हैं और उन्मेष के समय वर्त्मों को खोलने के लिये प्रयत्न करना पड़ता है। देखिये इस रोग के किसी रोगी को और ध्यान दीजिये कि वह निमेष एवं उन्मेष कैसे करता है ॥२२॥
विमुक्तसन्धि निश्चेष्टं वर्त्मं यस्य न मील्यते ।
प्रतद्रातहतं विद्यात् सरुजं यदि वाऽरुजम् ॥२३॥
सन्धि में ढीला होकर, बिना क्रिया के जिसके पलक नहीं बन्द होते, वेदना हो, या न हो उसे वातहत कहते हैं, यह असाध्य है ॥२३॥
वर्त्मान्तरस्थं विषमं ग्रन्थिभूतमवेदनम् ।
विब्रण्यमर्बुदं पुंसां सरक्तमवलम्बितम् ॥२४॥
जिस रोगी के पलक के अन्दर के भाग में—कष्टदायक, परन्तु वेदनारहित, ग्रन्थि के समान गाँठ हो जाती है, उसको अर्बुद कहते हैं, इसमें थोड़ी सी रक्तमा ( पित्त के कारण ) रहती है ॥२४॥
निमेषिणीः सिरा वायुः प्रविष्टो वर्त्मसंश्रयाः ।
चालयत्यति वर्त्मानि निमेषः स गदो मतः ॥२५॥
पलक में स्थित निमेषिणी ( पलक को बन्द करनेवाली ) सिरा में पहुँची वायु, जब पलकों को अतिशय रूप में चलाती है, उसे निमेष रोग कहते हैं। इसमें रोगी जल्दी जल्दी पलक, चपकता रहता है ॥२५॥
छिन्नारिच्छन्ना विवर्धन्ते वर्त्मस्था मृदबोङ्कराः ।
दाहकण्डूरुजोपेतास्तेऽर्शः शोणितसंभवाः ॥२६॥
पलक में स्थित कोमल अंकुर, बार-बार काटने पर जो बढ़ जाते हैं, दाह एवं कण्डू से युक्त रहते हैं, इनको अर्श कहते हैं, ये रक्तजन्य होते हैं ॥२६॥
अपाकः कठिनः स्थूलो ग्रन्थिवर्त्मभवोऽरुजः ।
सकण्डूः पिच्छिता कोलप्रमाणो ल्गणस्तु सः ॥२७॥
लगण—न पकनेवाली, कठिन, स्थूल, वेदनारहित, पलक में उत्पन्न, बेर के समान ग्रन्थि को लगण कहते हैं, इसमें कण्डू और पिच्छलता रहती है ॥२७॥
शूनं यद्वर्त्मं बहुभिः सूदमैरिच्छद्रेः सम्भवितम् ।
बिसमन्तर्जल इव बिसवर्त्मति तन्मतम् ॥२८॥
जो वर्त्म सूजा हुआ एवं सूक्ष्म छिद्रोंवाले बहुत से छेदों से चारों ओर से भरा होता है, जैसा कि विष के अन्दर जल भरा रहता है, ऐसा पलक विषवर्त्म कहता है ।
वि० मन्तव्य—विष-तन्मतम् के स्थान में—विषवत्यन्त-रुदकं बिसवत् बिसवर्त्म तत् । पाठ हो तो अच्छा हो और भाव प्रकाश में यही पाठ है । सम्भव है भावमिश्र के पास जो सुश्रुत की प्रति रही होगी उसमें पाठ यही हो ॥२८॥
दोषाः पद्ममाजयगतास्तीक्ष्णाप्राणि खराणि च । निर्वर्तयन्ति पद्ममाणि तैर्बुधं चास्ति दूयते ॥२९॥ उद्बुधतैरुद्बुधैः शान्तिः पद्मभिश्चोपजायते । वातातपानलक्षेष्ठी पद्मकोपः स उच्यते ॥३०॥
पद्माशय ( बालों की जड़ ) में पहुँचे दोष पलकों के बालों को भीतर की ओर उगा देते हैं, आगे से तीक्ष्ण और कर्कश होते हैं, इनकी रगड़ पड़ने पर आँख दुखने लगती हैं। बार-बार बालों को उखाड़ने से रोगी को शान्ति मिलती है। रोगी वायु, धूप, अग्नि से द्रोष करता है, इस रोग को पद्मकोप कहते हैं।
वि० मन्तव्य—नेत्र मण्डलों की गणना करते समय एक पद्ममण्डल भी गिना है, देखिये उ० अ० १ का श्लो० १५। यह पद्मकोप उसी मण्डल का रोग है। इसमें पद्म नामक बाल भीतर की ओर उग जाता है, अथवा उगजाते हैं, निमेषोन्मेष होते समय ये बाल नेत्र बुद्धुद पर लगते हैं—रगड़ खाते हैं, फलतः नेत्र में कष्ट होता है, बुद्धुद लाल हो जाता है, अशु बहते हैं, रोगी दुःखी रहता है, इसको डल्लनाचार्य के समय में और पञ्जाब में आज भी “पड़िबाल” या परबाल कहते हैं। जब इनको मोचना ( मुखुण्डी ) द्वारा उखाड़ दिया जाता है, तब १-२-३ दिन के लिये शान्ति मिलती है, परन्तु यह पुनः उग आता है, और फिर वही कष्ट होने लगता है। भावमिश्रने अपने भाव प्रकाश में किसी ग्रन्थ का पाठ उद्बुध किया है जो अधिक स्पष्ट एवं सुभग है यथा—
यत् पद्मदेहली मुक्त्वा वर्त्मनोऽन्तः प्रजायते ।
घर्षत् पद्म असिते श्वेते पद्मकोपः स उच्यते ॥३०॥
इसके अतिरिक्त आपने पद्मशात नामक रोग का भी उल्लेख किया है, यथा—
वर्त्मपद्माशय गतं पित्तं लोमानि शातयेत् ।
कण्डूं बाहं च कुरुते पद्मशातं तम् आदिशेत् ॥३०॥
ने० रो० ॥ पद्मशात नामक रोग वह है जिसमें नेत्र लोम उखड़ जाते हैं और वह स्थान लाल लाल दिखाई पड़ता है। नेत्र असुन्दर हो जाते हैं। पद्मकोप नामक रोग को याप्य माना है, देखिये अ० १ श्लो० ३६। परन्तु यह रोग उसी दशा में याप्य है, जब इसकी चिकित्सा बाल को मोचना से उखाड़ देना मात्र की जाती है, क्योंकि उस स्थान पर पुनः बाल उग आता है, परन्तु यदि अ० १६ के अनुसार छेदनकर्म, अग्निकर्म, क्षारकर्म अथवा प्रतिसारण कर्म किया जाता है, तब वह साध्य है, क्योंकि छेदनकर्म करने पर बाल उगने का स्थान ही नहीं रह जाता और अग्नि कर्म तथा क्षार कर्म करने पर बाल का रूप ही जल जाता है, और पश्चात् अथवा सुवरक