सुश्रुत संहिता
Sushruta Samhita
महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)
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सुश्रुतसंहिता
[ अ० ३ ]
विज्ञेयोत्सङ्गिनी नाम तद्रूपपिडकाचिता।
इनकी लक्षणों से कहते हैं—जो पिडका पलक के अन्दर मुख किये हुए, बाहर की ओर उभरी प्रतीत हो, पलक के नीचे उत्पन्न होती है। उसको उत्सङ्गिनी पिडका कहते हैं, यह इसी प्रकार की छोटी पिडकाओं से व्याप्त रहती है। अन्यत्र इस पिडका को सन्निपातजन्य कहा है यथा—
“वर्त्मात्संगेप्यधो जन्तोः सन्निपातात् प्रजायते।
अभ्यन्तरमुखी स्थूला बाह्यतश्चापि दृश्यते ॥
पिडका पिडकामिश्र चिताऽप्याभिः समन्ततः।
उत्संगपिडका नाम कठिना मन्दवेदना।
सा प्रभिन्ना खवेत् खावं कुम्कुटाण्डरसोपमम् ॥६॥
कुम्भीकबीजप्रतिमाः पिडका यास्तु वर्त्तमजाः ॥१०॥
आधमापयन्ति भिन्ना याः कुम्भीकपिडकास्तु ताः।
वर्त्तमं होनेवाली जो पिडका कुम्भी के बीज के समान होती है, फूटने के पीछे फिर फूल जाती है (भर जाती है), उसे कुम्भीक पिडका कहते हैं। (कुम्भीमकाकच्छदेशोद्भवदाडिमफलाकार फलात्ता—तद्वीजिन प्रतिमा यासां ताः) ॥
खाविण्यः कण्डुरा गुर्ज्यां रक्तसर्पपसन्निभाः।
पिडकाश्च रुजावत्यः पोथक्य इति संज्ञिताः ॥११॥
पोथकी पिडकायें—खाववाली, कण्डुयुक्त भारी, लाल रसों के आकार की, वेदना कारक होती हैं ॥११॥
पिडकाभिः सुसूक्ष्माभिर्धनाभिर्भिसंघृता।
पिडका या खरा स्थूला सा ज्ञेया वर्त्तमशर्करा ॥१२॥
वर्त्तमशर्करा—सूक्ष्म, घनी पिडकाओं से जो खर (कर्कश), एवं स्थूल पिडका घिरी रहती हैं। उसका नाम वर्त्तम शर्करा है ॥१२॥
एवोरुबीजप्रतिमाः पिडका मन्दवेदनाः।
सूक्ष्माः खराश्च वर्त्तमस्यास्तदग्रीववर्त्तमं कीत्यते ॥१३॥
अशोर्वर्त्तम—खीरे या ककड़ी के बीज के आकार की मन्दवेदनावाली, सूक्ष्म एवं खर, पिडका वर्त्तम में स्थित रहती है, उसे अशोर्वर्त्तम कहते हैं ॥१३॥
दीर्घोऽङ्कुरः खरः स्तब्धो दारुणो वर्त्तमसंभवः।
व्याधिरेष समाख्यातः शुष्काशं इति संज्ञितः ॥१४॥
शुष्काश—लम्बे अंकुर के समान, खर, कठिन, अतिकष्ट-दायक, पलक में उत्पन्न यह रोग शुष्काश नाम से कहा जाता है।
वि० मन्तव्य—अशोर्वर्त्तम तथा शुष्काश नामक रोग नेत्रार्श ही हैं अर्थात् ये दोनों नेत्र के “अर्श” हैं दे० नि० अ० सू० १७। नेत्र में रक्तार्श भी होता है देखिये इसी अध्याय का श्लोक १६ ॥१४॥
दाहतोदवती ताभ्रा पिडका वर्त्तमसंभवा।
मुद्री मन्दरुजा सूक्ष्मा ज्ञेया साऽञ्जननामिका ॥१५॥
दाह, तोद (जुमने की वेदना) युक्त, ताम्रवर्ण, कोमल, मन्दवेदनावाली, सूक्ष्म पिडका जो पलकों में होती है, उसे अंजननामिका (अञ्जनहारी) कहते हैं (जहाँ पर अञ्जन लगाया जाता है, वहाँ पर होनेवाली पिडका, इसके होने पर अञ्जन नहीं लगा सकते) ॥१५॥
वर्त्तमोपचीयते यस्य पिडकाभिः समन्ततः।
सवर्णाभिः समाभिश्च विद्याद्वहलवर्त्तमं तत् ॥१६॥
जिसका वर्त्तम, समान वर्ण की आकार में समान पिडकाओं से सम्पूर्णरूप में भर जाता है, उसको वहलवर्त्तम कहते हैं ॥१६॥
कण्डुमताऽल्पतोदेन वर्त्तमशोफेन यो नरः।
न समं छादयेदक्षि भवेद्रुन्धः स वर्त्तमनः ॥१७॥
कण्डुयुक्त, थोड़ीवेदनावाले, पलक की सूजन के कारण जो मनुष्य आँख को सम्पूर्ण रूप से बन्द नहीं कर सकता, उसे वर्त्तमबन्ध कहते हैं ॥१७॥
मुद्वल्पवेदनं ताभ्रं यद्रुत्तमं समभेव च।
अकस्माच्च भवेद्रुक्तं किल्वद्यवर्त्तमं तदादिशेत् ॥१८॥
कोमल, थोड़ी वेदना युक्त, ताम्रवर्ण, समान वर्त्तम अकारण ही सहसा लाल हो जाता है, उसे किल्वद्यवर्त्तम कहते हैं। (इसका रंग दुपहरिया फूल के समान होता है) ॥१८॥
किल्वद्यं पुनः पित्तयुक्तं विदुहेच्छोणिनं यदा।
तदा किल्वद्यवमापन्नमुच्यते वर्त्तमकर्दमः ॥१९॥
किल्वद्यरोग का आरम्भक कफ पित्त से मिले रक्त को जब विदग्ध कर देता है, तब उसमें किल्वद्यता उत्पन्न हो जाने पर इसे (किल्वद्यवर्त्तम को) वर्त्तमकर्दम कहते हैं ॥१९॥
यद्रुत्तमं बाह्यतोऽन्तरश्च श्यावं शूनं सवेदनम्।
दाहकण्डुपरिकलेदि श्याववर्त्तमंति तन्मतम् ॥२०॥
जो वर्त्तम बाहर और अन्दर से काला, सूजा, वेदना युक्त, दाहकण्डु, क्लेदवाला होता है, उसको श्याववर्त्तम कहते हैं ॥
अरुजं बाह्यतः शूनमन्तः किल्वद्यं क्षवत्यपि।
कण्डुनिस्तोदभूमिष्टं किल्वन्नवर्त्तमं तदुच्यते ॥२१॥
जो वर्त्तम वेदना रहित, बाहर से सूजा, अन्दर से किल्व (गला), जिसमें खाव होता है, कण्डु और जुमने की दर्द अधिक रहती है, उसे किल्वन्नवर्त्तम कहते हैं ॥२१॥
यस्य धौतानि धौतानि संबन्धयन्ते पुनः पुनः।
वर्त्तमान्यपरिपक्वानि विद्यादकिल्वन्नवर्त्तमं तत् ॥२२॥
जिस रोगी के पलक घोने पर भी बार-बार चिपक जाते हैं, जिनमें पाक नहीं होता, उनको अकिल्वन्नवर्त्तम कहते हैं। (इसी को दूसरे पित्तल रोग कहते हैं।) वाग्भट ने कुक्कुणक आदि अद्वाह रोगों को पित्तल कहा है।
वि० मन्तव्य—भले ही इसमें किसी प्रकार का क्लेद नहीं होता और चिपकानेवाले पदार्थ को बार-बार