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भारतकोश
सुश्रुत संहिता

सुश्रुत संहिता

Sushruta Samhita

महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished872 पृष्ठ

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पृष्ठ 659

अ० २ ]

उत्तरतन्त्रम्

६०३

गत्वा सन्धीनश्रुमार्गण दोषाः

कुर्तुः स्नावान् रुग्निहोनिान् कनीनात् ।

ताव वै स्नावान् नेत्रनाडीमथैके

तस्या लिङ्गं कीर्तिष्यिष्ये चतुर्धा ॥५॥

पाकः सन्धौ संस्त्रवेद्यश्च पूर्य

पूयास्त्रावो नैकरूपः प्रदिष्टः ।

श्वेतं सान्द्रं पिच्छिलं संस्त्रवेद्यः

इक्षेष्मास्त्रावो नीरुजः स प्रदिष्टः ॥६॥

रक्तास्त्रावः शोणितोत्थः सरक्त-

मुष्णं नार्यं संस्त्रवेद्यातिसान्द्रम् ।

पीताभासं नीलमुष्णं जलाम्

पित्तास्त्रावः संस्त्रवेत् सन्धिभभ्यात् ॥७॥

वातादि दोष अश्रु मार्ग से सन्धियों में पहुँचकर, वेदना रहित स्त्रावों को कनीनिका प्रदेश से (नाक के पार्श्व से) करते हैं। इन्हीं स्त्रावों कोई को नेत्र नाड़ी कहते हैं, इनके चार प्रकार लक्षण कहेंगे। सन्धि में पाक होने पर जिससे पूर्य बहे, उसे पूर्यस्त्राव कहते हैं, वह एक तरह का नहीं होता। जो स्त्राव श्वेत, सान्द्र (घट्ट), पिच्छिल, और वेदना रहित होता है, उसे इक्षेष्मास्त्राव कहते हैं। रक्तजन्य रक्त का स्त्राव, रक्त-मिश्रित, उष्ण, बड़ी मात्रा में, पतला बहता है। पित्तास्त्राव-पीली झाँई का, नीला, उष्ण जल के समान स्त्राव कनीनिका सन्धि मध्य से होता है।

वि० मन्तव्य—चारों प्रकार के स्त्राव कनीनिका नामक सन्धि में से बहते हैं। इनको पक्षाव में डलका और अन्यत्र पानी जाना या बहना कहते हैं। इस रोग में सर्वदा स्त्राव होता रहता है जल जैसा। इस विषय में विदेह का वचन अधिक स्पष्ट है—यथा—

अश्रुस्त्रावः सिरा गत्वा नेत्रसन्धिषु तिष्ठति ।

ततः कनीनकं गत्वा चाश्रुकृत्वा कनीनके ।

ततः स्वति अथ आस्त्रावं यथा दोषं अवेदनम् ।

इसमें किसी प्रकार की वेदना नहीं होती, स्त्राव पानी का या बहता है उसमें श्वेतता, रक्तता तथा पीतता अत्यन्त सूक्ष्म रहती हैं। इससे आगे चलकर दृष्टि घट जाती है और नेत्र उदुद छोटा हो जाता है ॥५०॥

ताम्ना तन्वी दाहशूलोपपन्ना

रक्ताब्जोया पर्षणी वृत्तसोफा ।

जाता सन्धौ कृष्णशुक्लडलजीत्या-

त्तस्मिन्नेव स्थापिता पूर्वलिङ्गैः ॥८॥

पर्षणी—ताम्रवर्ण की, पतली, दाह-शूल से युक्त, गोल, सज्जनयुक्त-रक्त के कारण होती है। अब्ज—कृष्ण और शुक्ल की सन्धि में पर्षणी के समान लक्षणावाली है। (पर्षणी-पतली और अब्जो स्थूल होती है। तथा दोनों में स्थान भेद नहीं है) ॥

कृमिग्रन्थिवर्त्तनः पद्ममण्डल

कण्डुं कुर्तुः क्रमयः सन्धिजाताः ।

नानारूपा वर्त्तमशुक्लस्य सन्धौ

चरन्तोऽन्तर्नयनं दूषयन्ति ॥९॥

सन्धि में उत्पन्न कृमि, कृमिग्रन्थि रोग करते हैं, जिससे पलकों में और बालों में खाज होती है। ये कृमि नाना प्रकार के आकार के, वर्त्तम और शुक्ल की सन्धि में घूमते हुए आँख को दूषित करते हैं ॥९॥

इति शुश्रुतसंहितायामुत्तरतन्त्रे सन्धिगतरोगविज्ञानीयो

नाम द्वितीयोऽध्यायः ॥१॥

वृत्तयोगोऽध्यायः

अथातो वर्त्तमगतरोगविज्ञानीयमध्यायं व्याख्यास्यामः ॥१॥ यथोवाच भगवान् धन्वन्तरिः ॥२॥

इसके आगे वर्त्तमगतरोगविज्ञानीय अध्याय का व्याख्यान करेंगे—जैसा भगवान् धन्वन्तरि ने कहा था।

वि० मन्तव्य—इस अध्याय में पद्ममण्डल एवं वर्त्तम-मण्डल के रोगों का वर्णन किया गया है ॥१०॥

पुथरदोषाः समस्ता वा यदा वर्त्तमव्यापश्रयाः ।

सिरा व्याप्यावतिष्ठन्ते वर्त्तमैवधिकमूर्च्छिताः ॥१३॥

विवर्ध्य मांसं रक्तं च तदा वर्त्तमव्यापश्रयान् ।

विकाराञ्जनयन्त्याशु नामतस्तात्रिबोधत ॥१४॥

जब पुथक पुथक वातादि दोष या समस्त रूप में दोष अतिशय प्रकृति होकर वर्त्तम के मध्य में आश्रित सिराओं में फैलकर वर्त्तम में स्थित होते हैं, तब मांस और रक्त को बढ़ाकर वर्त्तम में आश्रित रोगों को शीघ्र उत्पन्न करते हैं, इनको नामों से सुनो ॥१३,४॥

उत्सङ्गिन्यथ कुम्भीका पोथकयो वर्त्तमशर्करा ।

तथाऽशौर्त्तमं शुष्काशस्तथैवाञ्जननामिका ॥१५॥

बहुलं वर्त्तमं यच्छापि व्याधिर्वर्त्तमैवबन्धकः ।

किल्लघुकदमवर्त्तमैव्यो इयावर्त्तमं तथैव च ॥१६॥

प्रकृतिमपपरिहितं वर्त्तमं वातहतं तु यत् ।

अवुदं निमिषश्चापि शोणिताशरुचं यत् स्मृतम् ॥१७॥

लग्नो विसनामा च पद्मकोपस्तथैव च ।

एकविंशतिरित्येते विकारा वर्त्तमसंश्रयाः ॥१८॥

उत्संगिनी, कुम्भीका, पोथकी, वर्त्तमशर्करा, अशौर्त्तमं, शुष्कार्श, अंजननामिका, बहुलवर्त्तमं, वर्त्तमबन्धक, किल्लघुवर्त्तमं, श्यामवर्त्तमं, प्रकिल्लघुवर्त्तमं, अपरिक्लिष्टवर्त्तमं, वातहतवर्त्तमं, अवुद, निमेष, शोणितार्श, लग्न, विसवर्त्तमं, पद्मकोप, ये इनकोस रोग वर्त्तम में आश्रित हैं, इनको नाम से कह दिया है ॥१५-१८॥

नामभित्ते समुद्विष्टा लक्षणैस्तान् प्रचक्ष्यहे ।

अभ्यन्तरमुखी बाह्योत्संगेऽधो वर्त्तमनश्च या ॥१९॥