सुश्रुत संहिता
Sushruta Samhita
महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)
पृष्ठ 678, कुल 872 में से
संदर्भ में पढ़ें६२२
मुश्रुतसंहिता
[ अ० १२ ]
सगोफश्चाप्यशोफश्च द्वौ पाकौ यौ प्रकीर्तितौ । स्नेहस्वेदोपपद्यस्य तत्र विदुध्वा सिरां भिषक् ॥३॥ सेकाश्च्योतननस्यानि पुटपाकांश्च कारयेत् । -सशोफपाक और अशोफपाक ये जो दो रोग कहे हैं, उसमें बैध रोगी को स्नेहन, स्वेदन देकर सिरा को बेधन करे । फिर सेक, आश्च्योतन, नस्य, पुटपाक बरते ॥३॥ सर्वतश्चापि शुद्धस्य कर्तव्यमिदमज्जनम् ॥३॥ ताम्रपात्रस्थितं मासं सर्पिः सैन्यवसंयुतम् । मैरैयं वाडपि दधेयं दध्युत्तरकमेव वा ॥४०॥ घृतं कांस्यमलोपेतं स्तन्यं वाडपि ससैन्यवम् । मधुकसारं मधुना तुल्यांश्च नैरिक्केण वा ॥४१॥ सर्पिः सैन्यवताम्राणि योषितस्तन्ययुतानि वा । अन्तःपरिमाजनं और बहिःपरिमाजनं विधि से सम्पूर्ण रूप में शुद्ध हुए व्यक्ति में निम्न अज्जन करना चाहिये । अज्जन- ताम्रपात्र में सैन्यव मिश्रित घृत एक मास तक रखे, अथवा मैरैय (सुरा और आसव दोनों एक साथ सन्धान करके बनाया), दही, या दही की मलाई इनको ताम्रपात्र में रखे । कांसी की मैल को घी में मिलाकर अथवा सैन्यव को धावन में, किलाकर इनसे अज्जन करे । मधुए का सार और गेरु समान भाग लेकर मधु के साथ, घी, सैन्यव, ताम्रभस्म इनको धावन के साथ मिलाकर अज्जन करे ॥३६-४१॥ दाडिमारैवताश्मन्तकोलाभ्लैश्च ससैन्यवाम् । रसक्रियां वा वितरेत्सम्यक्पाकजिघांसया ॥४२॥ अनार, अमलतास, अश्मन्तक, बेर, कांजी और थोड़ा सा सैन्यव, इनसे रसक्रिया बनाये । पाक को नष्ट करने की इच्छा से (सशोफपाक, अशोफपाक के लिये) इस रसक्रिया का अंजन करे ॥४२॥ मासं सैन्यवसंयुक्तं स्थितं सर्पिषि नागरम् । आश्च्योतनाज्जनं योज्यमबलाक्षीरसंयुतम् ॥४३॥ सैन्यव, सौंठ को एक मास तक घी में रखकर, धावन में मिलाकर आश्च्योतन और अंजन करना चाहिये ॥४३॥ जात्याः पुष्पं सैन्यवं शृङ्गवैरं कृष्णाबीजं कीदशत्रोत्रं सारम् । एतत् पिट्ठं तैत्रपाकेऽज्जन्तार्थं क्षौद्रोपेतं निर्विशङ्कं प्रयोज्यम् ॥४४॥ चमेली के फूल, सैन्यव, सौंठ, पिपल्ली, विडंग इनको पीसकर मधु मिलाकर तैत्रपाक में अंजन के लिये बिना भय के साथ बरते ॥४४॥ पूयालसे शोणितमोक्षणं च । हिंतं तथैवाप्युपनाहन्तं च । कृत्स्नो विधिर्वक्षेणपाकघातौ यथाविधानं भिषजा प्रयोज्यः ॥४५॥
पूयालस में—रक्तमोक्षण और उपनाह उत्तम है । नेत्रपाक को नष्ट करनेवाली सम्पूर्ण विधि (अन्तःशुद्धिकर, वहिः- शुद्धिकर), विधान के अनुसार वैध को बरतनी चाहिये ॥४५॥ कासीससिन्धुप्रभवार्द्रकैस्तु हिंतं भवेद्ज्जनमेव चात्र । क्षौद्रान्वितैरैशिरथोपयुज्य्या- दन्यत् ताम्रायसचूर्णयुक्तैः ॥४६॥ कासीस, सैन्यव, सौंठ, अथवा ताम्रचूर्ण, लोहभस्म, मधु इनका अंजन पूयालस में करे ॥४६॥ स्नेहादिभिः सम्यगपास्य दोषा- स्तृप्तिं विधायाथ यथास्वमेव । प्रकिलन्तवर्तमनुपक्रमेत सेकाज्जनाश्च्योतननस्यधूमैः ॥४७॥ प्रकिलन्तवर्तम—स्नेह, शिरामेध, विरेचन, शिरोविरेचन, आस्थापन द्वारा दोषों को दूर करके, दोषों के अनुसार तपण करके, सेक, आश्च्योतन, नस्य, धूम, अंजन इनसे चिकित्सा करे ॥४७॥ मुस्ताहरिद्रामधुजप्रियङ्गु- सिद्धार्थोद्गोत्रोत्पलसारिवाभिः । वृष्णामिराश्च्योतनमेव कार्य- मत्राज्जनं चाज्जनमाश्विकं स्यात् ॥४८॥ अथवा मुस्ता, हल्दी, मुलैहठी, प्रियंगु, सरसों, लोष, कमल, सारिवा इनको कूटकर वर्षा जल में अथवा शुद्ध जल में भिगोकर रख देवे । इस जल से किलन्तवर्तम में आश्च्योतन करे । अंजन (क्षोतजन), मधु से अंजन करे ॥४८॥ पत्रं फलं चामलकस्य पक्त्वा क्रियां विदध्यादथवाऽज्जन्तार्थं । वंशस्य मूलेन रसक्रियां वा वर्तीकृतां ताम्रकपालपक्वां ॥४९॥ रसक्रियां वा त्रिफलाविपक्वां पलाशुपुष्पैः खरमञ्जरैर्वा । अथवा आवले के पत्ते और फल को कबाय कल्पना से पकाकर इससे ताम्रपात्र या कटोरा में रसक्रिया बनाये । इस रसक्रिया को और सुखाकर वर्त्ति बना ले । इसी प्रकार बांस के मूल से, त्रिफला को पकाकर ढाक के फूलों से या चिरचिते के बाल से रसक्रिया बनाकर वर्त्ति बनाये ॥४९॥ पिष्ठां वृंजलयाः पयसा मलं वा कांस्यस्य दग्ध्वा सह तान्तवेन ॥५०॥ प्रत्यज्जनं तन्मरिचैरुपेतं चूणन ताम्रस्य सहोपयोज्यम् । कांसी के मल को कपास के वस्त्र के साथ जलाकर, श्वेत- मरिच, तामरज मिलाकर इसको बकरी के दूध में पीसकर प्रत्यजन करे ॥५०॥