सुश्रुत संहिता
Sushruta Samhita
महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)
पृष्ठ 677, कुल 872 में से
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उत्तरतन्त्रम्
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द्वारविमो विहितो योगावज्ञनेऽर्जुननाशनौ । सैन्यवक्षोद्भक्तकाः सखौर्द्वं वा रसाञ्जनम् ॥२३॥ कासीसं मधुना वाऽपि योज्यमत्राञ्जने सदा ।
‘अर्जुन’ की शान्ति के लिये पिताभिष्यन्द की चिकित्सा करनी चाहिये। ईश्वर, मधु, शर्करा, धावन, दारुहल्दी, मुलेहटी, सैन्य, इनसे परिषेक, या अंजन करे। अम्ल (बिजौर का रस, मधु मिलाकर) या कांजी से आश्च्योतन करे। शर्करा मुलेहटी, श्योनाक, मस्तु, मधु, कांजी, सैन्यव, बिजौरा, बेर की खटाई, अनारदाना (खड़े अनार का रस), इनसे अलग अलग या दो दो अथवा तीन तीन को मिलाकर युक्ति से आश्च्योतन करे। दो योग—(१) स्फटिक, मूंगा, शंख, मुलेहटी, मधु, (२) शंख, मधु, शर्करा, समुद्रफेन, इनका अंजन में समयोग करने से अर्जुन नष्ट होता है। (१) सैन्यव, मधु, कतक (निर्मली फल); (२) रसौत और मधु, (३) कासीस और मधु, इनको सदा अंजन में बरतना चाहिये ॥१६-२३॥
लोहचूर्णानि सर्वाणि धातवो लवणानि च ॥२४॥ रत्नानि दन्ताः शृङ्गानि गणश्याम्यवसादनः । कुक्कुटाण्डकपालानि लघुनं कटुकत्रयम् ॥२५॥ करञ्जबीजमेला च लेख्याञ्जनमिदं स्मृतम् । पुटपाकाबसानेन रक्तविस्त्रावणद्विना ॥२६॥ संपादितस्य विधिना कृत्स्नेन स्यन्दधातिना । सब लोह धातु (सुवर्ण, रांगा, सीसा, ताम्र, चांदी, कृष्ण-लोह) धातु (मैनसिल, गेरु आदि), लवण (सैन्यव आदि पांचों), रत्न (बेईयू, मुक्ता, प्रवाल, शंख) दांत (गाय, घोड़ा आदि के), सींग (गाय, आदि के अवसादन गण (मिश्रकौक कासीस आदि), मुर्ग के अण्डे के छिलके, लहसुन, त्रिकटु करंजबीज, इलायची, यह लेख्य (लेखन करने योग्य) अंजन हैं। यह अंजन रक्त विस्त्रावण से आरम्भ करके, पुटपाक की समाप्ति तक अभिष्यन्दनाशक सम्पूर्णविधि पूरी करके तब बरतना चाहिये।
वक्तव्य—विधि “ततः प्रदेहाच् परिषेचनानि नस्थानि धूमाश्व यथास्वमेव। आश्च्योतनाभ्यंजनतर्पणानि तथैव कार्याः पुटपाकयोगाः” ॥२४-२६॥
अनेनापहरेच्छुकमव्रणं कुशलो भिषक् ॥२७॥ कुशल वैद्य इस लेख्य अंजन से अम्ल शुक्र को नष्ट करे ॥२७॥
उत्तानमवगाढं वा कर्कशं वाऽपि सव्रणम् । शिरीषबीजमरिचपिप्पलीसैन्यवैरपि ॥२८॥ शुक्रस्य घर्षणं कार्यमथवा सैन्यवेन तु । कुर्यात्ताम्ररजःशङ्खशिलामरिचसैन्यवैः ॥२९॥
अन्याद्बहुगुणिनैरेभिरञ्जनं शुक्रनाशनम् । कुर्यादञ्जनयोगो वा सम्यक् श्लोकाधिकविमो ॥३०॥ शङ्खकोलास्थितकटद्राक्षामधुकमाश्विकैः । क्षौद्रदन्ताण्वंमलसिरीषकुसुमैरपि ॥३१॥ क्षाराञ्जनं वा वितरेद्वलासमथितापहम् । सुदृगात् वा निस्तुषान् भृष्टान् शङ्खक्षौद्रसितायुतान् । मधुकसारं मधुना योजयेच्छ्वाञ्जने सहाः । विभीतकास्थिमज्जा वा सखौद्भः शुक्रनाशनः ॥३२॥ शङ्खशुक्तिमधुद्राक्षामधुकं कतकानि च । द्विस्वग्गते समूले वा वातघ्नं तर्पणं हितम् ॥३३॥ वंशजारुषकरी तालं नारिकेल् च दाहयेत् । विस्त्राण्य क्षारवच्छूर्णं भावयेत्करभास्थिजम् ॥३४॥ बहुशोऽञ्जनमेतस्याल्लुकवैवर्ण्यनाशनम् ।
सव्रण शुक्र उत्तान हो (एकपटल में), या गम्भीर (दो पटल में हो), या शर्करा हो, उसमें शिरीषबीज, मरिच, पिप्पली, सैन्यव इनसे अथवा अकेले सैन्यव से इसको रगड़ना चाहिये। ताम्रभस्म, शंख, मैनसिल, मरिच और सैन्यव इनको सैन्यव की ओर से क्रमशः दुगुना करते हुए ले। इनका अंजन शुक्रनाशक है (सैन्यव १ भाग, मरिच दो भाग, मैनसिल ४ भाग, शंख ८ भाग, ताम्रभस्म १६ भाग)। आवे श्लोक में कहे जाने वाले इन दो योगों को मली प्रकार बरते, दो योग—(१) शंखभस्म, बेर की गुठली, निर्मलीफल, द्राक्षा, मुलेहटी, मधु, (२) मधु, गाय का दांत, समुद्रफेन, शिरीष का फूल इनको बरते। बलास ग्रथित में कहा क्षारांजन इनमें बरते। उपरहित मूंग को भाङ्ग में भूनकर, इसमें शंख, मधु, सित्त, महुए का सार और मधु इनसे सदा अंजन करे। बहेड़े की गुठली की मज्जा-मधु के साथ शुक्रनाशक है। शंख, सीप, मधु, द्राक्षा, मुलेहटी, निर्मली इनसे तर्पण करना जो दो पहल में पहुँचे, वेदनायुक्त सव्रण में उत्तम है। बांस के अंकुर, भिलावां, ताड़, नारियल इनको तिल नाठ के साथ जलाये। इस भस्म को पानी में घोलकर बहुत बार नितार ले (अथवा करभास्थि के बराबर भस्म को लेकर आठ गुने पानी में घोलकर स्वाध करे, चौथाई रहने पर छान ले)। इस क्षारोदक से हाथी की अस्थि (हाथी के छोटे बच्चे की अस्थि) को सात बार भावित करे। इस अस्थि का अंजन शुक्र की विवर्णता को नष्ट करता है। (इल्हण ने मधुकसार मधुना-इसको पुष्प योग माना है) ॥
अजकां पार्श्वतो विदूष्या सूच्या विस्त्राण्य चोदकम् ॥३६॥ व्रणं गोमांसचूर्णन पूरयेत् सर्पिषा सह । बहुशोऽवल्लेखापि वर्त्तस्योगगतं यदि ॥३७॥ अजका में सूई से पार्श्व में वेधन करके पानी को निकाल दे और व्रण में गाय के मांस को घी में मिलाकर भर देवे। यदि अजका पलक के पास अन्दर की हो तो, इसमें बहुत बार अवलेखन करे ॥३६,३७॥