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भारतकोश
सुश्रुत संहिता

सुश्रुत संहिता

Sushruta Samhita

महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished872 पृष्ठ

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सुश्रुतसंहिता

[ अ० ११ ]

हैं। दस वर्ष से अधिक पुराने घी को प्रपुराणघृत, और एक सौ वर्ष पुराने घृत को कुमसर्पि तथा इससे अधिक साल के पुराने घृत को महाघृत कहते हैं ॥४॥

विरिक्तानां प्रकाशं च अिरास्थेषां विओधयेत् । वेरेचनिकसिद्धेन क्षितायुक्तेन सर्पिषा ॥५॥

मज्जा वा तद्विमिश्रण मेदसा तच्छूतेन वा । )

विरेचन हो जाने पर इनके शिरों का यथेच्छ शोधन करे । इसके लिये शिरोविरेचन द्रव्यों से सिद्ध घृत में शर्करा मिलाकर शोधन करे । (तैल-अचलुष्य है, उसे न बरते, कोई त्रिबुत्तादि द्रव्य से सिद्ध घृत लेते हैं) । अथवा घृतमिश्रित मज्जा से या विरेचन द्रव्यों से सिद्ध मेद से शोधन करे ॥५॥

ततः प्रदेहाः परिषेचनानि नस्यानि धूम्राश्च यथास्वमेव ।

आश्च्योतनाभ्यञ्जनतर्पणानि स्निग्धश्चाश्च कार्याः पुटपाकयोगाः ॥६॥

इसके आगे प्रदेह, परिषेचन, नस्य, धूमयोग, इनको दोषों के अनुसार बरते । आश्च्योतन, अस्मंग, अञ्जन, तर्पण, स्निग्ध पुटपाक योग बरते । (अञ्जन-प्रसादन अञ्जन बरते) ॥६॥

नीलोत्पलोशीरकटुकद्वेरी कालीययष्टोमधुमुस्तरोघ्नैः ।

सपद्मकैर्घौतघृतप्रदिग्धै- रङ्गोः प्रलेपं परितः प्रकुर्यात् ॥७॥

नीलोफर, खस, दारुहल्दी, कालीयक काष्ठ, मुलेहटी, मुस्ता, लोष, पत्राख इनको शतघौतघृत में मिलाकर आँखों के चारों ओर प्रलेप करे ॥७॥

रुजायां चाप्यतिशुश्रं स्वेदाश्च सुद्वो हिताः । अङ्गोः समन्ततः कार्यं पातनं च जलौकसाम ॥८॥ घृतस्य महती मात्रा पीता चार्तिं नियच्छति । पित्ताभिष्यन्दशमनो विधिश्चाप्युपपादितः ॥९॥

अतिशय (असह्य) पीड़ा होने पर—आँखों के चारों ओर कोमल स्वेदन करे और जौक लगाये । घी की बहुत बड़ी मात्रा (उत्तमा मात्रा—जो कि रात दिन में जीर्ण हो) पीने से दर्द शान्त हो जाता है । पित्ताभिष्यन्द की चिकित्सा भी बरतने पर वेदना कम कर देती है ॥८,९॥

कशेरुमधुकाभ्यां वा चूर्णमम्बरसंवृतम् । न्यस्तमस्त्वान्तरिक्षासु हितमार्च्योतनं भवेत् ॥१०॥

कशेरु और मुलेहटी के चूर्ण को कपड़े में पोटली बाँधकर वर्षाजल में भिगो-भिगोकर आँखों पर आश्च्योतन करना उत्तम है ॥१०॥

पाटल्यजुनश्रीपर्णीधातकीधात्रिबिल्वतः । पुष्पाण्यथ बृहत्योश्च विम्बोलेटाश्च तुल्यशः ॥११॥

समज्जिघ्राणि मधुना पिष्टानीजुरसेन वा ।

रक्ताभिष्यन्दशान्त्यर्थमेतद्भञ्जनमिष्यते ॥१२॥

पाटली (पाङ्गल), अजुन, गाम्भारी, धातकी, आँवला, बिल्व, कटेरी, बड़ी कटेरी के फूल, विम्बोलेट (मिल्होट लोह), मंजीठ—इनको समान भाग लेकर मधु या ईल के रस से पीसकर रक्ताभिष्यन्द की शान्ति के लिये इनसे अञ्जन करे । विरेचनादि से शुद्ध शरीर में—शेष दोष शान्ति के लिये अञ्जन है ॥११,१२॥

चन्दनं कुसुदं पत्रं शिलाजतु सकुङ्कुमम् । अयस्ताश्ररजस्तुत्थं निम्बनिर्वासमञ्जनम् ॥१३॥ त्रयुक्तास्थमलं चापि पिष्टा पुष्परसेन तु । विपुला याः कृता वस्तयः पूजिताश्चाञ्जने सदा ॥१४॥ चन्दन, कमल, तेजपात, शिलाजतु, केसर, लोहमस, ताम्रभस्म, तुल्य, नीम का गौद, रसौत, राँगे का मैल (जस्ता सम्भवतः जो कि आँख में डालते हैं), काँची का मैल, इनको मधु से घिसकर, जो विपुल वर्त्तियाँ बनाई जायें, वे—मन्य आदि चारों रोगों में अञ्जन के लिये उत्तम हैं ।

वक्तव्य—हरेणुमात्रा वर्त्तिः स्यात् लेखनस्य प्रमाणतः । प्रसादनस्य चाध्यां द्दिगुणा रोपणस्य तु ॥१३,१४॥ स्यादञ्जनं घृतं क्षौद्रं सिरोत्पातस्य भेषजम् । तद्वत्सैन्धवकासीसं स्तन्यघृष्टं च पूजितम् ॥१५॥ मधुना शङ्खनैपालोत्थदाण्यैः ससैन्धवाः । रसः शिरीषपुष्पाच्च सुरामरिचमाक्षिकैः ॥१६॥

युक्तं तु मधुना वाऽपि गैरिकं हितमञ्जने । अञ्जन (क्षोतजन), घी, मधु, (२) सैन्धव, कासीस, इनको धावन (खी के दूध में) घिसकर सिरोत्पात में अञ्जन करे । (३) शंख, मेनसिल, तुल्य, दारुहल्दी इनको मधु से घिसकर अञ्जन करे । (४) शिरीष के फूलों का रस, सुग, मरिच, मधु, (५) गेरु को मधु के साथ मिलाकर अञ्जन करना सिरोत्पात में उत्तम है ॥१५,१६॥

सिराहर्षञ्जनं कुर्यात् फाणितं मधुसंयुतम् ॥१७॥ मधुना तार्दयजं वाऽपि कासीसं वा ससैन्धवम् । वैत्राम्लस्तन्यसंयुक्तं फाणितं च ससैन्धवम् ॥१८॥ सिराहर्ष में चार अञ्जन—(१) फाणित (राब) को मधु में मिलाकर, (२) रसौत को मधु के साथ, (३) कासीस, सैन्धव मधु, (४) अम्लवेतस, धावन, राब, सैन्धव इनको मिलाकर अञ्जन करे । (वैत्राम्ल से दूसरे वैत्र करीर और अम्लवेतस दो वस्तुएँ लेते हैं ॥१७,१८॥

पैतं विधिमशेषेण कुर्यादजुनशान्तये । इजुक्षौद्रसितास्तन्यदार्वांमधुकसैन्धवैः ॥१९॥ सेकाञ्जनं चात्र हितमम्लैराश्च्योतनं तथा । सितामधुककटवङ्गमस्तुक्षौद्राम्लसैन्धवैः ॥२०॥ बीजपूरककोलाम्लदाडिमाम्लैश्च युक्तितः । एकशो वा द्विशो वाऽपि योजितं वा त्रिभिर्भिः ॥२१॥ स्फटिकं विद्रुमं शङ्खो यष्टिकं मधु चैव हि । शङ्खक्षौद्रसितायुक्तः सामुद्रः फेन एव वा ॥२२॥