सुश्रुत संहिता
Sushruta Samhita
महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)
पृष्ठ 675, कुल 872 में से
संदर्भ में पढ़ेंॐ ११]
उत्तरतन्त्रम्
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तस्माद्वत्सैन्यवत्तुथरोचनं पक्वं विदध्यादथलोहनाड्याम् ।
एतद्बलासप्रथितेऽञ्जनं स्या-
देवोऽनुकल्पस्तु फणिञ्जकादौ ॥१२॥
बलासप्रथित रोग में—सिरावेषन, विरेचन, शिरोविरेचन से शुद्ध देहवाले रोगी में कुशल वैद्य इस खाराञ्जन को बरते । अञ्जन—पक्व जो को गाय के दूध में सात दिन या चौदह दिन भावित करके, इनको शर्कों के (बाल में लगे काँटे) साथ, मुलाकर इनको, तथा अर्जक, आस्कोता (सारिवा), कैथ, बिल्ब, निगुण्डी (सम्भाजु), चमेली के फूल इनके साथ जला ले । यह भस्म एक प्रस्थ, गरम पानी एक आदक में घोलकर बार-बार छाने । जब खारोदक तीक्ष्ण, पिच्छिल और लाल हो जाये तब इस राख को छोड़कर, इस खारोदक में सैन्यव, तुथ्य, रोचना (गोरोचना) का प्रत्येप (खारोदक का डूँढ वाँ भाग) मिलाकर पकाये । इसको लोहे के पात्र (नलिका) में रखकर बलास प्रथित रोग में अञ्जन करे । फणिञ्जक आदि के पुष्पों से भी इसी प्रकार अञ्जन बनाना चाहिये ॥१०-१२॥
महोषधं मागधिकां च मुस्तां
ससेन्ध्वं यन्मरिचं च शुक्लम् ।
तन्मातुलुङ्गस्वरसेनपिष्टं
नेत्राञ्जनं पिष्टकमाशु हन्यात् ॥१३॥
सोंठ, पिप्पली, मुस्ता, सैन्यव, श्वेतमरिच, इनको बिजौर के रस में पीसकर—आँखों में अञ्जन करने से पिष्टक रोग शीघ्र नष्ट होता है ॥१३॥
फले बृहत्या मगधोद्भवानां
निधाय कल्कं फलपाककाले ।
श्रोतोजयुक्तं च तदुद्भुतं स्या-
चद्रत्तु पिष्टे विधिरेष चापि ॥१४॥
बड़ी कटेरी के फल जब पकनेवाले हों, तब उन फलों में पिप्पली का कल्क, सौवीराञ्जन के साथ भर देवे । सात दिन के पीछे इसको बिजौर के रस में मिलाकर पिष्टक में अञ्जन करे ।
वार्ताकशिग्रविन्दसुरापटोल-
किराततिकामलकीफलेषु ।
यही विधि—वार्ताक (बड़ी कटेरी या बैगन), सुहांजना, इन्द्रायण, परवल, चिरायता और आँवले के फलों में भी करनी चाहिये ।
कासीससामुद्रसाञ्जनानि
जात्यास्तथा क्षा (को) रकमेव चापि ॥१५॥
प्रकिल्लवत्तमन्युपदिश्यते तु
योगाञ्जनं तन्मधुनाऽवघृष्टम् ।
योगाञ्जन—कासीस, समुद्रफेन, रसोत, चमेली की कलिका, इनको मधु में घिसकर प्रकिल्ल वत्तम में अञ्जन करे ।
(सामुद्र से समुद्र नमक भी कई लेते हैं, परन्तु सर्वलक्षणमचलु-ध्यम्, श्रुते सैन्यवात्—इस नियम से समुद्रफेन लिया है) ॥१५॥
नादेयमग्रयं मरिचं च शुक्लं
नेपालजातां च समग्रमाणा ॥१६॥
समातुलुङ्गद्रव एष योगः
कण्डुं निहन्त्यात् सकृदञ्जनेन ।
उत्तम सैन्यव नमक, श्वेत मरिच, मेनसिल इनको बराबर लेकर, बिजौरा के रस से पतला करके एक ही बार अञ्जन करने पर कण्डू को नष्ट करता है ॥१६॥
सशृङ्गवेरं सुरदाह मुस्तं
सिन्धुप्रभू (सू) तं मुकुञ्जानि जात्याः ॥१७॥
सुराप्रपिष्टं त्विदमञ्जनं हि
कण्डुवां च शोफं च हितं वदन्ति ।
सोंठ, देवदाह, मुस्ता, सैन्यव, चमेली की कलियाँ, इनको सुरा (मधु) में पीसकर अञ्जन करने से कण्डू और शोफ नष्ट होते हैं ॥१७॥
स्यन्दाधिमन्थकममाचरेक्ष
सर्वेषु चेतेषु सदाऽप्रमत्तः ॥१८॥
(विशेषतो नावनमेव कार्यं संसर्जनं चापि यथोपदिष्टम्)
बलास प्रथित, पिष्टक, प्रकिल्लवत्तम में—अभिष्यन्द और अधिमन्थ की सम्पूर्ण चिकित्सा करते । (विशेषतः इनमें नश्य करे, तथा संसर्जन विधि (पेया, विलेपी आदि विरेचन के पीछे बरतने की विधि) का पालन करे ॥१८॥
इति श्रीमुश्रुतसंहितायामुत्तरतन्त्रान्तर्गते शालाक्यतन्त्रे
कफामिष्यन्दप्रतिषेधो नामैकादशोऽध्यायः ॥१९॥
द्वादशोऽध्यायः
अथातो रक्ताभिष्यन्दप्रतिषेधं व्याख्यास्यामः ॥१९॥
यथोवाच भगवान् धन्वन्तरिः ॥२०॥
अब इसके आगे रक्ताभिष्यन्दप्रतिषेध अध्याय का व्याख्यान करेंगे—जैसा भगवान् धन्वन्तरि ने कहा था ॥२०॥
मन्थं स्यन्दं सिरोत्पातं सिराहर्षं च रक्तजम् ।
एकेनैव विधानेन चिकित्सेच्छतुरो गदान् ॥२१॥
अधिमन्थ, अभिष्यन्द, शिरोत्पात और सिराहर्ष इन चारों रक्तजन्य रोगों की चिकित्सा एक ही विधि से करे ॥२१॥
व्याध्यातांश्चतुरोऽध्येतान् स्निग्धान्कीमनेन सारिषां ।
रसैरुदारैरथवा सिरामोक्षेण योजयेत् ॥२२॥
उपर्युक्त चारों रोगों में से किसी एक रोग से पीड़ित रोगी को पुरातन घृत (एक सौ साल) या अधिक स्नेहवाले मांस रसों से स्निग्ध करके सिरामोक्षण करे ।
वक्तव्य—दस वर्ष के पुराने घी को पुराण घृत कहते