सुश्रुत संहिता
Sushruta Samhita
महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)
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उत्तरतन्त्रम्
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को बचाकर पद्माश्रित में एक भाग को कनीनका (नासा भाग) और अपांग (कान की ओर का भाग) के समान-बराबर प्रदेश को लक्ष्य में रखकर, सब स्थानों पर-बालों की पंक्ति के साथ-साथ पलक के उपरि-अग्रिम भाग में से जो के आकार में (बीच में जरा मोटा-किनारों पर पतला होता हुआ) त्वचा को तिरछे रूप शस्त्र से काटे। चर्म को काटकर पलक को अश्व आदि के बाल से वैद्य सावधानी से सी देवे। फिर मधु और घृत लगाकर शेष चिकित्सा ब्रण की माति करे। माथे पर एक पट्टी बांधकर सी देवे। इसमें दूसरी पट्टी (आँख की पट्टी) सी देवे। शस्त्रकर्म के स्थिर (कठिन) हो जाने पर-वैद्य घोड़े आदि के बाल जो सीने में बरते, उनको निकाल देवे ॥३-६॥
एवं न चेच्छाम्यति तस्य वर्त्मं
निर्मुञ्च्य दोषोपहतां बलि च ।
ततोऽग्निना वा प्रतिसारयेत्तां
क्षारेण वा सम्यगवेद्व धीरः ॥७॥
यदि इससे पद्म कोप शान्त न हो तो पलक को उलटा करके, दोषों से युक्त बलि (मांस) को अग्नि से या क्षार से मली प्रकार कुशल वैद्य प्रतिसारण करे-जलाये ॥७॥
छिन्त्वा समं वाऽप्युपपद्ममालां
सम्यगगृह्त्वा बडिरोहिभित्तु ।
पथ्याफलनं प्रतिसारयेत्तु
घृष्टनं वा तौन्नरकेण सम्यक् ॥८॥
अथवा बालों की नई पंक्ति जो पैदा हो गई है, उसे तीन बडियों से मली प्रकार पकड़कर काट देवे। फिर हरड के फल से (हरड को पानी में घिसकर) या तुबरक के फल से इसे रागड़े ॥८॥
चत्वार एते विधयो विहन्तु
पद्मोपरोधं पृथगेव अस्ताः ।
विरेचनार्ञ्च्योतनधूमनस्य-
लेपाञ्जनस्तेहरसक्रियाश्च ॥९॥
शस्त्रकर्म, अग्निकर्म, क्षारकर्म और भेषजकर्म चारों विधियों-पद्मकोप को सम्पूर्ण रूप से नष्ट करने में समर्थ हैं। विरेचन, आरञ्च्योतन, धूम, नस्य, लेप, अञ्जन, स्तेहपान, रसक्रिया, बालों का उखाड़ना, इनको दोषों के अनुसार बरते ॥९॥
इति शुभ्रतयं हितायमुत्तरतन्त्रान्तर्गते शालाक्यतन्त्रे पद्मगतरोगप्रतिषेधो नाम षोडशोऽध्यायः ॥१६॥
सप्तदशोऽध्यायः
अथातो दृष्टिगतरोगप्रतिषेधं व्याख्यास्यामः ॥११॥
यथोवाच भगवान् धन्वन्तरिः ॥२॥
अब इसके आगे दृष्टिगत रोग प्रतिषेध का व्याख्यान करने जैसा कि भगवान् धन्वन्तरि ने कहा था।
वि० मन्तव्य—इस अध्याय में दृष्टि के रोगों को चिकित्सा लिखी गई है ॥१,२॥
त्रयः साध्याश्चयोऽसाध्या षट् च याप्या अवन्ति हि ।
तीन रोग (धूमदृष्टि, पित्तविदग्ध दृष्टि, कफविदग्ध दृष्टि) साध्य हैं, तीन रोग (हृस्वजाञ्च, नाकुलान्ध, गम्भीरका) असाध्य हैं, छै रोग (अर्दनादि कान्) याप्य हैं ।
तत्रैकस्य प्रतीकारः कीर्तितो धूमदृशिनः ॥३॥
इनमें से एक धूमदृष्टि रोग का प्रतीकार (हेतु ब्याधि विपरीत क्रिया) पित्ताभिष्यन्द में कह दिया है ॥३॥
दृष्टौ पित्तविदग्धायां विदग्धायां कफेन च ।
पित्तश्लेष्महर्षं कुर्याद्विधिं शस्त्रक्षताहृते ॥४॥
नस्यसेकाञ्जनलैपपुटपाकैः सतर्पणैः ।
आद्ये तु त्रैफलं पेयं सर्पिष्ठैवृत्तमुत्तरे ॥५॥
तैल्वकं चोभयोः पथ्यं केव्रलं जीर्णमेव वा ।
पित्तविदग्ध दृष्टि में पित्ताभिष्यन्दनाशक, कफविदग्ध दृष्टि में कफाभिष्यन्द नाशक चिकित्सा करे, परन्तु स्त्रियावेध न करे। नस्य, सेक, अञ्जन, आलेप, पुटपाक, तर्पण बरते। पित्तविदग्ध दृष्टि में वैफलघृत (त्रिफला के क्वाथ एवं कल्क से बनाया) पीये। कफविदग्ध दृष्टि में त्रैवृत्त घृत (त्रिवृत्त के क्वाथ कल्क से बनाया) पीये अथवा दोनों में तैल्वक घृत तिल्वक-पट्टिका लोघ से बनाया पीये, या पुराना (दस साल का) घृत असंस्कृत ही पीये ॥४,५॥
गैरिकं सैन्धवं कृष्णा गोदन्तस्य मपी तथा ॥६॥
गोमांसं मरिचं बीजं शिरीषस्य सनःशिला ।
वृन्तं कपित्थान्मधुना स्वयंकुमाफलानि च ॥७॥
चत्वार एते योगाः स्युर्बभ्योरञ्जने हिताः ।
(१) गेरु, सैन्धव, पिप्पली, गाय के दाँत की राख (२) गाय का मांस, मरिच, शिरीष के बीज, मैनसिल, (३) कैथ के कोपलों को मधु के साथ, (४) कौंच के फल-मधु के साथ अञ्जन करना-दोनों रोगों में उत्तम है ॥६,७॥
कुञ्जकाशोकरशालाप्रप्रियकुनलिनोत्पलैः ॥८॥
पुष्पैर्हरेणुकृष्णाद्वापथ्यामलकसंयुतैः ।
सर्पिसंयुतैश्चूर्णवणुनाड्यामवस्थितैः ॥९॥
अञ्जयेद्वं द्रावपि भिषकं पित्तश्लेष्मविभाविती ।
कुञ्जक, अशोक, शाल, आम, प्रियंगु, नलिन, कमल इनके फूल, हरेणु, पिप्पली, हरड, आंवला, इनको घी और मधु के साथ मिलाकर इस चूर्ण को बांस की नलिका में रखवे। इससे पित्त एवं कफ दोनों से विदग्ध दृष्टियों में अञ्जन करे ॥
आमजम्बूद्वं पुष्पं तद्रसेन हरेणुकाम ॥१०॥