सुश्रुत संहिता
Sushruta Samhita
महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)
पृष्ठ 682, कुल 872 में से
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सिराजारे सिरा यास्तु कठिनास्ताथ बुद्धिमान् ।
उ्चिखेन्मण्डराग्रेण बडिशोनावरम्बिताः ॥२०॥
सिराजाक मे जो सिरा कठिन हो, उसको बुद्धिमान् व्य
बड़िश से उठाकर मण्डलाग्र से काट देवे ॥२०।
सिरास पिडका जाता या न सिध्यन्ति भेषज्ञेः।
अमवन्मण्डखाप्रण तासां छेद नसिष्यते ॥२१॥
सिराओं मे उत्पन्न जो पिडका ओषधियों से शान्त न होती
हो, उसका अर्म की माति मण्डलाग्र से छेदन करना चाद्ये ॥ रोगयोऽचेतयोः कायमर्मोक्तं प्रतिसोरणम् । `
विधिश्चापि यथादोषं छेखनद्रव्यसंभृतः ॥२२॥
सिराजाक, सिरापिड़का म अम मे कंडे यवक्षार से प्रति-
. सारण करना चाहिये । दोष के अनुसार वाताभिष्यन्द् आदि मे
कही विधि को ठेखन द्रव्यो से बरतना चाहिये | २२॥
सन्धौ संस्वेद्य शखेण पवंणीकां विचक्षणः | उत्तरे च त्रिभागे च बडिेचावरम्बिताम् ॥२९३॥
छिन्द्यात्ततोऽधममे, स्यादश्रुनाडी ह्यतोऽन्यथा ।
प्रतिसारणमच्रापि सैन्धवक्षो दरमिष्यते ॥२४॥
ेखनीयानि चूणीनि भ्याधिश्चेषस्य भेषजम् ।
कृष्ण ओर शुक्क भाग की सन्धि म स्वेदन देकर, बुद्धि
` मात् वेद्य पवणिका को पिक्छके 2 एक तिहाई भाग मे बडिश
से पकड़कर ( ऊचा उठाकर ) काट देवे, फिर आगे मेँ (मूड
ओर अग्रभाग के मध्यमे काटे। ेखा न करने से अश्रु नाड़ी = ब्रणहो जाता है। मधु ओर सेन्धव से प्रतिसारण करे । शेष
बेचे रोग के लिये ेखनीय चूण .बरते ।२३, २४॥ |
शङ्कं खयुद्रफेनं च मण्डकीं च सय॒द्रजाम् ॥२५॥
` स्फटिकं कुरुविन्दं च प्रवाखाश्मन्तकं तथा ।
` वदूयंः पुखकं सुक्तासयस्ताम्ररजांसि च ॥२६॥। समभागानि संपिष्य साधं स्रोतोज्लनेन तु । चूणोज्लनं कारयित्वा भाजने मेषश्ङ्कजे ॥२७॥
संस्थाप्योभयतः काछमञ्जयेत् सततं बुधः| . अ्माणि पिडकां हन्यात् सिराजाखानि तेन वै ॥ र| . शंख, समुदरफेन, सुक्ताशक्ति, स्फटिक, ऊुरविन्द् (पद्मराग) भाक) अमन्तक ( विरहटा , वेद्भय, पुखक; क्ता ( मोती ); लोहमस्म, तामभस्म, इनको परस्पर खमान भाग े, योर सबके .* . बराबर खोर्तोजन ( सुरमा ) के । इस ' चू्णाजन को मेष के | सींग के पत्रमे रख देवे। प्रातः सायं दोनों समय निरन्तर | इसका अखन करे] इससे अम, पिडका; धिराजाल नष्ट. होते है ॥२५-२८॥ ~ `
अरास्तथा यच्च नाम्ना शष्कार्ञोऽचुदमेव च ।
अभ्यन्तरं वत्मज्ञया विधानं तेषु वद्दयते ॥२९॥
इनकी चिकित्सा कहते ह ॥ २६] ३ ~ ध 1
सुश्रुतसंहिता
मूढ मे काट देवे । सेन्धव, कासीख, पिप्पली से इस पर प्रति. सारण करे । रक्त के बन्द हो जने पर शलाका से मी प्रकार जलये । यदि रोग बच जाये, तो क्षार से अवलेखन करे । दोषं ` को निकालने के ल्य तीण वमन, तीदण विरेचन देवे। । वातादि दोष के अनुसार अभिष्यन्द उपचार बरते |॥३०.३२
जैसा कि भगवान् धन्वन्तरि ने का था ॥१,२॥
` पल्को भे होनेवाखा पदमक्रोप नामक जो रोग १६ विटक | वतमं ॐ न्द्र के अश, ( वरत्माश ), शष्काश, वत्मावु द् | कहा, दै, उस पद्मक्रोय मे स्निग्ध शरीरवाे रोगी को बि!" |
८... | (ल्टाकर युगमता रहती है ), भुवो के' नीचे दो.
| अ | ॥ मोपस्वेय निभुञ्य सच्योरिष्निप्य प्रयतनतः। मण्डलाग्रं तीदणेन भूरे भिन्याद्धिषग्बरः ॥३०॥ ततः सैन्धवकासीसद्रष्णाभिः प्रतिसारयेत | स्थिते च रुधिरे वतमं दहेत् सम्यक् शलाकया ॥३१। क्षारेणावख्खिच्चापि व्याधिशेषो भवेयदिं तीचणेरुभयतोभ गेप्ततो दोषमधिक्षिपेत ॥२२॥ वितरेच्च यथादोषमभिष्यन्दक्रियाविधिम्। पलक पर स्वेद देकर पलकों को उख्टा करे, अशं या अङ्रुद् को सूद से ऊंचा करके, कुशल वेद्य, तीदण मण्डलागर ष |
शख्कमण्युपरते मासं च स्यात सुयन्त्रितः ॥२६१॥
राख्कम के पीड एक मास पयन्त परदेज पले ॥
इति सुश्रतसंहितायायत्तरतन्वान्तगते शालाक्यतन्त्रे `
रोगप्रतिषेधो नाम पञ्चदलोऽध्यायः ॥१५॥
षोडशोऽध्यायः
अथातः पच्मकोपप्रतिषेधं व्याख्यास्यामः ॥१॥
यथोवाच भगवान् धन्वन्तरिः ॥२॥
अव इसके आगे पद्धमकोप प्रतिषेध का व्याख्यान करगे- .
याप्य्तु यो वर्मभवो विकारः _. `
॑ पदमभ्रकोपोऽभिदहितः पुरस्तात् । त्रोपविष्टस्य नरस्य चमं | वत्मोपरिष्टादजुतियगेव ॥२॥
श्रषोरधस्तात् परिमुच्य भागौ ` पदमाश्चितं चैकमतोऽवङ्न्तेत्। कृनोनकापाङ्गखमं समन्ता-
` द्यवाकृति स्तिग्धतनोनरश्य ॥४॥
उत्कृत्य शखेण यवप्रमाणं -
, . ~ ~. बाठेन सीग्येद्धिषगप्रमत्तः।
दन्त्वा च सर्पिमेधुनाऽ्वशेषं ``: `
~ ^ <: कयोद्धिधानं विहतं त्रणे यत् ।॥५॥ खलाटदेशेच निबद्धपट | ध
. प्राक्स्यूतमत्राप्यपरः च बदूधव्। (भ
स्थय गते चाप्यथ शखमाग . बाखान्ः विसुच्ेत कशबोऽभिवीरय, (९
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