सामग्री पर जाएँ
भारतकोश
सुश्रुत संहिता

सुश्रुत संहिता

Sushruta Samhita

महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished872 पृष्ठ

पृष्ठ 689, कुल 872 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 689

अ० १७ ]

८०

उत्तरतन्त्रम्

६३३

लगभग ६०-६५ वर्ष की वयस में व्यक्त होता है। यदि इस वयस में अभिध्वन्द हो जाय तो लिङ्गनाश नहीं होता, क्योंकि— अभिध्वन्द रोग में दोष का अभिध्वन्दन(सवन-खाव) हो जाता है, और तीक्ष्ण अञ्जन करते रहने पर भी—दोष का खाव होता रहता है, अतः लिङ्गनाश नहीं होता ॥५७-६०॥

ससिन्ध्य विद्वुमात्रं तु योषिस्तन्येन कोविदः ॥६१॥

स्थिरे दोषे चले वाऽपि स्वेदयेदक्षि बाह्यतः।

सम्यक् शलाकां संस्थाप्य भङ्गैरनिलनाशनैः ॥६२॥

शलाकाप्रेण तु ततो तिलिखेदृष्टिमण्डलम्।

विध्यतो योऽन्यपाश्वेऽन्धस्तं रुद्ध्वा नासिकापुटम् ॥

उच्छिन्ननेन हर्तव्यो दृष्टिमण्डलमः कफः।

वेधन के पीछे, बुद्धिमान् वैद्य तुस्त धावन से सेचन करे।

दोष के अस्थिर या स्थिर होने पर भी बाहर से आँखों पर स्वेद देवे। इसके लिये शलाका से पलकों को स्थिर करके; वातनाशक ऐरण्ड आदि पत्तों से स्वेद देवे। फिर शलाका के अप्रभाग से दृष्टिमण्डल में लेखन करे, जिससे कफ का जमाव दूर जाये। वेधन करते समय आँख के दूसरे पाश्व के नासापुट को बन्द करके, दृष्टिमण्डल में स्थित कफ को उच्छिन्न से (नाक से छींककर या जोर से वायु के साथ निकालकर) बाहर करे ॥६१-६३॥

निरभ्र इव धर्माशुर्गदा दृष्टिः प्रकाशते ॥६४॥

तदाऽसौ लिखिता सम्यग् ब्रह्मा या चापि निर्व्यथा।

(एवं त्वशक्ये निर्हुतुं दोषे प्रत्यागतेऽपि वा ॥६५॥

स्नेहाद्यैरुपपन्नस्य व्यधो भूयो विधीयते।)

ततो दृष्टेषु रूपेषु शलाकामाहरेच्छन्तेः ॥६६॥

पूतैनाभ्यज्य तयनं वक्ष्यपट्टेन वेष्टयेत्।

ततो गृहे निराबाधे शयीतोत्तान एव च ॥६७॥

उद्गारकासक्ष्यवृष्टीवन्तोक्तम्पनानि च।

तत्कालं नाचरेदूधं यन्त्रणा स्नेहपीतवत् ॥६८॥

बादल रहित आकाश में जैसा सूर्य चमकता है, ऐसे दृष्टि जब चमकने लगे, तब भली प्रकार लेखन हुआ जाने, इसमें किसी प्रकार की पीड़ा नहीं होनी चाहिये। यदि इस प्रकार से लिंगनाश न निकाला जा सके, अथवा दोष के फिर वापिस आ जाने पर, स्नेहन आदि फिर से करके, पुनः वेधन करे।) जब रूप दीखने लगे तो लगाई हुई शलाका को (पलकें न चलाये—इसलिये जो शलाका पहले—६२ वें श्लोक में लगाई है) धीरे से निकाल ले। फिर घी से आँख पर अभ्यंग करके पही बाँध दे। धूम-धूल आदि (खासकर प्रकाश) से रहित घर में उत्तान-पीठ के भार लेटा रहे। उद्गार खाँसना छींक आना, थुकना, कपिना (उठना-बैठना), उस समय न करे, इसके आगे आचारिक नियम स्नेह पीये हुए की भाँति हैं ॥

व्यहात् व्यहाच्च धावेत कपायैरनिलापहैः।

वायोर्मयात् व्यहावृधं स्वेदयेदक्षि पूर्ववत् ॥६९॥

वायुनाशक (एरण्ड मूलादि वातहर चतुष्प द्रव्यों के) क्वाथ से प्रति तीसरे दिन आँखों को धोये। वायु का प्रकोप न हो, इसलिये तीन दिन के पीछे आँखों पर पहले की भाँति कीमल सेक वातनाशक द्रव्यों से करे ॥६६॥

दशाहमेव संयम्य हितं दृष्टिप्रसादनम्।

पश्चात्कर्म च सेवेत लब्धवन्नं चापि मात्रया ॥७०॥

इस प्रकार दस दिन तक, उत्तान लेटा रहकर पीछे से नस्य, तर्पण आदि दृष्टि को निर्मल करनेवाले कर्म करे। लघु अन्न को मात्रा में (अग्नि बल के अनुसार) खाये ॥७०॥

सिराण्यधविधौ पूर्व नरा ये च विवजिताः।

न तेषां नीलिकां विधेदैन्यत्राभिहिताद्विषक् ॥७१॥

सिरावेध विधि में बालक, वृद्ध, आदि जो अवैध कहे हैं, उनमें नीलिका (लिंगनाश) का वेधन करे और देव कृत छेद से अन्यत्र कभी भी वैध वेध न करे ॥७१॥

पूर्वते शोणितेनाक्षि सिरावेधाद्विसर्पता।

तत्र क्षीस्तन्ययष्ट्याहृपकं सेके हितं घृतम् ॥७२॥

देव कृत छेद से अन्यत्र सिर का वेधन होने पर फैलते हुए रक्त से आँख भर जाती है। इस अवस्था में धावन और मुह्ले-हठी से पकाया घृत परिषेक में उत्तम है ॥७२॥

अपाङ्गासनविद्धे तु ओफशूलाश्रुरक्ताः।

तत्रोपनाहं भूमध्ये कुर्याच्चोष्णाज्यसेचनम् ॥७३॥

व्यधेनासनक्रुण्णेन रागः क्रुणं च पीड्यते।

तत्राधःशोधनं सेकः सर्पिषा रक्तमोक्षणम् ॥७४॥

अथाप्युपरि विद्धे तु कृष्ठा रुक् संप्रवर्तते।

तत्र कोष्णेन हविषा परिषेकः प्रगस्यते ॥७५॥

शूलाश्रुरागास्तव्यर्थमधोवेवेन पिच्छलः।

शलाकामनु चास्नावर्तत्र पूर्वचिकित्सितम् ॥७६॥

रागाश्रुवेदनास्तम्भहर्षाश्चातिविधद्विते।

स्नेहस्वेदौ हितौ तत्र हितं चाप्यनुवासनम् ॥७७॥

दोषस्त्वधोऽपकृष्टोऽपि तरुणः पुनरुर्वृगः।

कुर्याच्छुक्लाशुणं नेत्रं तीव्ररुद्धन्घटदर्शनम् ॥७८॥

मधुरैस्तत्र सिद्धेन घुतेनाह्णः प्रसेचनम्।

शिरोवस्ति च तेनेव दधान्मांसैश्च भोजनम् ॥७९॥

अपांग के पास में वेधन होने पर सूजन, शूल, रक्त का आना होता है, इसमें भुवों के मध्य में उपनाह करे और गरम-घी से सेचन करे कृष्णभाग के पास वेधन होने से सुखी होती है, कालाभाग दुखता है इस में विरेचन, घी से सेक और रक्त मोक्षण करे। ऊपर में वेधन होने पर तीव्र वेदना होती है, इसमें सुहाते गरम घी से परिषेक उत्तम है। नीचे में वेधन होने से वेदना, आँसू आना, सुखी, शलाका के पीछे तुरन्त खाव अतिपिच्छल, (गीघ विकास आना) होता है, इसमें धावन