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भारतकोश
सुश्रुत संहिता

सुश्रुत संहिता

Sushruta Samhita

महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished872 पृष्ठ

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सुश्रुतसंहिता

[ अ० १७ ]

और मुलेहटी से पकाये घी से परिषेक करे । अतिशय आषाढ होने से सुखी, आँसू आना, वेदना, स्तम्भ, हर्ष होता है इसमें स्नेहन और स्वेद एवं अनुवासन उत्तम है । तरुण ( अपक्व ) दोष नीचे खींच देने पर भी फिर ऊपर जाकर नेत्र को श्वेत या लाल कर देता है, इसमें तीव्र वेदना और दृष्टि नष्ट हो जाती है । इसमें काकोल्यादि मधुर द्रव्यों से सिद्ध घृत से आँखों पर सेक करे । इसी घृत से शिरोवस्ति देवे । मांसों से ( जांगल मांस ) भोजन कराये । ( मधुरैः यष्टीमधुकुद्विभिः, डल्हण ) ॥

दोषस्तु संजातबलो घनः संपूर्णमण्डलः ।

प्राप्य नश्येच्छलाकाग्रं तन्वभ्रमिष माहृतम् ॥८०॥

जिस प्रकार वायु पतले बादल को तुरन्त नष्ट कर देती है, इसी प्रकार पूर्ण पका हुआ, घन ( स्थूल ) एवं सम्पूर्ण रूप में गोला हुआ ( पूरा बना ) दोष ( लिंगनाश ) शलाका के अग्रभाग के कूने मात्र से ही नष्ट हो जाता है । ( गिर पड़ता है ) सरलता से निकल जाता है ॥८०॥

मूधोभिघातव्यायामव्ययविमृच्छनैः ।

दोषः प्रत्येति कोपान्च विद्दोऽतितरुणश्च यः ॥८१॥

जो लिंगनाश अपूर्ण कच्चा होता है, उसका यदि वेधन कर दिया जाये तो शिर पर चोट लगाने से, व्यायाम से, मैथुन से वसन से, मूर्च्छा से, क्रोध से, फिर वापिस लौट आता है, ( फिर पैदा हो जाता है ) ॥८१॥

शलाका कर्कश शूलं, खरा दोषपरिप्लुतिम् ।

ब्रणं विमालं स्थूलाभा तीक्ष्णा हिंस्यादनेकधा ॥८२॥

जलाक्षवां तु विषमां, क्रियासङ्गमथस्थिरा ।

करोति वजिता दोषैस्तस्मादेभिर्हिता भवेत् ॥८३॥

शलाका दोष—कर्कश ( खुरदरी ) शलाका शूल करती है, खर शलाका दोष को चारों ओर बढ़ाती है, आगे से मोठी शलाका चौड़ा ब्रण करती है, तीक्ष्ण शलाका बहुत प्रकार के क्षत करती है । विषम शलाका, जल को बढ़ाती है, अस्थिर ( काँपती हुई ) शलाका, दृष्टि का उपरोध करती है ॥८३, ८३॥

अष्टाङ्गुलायता मध्ये सूत्रेण परिवेष्टिता ।

अङ्गुष्ठपर्वसमिता वक्रत्रयोमुकुलाकृतिः ॥८४॥

ताम्रायसो शातकुम्भी शलाका स्यादनिन्दिता ।

इसलिये इन दोषों से रहित शलाका उत्तम होनी चाहिये । शलाका की लम्बाई आठ अंगुल, बीच में धागों से लिपटी, अंगूठे के पर्व के बराबर मोटाई की, मुखों पर से मुकुल ( कली-डोडी ) के आकार की, ताम्र, लोह या स्वर्ण की शलाका प्रशस्त है ॥८३, ८४॥

रागः शोकोऽवृं चोषो बुद्धवृं शूकराक्षिता ॥८५॥

अधिमन्थादयश्चान्ये रोगाः स्युन्यंघदोषजाः ।

अहिताचारतो वाऽपि यथास्वं तानुपाचरेत् ॥८६॥

व्यधन के दोष से सुखी, सज्जन, अर्जुन चोष, बुद्धबुद्ध के समान मांसबुद्धि, नीचे को देखना (अधो दृष्टि), अधिमन्थ

आदि रोग हो जाते हैं । अथवा अहित आचरण से ये रोग हो जाते हैं । इनकी दोषों के अपने अनुसार चिकित्सा करे ॥

रुजायामक्षिरागो वा योगान् भूयो निबोध मे ।

गैरिकं सारिवा दूषां यक्षपिष्टं घृतं पयः ॥८७॥

सुखालेपः प्रयोयोज्योऽयं वेदनारागशान्तये ।

शुद्धभृष्टैस्तिवैवाऽपि सिद्धार्थकसमायुतैः ॥८८॥

मातुलुङ्करसोपैतैः सुखालेपस्तदर्थकृत !

पयस्यासारिवापत्रमञ्जिष्टामधुकैरपि ॥८९॥

अजाशीरान्वितैर्लेपः सुखोष्णः पथ्य उच्यते ।

दारुपद्मकशुण्टाभिरेवमेव कृतोऽपि वा ॥९०॥

द्राक्षामधुककुष्ठैर्वा तद्गतं सैन्धवसंयुतैः ।

रोधसेन्धवमृद्रीकामधुकैर्वाऽप्यजापयः ॥९१॥

श्रुतं सेके प्रयोक्तव्यं रुजारागनिवारणम् ।

मधुकोत्पलकुष्ठैर्वा द्राक्षालाक्षासितायुतः ॥

ससैन्धवैः श्रुतं क्षीरं रुजारागनिवहणम् ॥९२॥

शतावरीपृथक्पर्णीमुस्तामलकपद्मकैः ।

साजक्षीरैः श्रुतं सर्पिदाहशूलनिवहणम् ॥९३॥

वातघ्नसिद्धं पयसि सिद्धं सर्पिश्चतुगुणं ।

काकोल्यादिप्रतीवापं तद्युज्यत् सर्वकर्मसु ॥९४॥

वेदना में या आँख की सुखी में दूसरे योगों को मुझसे सुनो । वेदना और सुखी की शान्ति के लिये गेरु, सारिवा, दूध, जो का कल्क, घी, दूध इनका सुहाता गरम लेप आँख के आस पास या आँख पर करे । इसी प्रकार तिलों को थोड़ा सा धीमी आँख पर भूनकर, सरसों को मिलाकर बिजोरि के रस के साथ लेप करे यह भी वही लाभ करता है । विवारी, सारिवा, तेजपत्र, मजोठ, मुलेहटी इनको बकरी के दूध में पीसकर सुहाता गरम लेप उत्तम है । तीन योग, (१) दारुहरी, पद्माल, सौंठ, इनको बकरी के दूध में पीसकर लेप करे । (२) लोष, सैन्धव, द्राक्षा, मुलेहटी—बकरी का दूध, (३) द्राक्षा, मुलेहटी, कूठ, सैन्धव, इनको बकरी के दूध के साथ पीसकर परिषेक करे, यह वेदना, सुखी को नष्ट करता है । मुलेहटी, कमल, कूठ, द्राक्षा, लाल, शर्करा, सैन्धव, इनसे सिद्ध बकरी का दूध वेदना और सुखी को नष्ट करता है । शतावरी, पुश्पिपर्णी, मुस्ता, आँवला, पद्माल, बकरी का दूध, इनसे सिद्ध क्रिया घृत दाह, शूल को नष्ट करता है । मृद्री, दान्यादि वातघ्न द्रव्यों से सिद्ध घी से चार गुने दूध में काकील्यादिगण का प्रत्येक देकर सिद्ध क्रिया घृत, नस्य, आलैष आदि सब कार्यों में बरते ॥८७-९४॥

शान्त्यत्येवं न चेच्छूलं स्निग्धस्विन्नस्य मोक्षयेत् ।

ततः सिरां दहेद्राऽपि मतिमान कीर्तितं यथा ॥९५॥

यदि इस प्रकार से भी शूल शान्त न हो तो स्नेहन