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भारतकोश
सुश्रुत संहिता

सुश्रुत संहिता

Sushruta Samhita

महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished872 पृष्ठ

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३० १८]

उत्तरतन्त्रम्

६३१

स्वेदन देकर खिरामोक्षण करे अथवा कहे अनुसार (भू शंख-ललाट प्रदेश में) दाह कर्म करे ॥६५॥

हृष्टेरतः प्रसादार्थमञ्जने शृणु मे शुभे ।

मेवशुक्लस्य पुष्पाणि शिरीषधवयोरपि ॥६६॥

सुमनायाश्च पुष्पाणि मुक्ता वैदूर्यमेव च ।

अजाक्षीरेण संपिष्य ताम्प्र समाहमावपेतु ॥६७॥

प्रविधाय च तद्वर्तीयांजयेच्छाञ्जने भिषक् ।

क्षोतोर्जं विदुर्मं फेनं सागरस्य मनःशिलाम् ॥६८॥

मरिचानि च तद्वर्तीः कारयेच्छ्वापि पूर्ववत् ।

दृष्टिस्थैर्यार्थमेतत्तु विदध्यादङ्गजने हितम् ॥६९॥

इसके आगे दृष्टि की निर्मलता के लिये शुभ दो अंजनों को मुझ से सुनो । १ अंजन-मेघशृंगी, शिरीष, धव इनके फूल, चमेली के फूल, मोती, वैदूर्य (बिस्तीर), इनको बकरी के दूध के साथ पीसकर, सात दिन तक ताम्र पात्र में रखले । फिर वर्ती बनाकर इस वर्त्ति से अञ्जन करे । २—क्षोतांजन, मूंगा, समुद्र फेन, मेनसिल, मरिच इनको बकरी के दूध से पीसकर सातदिन तक ताम्र पात्र में रखले । दृष्टि की स्थिरता के लिये इनका अञ्जन करना उत्तम है ॥६६-६९॥

भूयो वक्ष्यामि मुख्यानि विस्तरेणाञ्जनानि च ।

कल्पे नानाप्रकराणि तान्यपीह प्रयोजयेत् ॥१००॥

मुख्य अञ्जनों को पुनः विस्तार से किया कल्प अध्याय में कहूँगा; उनको भी यहाँ बरते ॥१००॥

इति श्री सुश्रुतसंहितायामुत्तरतन्त्रान्तर्गते शालाक्यतन्त्रे दृष्टिगतरोगविज्ञानीयो नाम सप्तदशोऽध्यायः ॥१०॥

अष्टादशोऽध्यायः

अध्यातो क्रियाकल्पं व्याख्यास्यामः ॥१॥

यथोवाच भगवान् धन्वन्तरिः ॥१॥

अब इसके आगे क्रिया कल्प का व्याख्यान करेंगे—जैसा भगवान् धन्वन्तरि ने कहा था ।

वि० मन्तव्य—इस अध्याय में नेत्र के लिये तथा नेत्र रोगों के लिये उपयोगी औषधों के प्रयोगार्थ तर्पण आदि की कल्पना (विधि) कही गई है ॥१,२॥

सवशास्त्रार्थतस्वज्ञस्तपोदृष्टिरुदारधीः ।

वैश्वाभिन्नं शशासाथ शिष्यं काशिपत्सिमुनिः ॥३॥

सब शास्त्रों के अर्थ के तत्त्व को जाननेवाले तपोदृष्टि, उदारबुद्धि, काशिपति मुनि धन्वन्तरि ने विश्वामित्र के पुत्र एवं शिष्यरूप से आये सुश्रुत को कहा ॥३॥

तर्पणं पुटपाकश्च सेक आरुच्योतनाञ्जने ।

तत्र तत्रोपदिष्टानि तेषां न्यासं निबोध मे ॥४॥

स्थान स्थान पर तर्पण, पुटपाक, सेक, आरुच्योतन, अंजन आदि जो कहे हैं, उनको विस्तार में मुझ से सुनो ।

वि० मन्तव्य—यहाँ पर तर्पण आदि ५ ही कल्प (कल्पना) बतलाए गये हैं, परन्तु श्री शाङ्कधराचार्य ने इनके अतिरिक्त २ कल्प अन्य भी बतलाए हैं, यथा—१—पिण्डी जिसे पोटली कहते हैं, अथवा जो कल्क नेत्र पर बाँधा जाता है और २—विडाल जो नेत्र के बन्ध पर लेप किया जाता है ॥४॥

संशुद्धदेहशिरसो जीर्णोन्मत्स्य शुभे दिने ।

पूर्वाह्नि वाऽपरान्नि वा कार्यमच्छोस्तु तर्पणम् ॥५॥

वातातपरजोहोने वैद्यमन्युतान्तशायिनः ।

आधारो माषचूर्णनं किलञ्जेन परिमण्डली ॥६॥

समो दृढावसंवाधो कर्तव्यो नेत्रकोशयोः ।

पूरयेद्घृतमण्डस्य विलीनस्य सुखोदके ॥७॥

आपत्स्मात्प्रान्ततः स्थाप्य पञ्च तद्राकशतानि तु ।

स्वस्थे, कफे घट, पित्तेंड्यो दश बाते तदुत्तमम् ॥८॥

रोगस्थानविशेषेण केचित् कालं प्रचक्षते ।

यथाक्रमोपदिष्टेषु त्रीण्येकं पञ्च सप्त च ॥९॥

दश दृष्ट्यामाश्टयो च वाकशतानि विभावयेत् ।

ततश्चापाङ्गतः स्नेहं स्वावयित्वाऽक्षि शोधयेत् ॥१०॥

स्विन्नेन यक्पिष्टेन, स्नेहवीर्यरितं ततः ।

यथार्थं धूमपानेन कफमस्य विशोधयेत् ॥११॥

शरीर और शिर का (खिरामोक्षण, विरेचन, निलूह, शिरो-विरेचन से) भली प्रकार शोधन हो जाने पर, अब के जीर्ण हो जानेपर, शुभ दिन में—पूर्वाह्न में या अपराह्न में आँखों पर तर्पण करना चाहिये । इसके लिये वायु, धूप, धूल से रहित घर में रोगी को पीठ के भार चित्त लेटाकर, दोनों नेत्र कोशों पर, उड़द के गीले आटे से गोल, समान, मजबूत, खुली (तंग नहीं विस्तृत) पाली बनाये । इस में गरम पानी से पिघलाया घृतमण्ड (घृत के ऊपर की परत) भर देवे । इस घृत मण्ड को बालों के अग्रभाग तक भरकर, स्वस्थ अवस्था में पाँच सौ तक गिनने के समय पर्यन्त रखले । कफ में छः सौ, पित्त में आठ सौ, वायु में एक हजार तक गिनने तक रखले, यह उत्तम प्रमाण है । रोग स्थान के भेद से कोई आचार्य काल का नियम करते हैं, यथा—सन्धिरोग में तीन सौ, वाल्मीरोगों में एक सौ, शुक्लरोगों में पाँच सौ, कृष्णरोगों में सात सौ, सम्पूर्ण नेत्र के रोगों में एक हजार, दृष्टि के रोगों में एक हजार या आठ सौ वाक शत तक घृत रखले । फिर अपांग की ओर से स्नेहन को निकालकर आँख का शोधन करे । इसके लिये जौ के कल्क को स्वेदन देकर (गरम करके) उससे शोधन करे । स्नेह की शक्ति से प्रेरित कफ को कफ के विरोधि शिरो-विरेचन धूमपान से शोधन करे ॥५-११॥

एकाह्नि वा ज्यह्नि वाऽपि पञ्चाह्नि चेष्ट्यते परम् ।

यह तर्पण एक दिन (वायु में या न्यून दोष में), तीन दिन (पित्तदोष में या मध्य दोष में) पाँच दिन (कफ दोष में—या अधिक दोष में) करना चाहिये ।