सुश्रुत संहिता
Sushruta Samhita
महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)
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` रिक (आपा), जो रोग से अतिशय पीडित होती है, उस
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` कै अोग्य जो केः चे सव पुखाक ॐ मी अरोग ई ॥१९॥
. त्यत्यतिविदुष्कं यद्रक्षं यच्चातिदारुणम् 1
“ „ बादल आने पर; अतिष्ण या, अतिशीतल दिनो, „ विन्ता क यकरान मे, चक्कर आने पर, उपद्रवो के (वेदना स्वी आदि) शान्त हए विना आंखों मेँ तर्पण करन | उत्तम क, नही । 3 = । ~ युद्याक्स्तथतेषु नस्यं येषु च गदितम् ॥१९॥ = “
. वक्तव्य-स्वस्थडत्त
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विधातव्यं द्वथन्तरं तपणं भवेत् ।
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ततः प्रशान्तदोषेषु पुटपाकक्चमेषु च
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॥२०॥
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; | अहन्यहनिवातोस्ये, रक्तपित्त दिनान्तरम् | पुटपाकः प्रयोक्तव्यो नेत्रेषु भिषजा भवेत् तपणं सन्निपातोत्ये थन्तरे, यन्तरं कफे ॥ स्ेहनो ठेखनीयश् रोपणीयश् स रिधा.॥ २१ तपणे वृप्रिलिङ्गानि नेत्रस्येमानि रक्षयेत् ॥१२॥ दर्पो के शान्त हौ जाने पर्, पुटपाक को सहन करन द सखस्वप्नावबोधत्वं वेश्यं बणपाटवम् । शक्ति आ जाने पर, वेय को ने्ों मे पुटपाक रतना चाहिये | निङठेतिन्यौधिविध्वसः क्रियाङाघवमेव च ॥१३॥ यह पुटपाक तीन प्रकार का ईे-स्नेहनः लेखनीय ओर रोपण । तपण से तृतसि के लक्षण (भटी प्रकार तपण होने प्र ओंख दितः स्निग्धोऽतिरूक्षस्य स्निग्धस्यापि च छेखनः | मे निम्न होते ह--सुख से नीद आना ओर जागरण होना, ्बेखाथेमपरः पित्तासृग्रणवातनुत् ॥२२॥ ` विशदता (निमलता) श्वेत आदि वणं का स्यष्टीकरण, तात्का- अतिरूख मे स्निग्ध, रिनग् आल भें लेखन दष्टिवि चै ल्क सुल) रोग का नाश, निमेष-उन्मेष आदि. क्रिया में | छथि एवं पित्तरक्तजन्रण के ना कै ल्यि रोषण पुटा श्रता
दवत
(या नेच मेँ इल्कापन) होती. दै ॥१२,१२॥। उत्तम है ॥२२॥ | „
थ | सनेहमांसवसामञ्जमेदः स्वाद्रोषधेः कृतः|
द 3९ जतय से भाल भात, पद, जनि १.७ ।७६् प | । स्नेह स्नः तथा यासु मांस पारो दे वाते ठु सः ॥२६। कण्डू से युक्त, दोष से व्याप्त (अनूप देश के प्राणियों का मांष),. वषा होती हे ॥१४५।॥ रूधमाविलमखाव्यमसहं ल र मज्जा, मेद ओर मधुर ओषधियो-से बनाया स्ने्न पुखपाक दो ज्याधिवृद्धिश्च तज्ज्ञेयं हीनतपितमक्षि | खो गिनने तक धारण करना चाहिये ॥२२॥ £ च ॥१५॥ ९ जते हीन तपण से आंख रुख, गदली, जाङ्गलानां यज्ृन्मांसेखनद्रम्यसंश्रतेः। प्रचुर आसूवाली, प्रकाश र को सहने मे असमथ, तश्रा रोग ब्रद्धि होती है ॥१५॥। ृष्णछोहरजस्तामंशङ्खविद्ुमसिन्धुजैः ॥२४॥ अनयोदांषवाइल्यात् प्रयतेत चिकिस्विते। सयुद्रफेनकासीसखोताजदधिमस्तुभिः ।
ङेखनो वाक्शतं तस्य परं धारणमुच्यते ॥२९॥ : ४२ भ भ धूमनस्याञजनेः सेके रूक्षैः रिनगधेच योगवित् ॥१६॥ 1
अतितपण म ओर दीनतपंण ९.८६. जागर पाशुओं के यज्रत्, मांस के साथ लेखनद्र््यो को मे दोष कौ अधिकता के अनुसार ¦ . । मिलाकर ठेखन पुटपाक बन ये-दइसको अधिक से अधिक एक योगवित् वेय, धूम, नस्य, अज्ञन, स्निग्ध, रक्च एवं स्निग्धसेक 9 सो गिनने तक धारण करे । लेखन द्रव्य-ङ्ृष्णलोक्षमस्म, तामः भस्म, शंल, प्रवाल; सेन्धवः समुद्रफेन, कासीख, लोतोजन, `
वरते (वाताभिभूिष्ट नेत्र मे स्निग्ध, पित्त.कफ मे सकष क्रिया-
, | दपि मस्र ये दँ ॥२५,२५॥
स्वेद करे) ।[९६॥)
स्तन्यजाङ्गकमथ्वाञ्यतिक्तद्रग्यविपाचितः। _ रेखनाल्िगुणं धायः पुटपाकस्तु रोपणः ॥२६॥ . दष (धावन); जांगलमांख, मधु-घी, 'तिक्तदर्व्यो सेः बनाया . ॑ .रोपण पुटपाक तीन. सो गिनने तक धारण करना चाहिये ॥२९॥ वितरेत्तपणोक्ं तु धमं दित्वा तु रोपणम् । र स्नेहस्वेदौ ढयोः कायो कायौ नेव च रोपणे ॥२७॥ . ` ,. . रोपण को छोड़कर शेष दोनों मे तपंणोक्त धूम देवे । हन दोनों म स्नेहन ओर स्वेदन दोनों करने चाहिये, रोपण सहनववत न कर २०7
एकाहं वा इहं वाऽपि यहं वाऽप्यवचारण१। | | ~ कफ म एकं दिन, पित्त भेदो दिन, वायु मेँ तीन दिग | | अथबा-केलनीय पुटपाक एकं दिन बरते.सनेहन धु टपाकं द, | दिनः, रोपणीय युट्पाक तीन दिन बसे ॥ यन्त्रणा तु क्रेयाकालाद्द्िशुर्णं काठमिष्यते ॥२९६॥ ।
च ` : जितने समय क् से चिकि्खा प ब्रती हो, उसे . दुगे ॥ 1 सम१ = +| ए. | त परहेज थ #। चिरि अ ५ स्ते ~ ष गिने) | न 1 ॥।
4 “ ह. तक ४ परदेज न +) पाठे ५ । ( + ५(चिकित्वा + 9 काठ ग क) स्नेह्पानः 1 | 6 चन क, से = द गिने):॥९०॥ ( कक "4 1 # ह - 5 ˆ = : | ५4 ।
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सीणेपच्माविर जहा रागक्डिष्टं च यद्भृश्म् ॥१५॥ ५ १ खभेतोजोमसंशयम् । 4 ~ . नो आंख प्रका मे मिचती हे, अतिशुष्क रहती है, रक्ष अतिकठिनपल्कों कौ, बार जिसमें टरटते या गिरते १
आंख को तपण दारा ही अवश्य बर मिलता है ॥१७) | इर्दिनाव्युष्णञचीठेषु चिन्तायासभमेषु च ॥१८॥ अशथान्तोपद्रवं चादधिणि तपण न प्र्चस्यते | ८
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त्याह न ये भक्त सदपानाकषमाशच थे | शन 9१. उस्म कनकः त पुटपाक बरते । जिन लोगो के लिये नस्य निन्दित ह, जो तपण के अयोग्य है एवं सनेहपान स
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