सुश्रुत संहिता
Sushruta Samhita
महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)
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उत्तरतन्त्रम्
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तेजःस्थनिलमाकाशमादर्शं भास्वरणि च नेत्रेत तपिते नेत्रे पुटपाककृते तथा ॥२६॥
तर्पण किये या पुटपाक लिया व्यक्ति दीपबाला आदि तेजस्वरूप, वायु, आकाश, दर्पण, सूर्य आदि भास्वर रूप को न देखे ॥२६॥
मिथ्योपचारादनयोर्गो व्याधिरुपाजयते ।
अज्ञानार्थ्योतनस्वेदैर्थास्वं तमुपाचरेत् ॥३०॥
तर्पण और पुटपाक के मिथ्या आचरण से जो रोग उत्पन्न हो जाता है, उसकी चिकित्सा अज्ञान, आश्च्योतन, स्वेदन से दोषों के अपने अपने अनुसार करे ॥३०॥
प्रसन्नवर्णं विशदं वातातपसहं लघु ।
सुखस्वप्नावबोध्यश्चि पुटपाकगुणान्वितम् ॥३१॥
पुटपाक के सम्यग विशद योग से—आँख का वर्ण निर्मल, (शफ), वायु और धूप को सहनेवाली, लघु, सुखपूर्वक सोना, और जागना इन गुणोंवाली हो जाती है ॥३१॥
अतियोगादुजः शोफः पिडकास्तिमिरोद्गमः ।
पुटपाक के अतियोग से वेदना, सज्जन, पिडका की उत्पत्ति, तिमिररोग हो जाता है ।
पाकोऽश्रु हर्षणं चापि हीने दोषोद्गमस्तथा ॥३२॥
हीन पुटपाक में—पाक, आंसू आना, हर्ष (वेदना विशेष अन्दर शीत); दोष वृद्धि होती है ॥३२॥
अत ऊर्ध्वं प्रवक्ष्यामि पुटपाकप्रसाधनम् ।
द्वौ बिल्वमात्रौ शलदण्मस्थ पिण्डौ मांसस्थ पेषितौ ॥३३॥
द्रव्याणां बिल्वमात्रं तु द्रवाणां कुड्वो मतः ।
तद्वैकध्वं समालोड्य पत्रैः सुपरिवेष्टितम् ॥३४॥
(काश्मरीकुमुद्वैरण्डपद्मिनीकदलीभवैः ।)
मुदावल्लिप्रमङ्गारैः खादिरैरवकूलयेत् ॥३५॥
कतकाश्मन्तकैरण्डपाटलावृषबादरैः ।
सक्षीरदुमकाष्टैर्वा गोमयैर्वाऽपि युक्तितः ॥३६॥
स्विन्नमुद्भूत्य निष्पीड्य रसमादाय तं नृणाम् ।
तर्पणोक्तेन विधिना यथावदवचारयेत् ॥३७॥
कनीनके निषेध्यः स्थान्निन्यमुत्तानशाथिनः ।
एके पित्ते च तौ शीतो कोष्णौ वातक्रपाहौ ॥३८॥
इसके आगे पुटपाक प्रसाधन को कहते हैं—चिकने मांस के दो पिण्ड, प्रत्येक एक एक पल लेकर, इनको मधुरोष, लेखन- द्रव्य, तिकद्रव्य—इनकी एक पल मात्रा और द्रव आठ पल लेंका सबको मिलाकर पीस ले । फिर इनका एक एक गोला बनाकर उस पर पत्ते (गम्भारी, कमल, एरण्ड, कमलिनी, केले के) भलीप्रकार लपेटकर, मिट्टी का (कीचड़ का) लेप कर दे । इसे लैर के अङ्गारों पर पकाये । अथवा निर्मली अश्मन्तक, एरण्ड, पाटला, बांसा, बेर, बरगद आदि क्षीरीवृक्ष, इनकी कंकड़ियों में या गोबर की अग्नि में युक्ति से पकाये । जब
स्वित्त हो जाये, तब इसको निकालकर, निचोड़कर रस ले ले । इस रस को तर्पण की विधि से मनुष्यों की आंख में बरते । रस कनीनक (नाक के पास) प्रदेश से डालना चाहिये, रोगी को चिन्त पीठ के भार सदा लेटना चाहिये । रक्त और, पित्त में शीतल वात और कफ के नाश के लिये सुहाता गरम रस गेरे । (पुटपाक की मिट्टी बाहर से लाल बन जाये तब निकाले) ॥
अत्युष्णतीक्ष्णौ सततं दाहपाककरी स्मृतौ । आप्लुतौ शीतलौ चाश्रुस्तम्भरुधर्षकारकौ ॥३९॥ अतिमात्रो कषायत्वसङ्कोचस्फुरणावहौ । हीनप्रमाणी दोषाणामुत्कलेशजन्तौ भुञ्जम् ॥४०॥ अतिउष्ण और अतितीक्ष्ण तर्पण एवं पुटपाक—निरन्तर दाह और पाक करते हैं । थोड़ा घीवाले, या शीतल तर्पण एवं पुटपाक-आंसूओं को रोकना, वेदना तर्पण करते हैं । अधिक मात्रा में बरतने से आँख कसई जाती है, संकुचित हो जाती है, स्फुरण (षड्कन होती है) प्रमाण में कम रहने से दोषों की वृद्धि अधिक मात्रा में करते हैं । (ये तर्पण और पुटपाक दोनो के दोष हैं) ॥३९,४०॥
युक्तौ कृतौ दाहशोकरुधर्षस्त्रावनाशनौ । कण्डुपदेहदुषीकारत्कारजिविनाशनौ ॥४१॥ तस्मात् परिहरन् दोषान् विदध्यान्ती मुखावहौ । ठीक मात्रा में तर्पण एवं पुटपाक बरतने से दाह, सज्जन, वेदना, रगड़, खाव नष्ट होता है । कण्डु, नेत्र का मैल, वृषिका (ग्रीष), आंख की लाल रेखायें, नष्ट होती हैं । इसलिये दोषों से बचाते हुए सुखदेनेवाले तर्पण और पुटपाक बरते ॥४१॥
व्यापदश्च यथादोषं नस्यधूमाम्बुजनेज्येत् ॥४२॥ दाह, पाक आदि उपद्रवों की दोषों के अपने अनुसार नस्य, धूम या अंजन से चिकित्सा करे ॥४२॥ आधनतयोश्चाप्यनयोः स्वेद उष्णाम्बुचैलिकः । तथा हितोऽवसाने च धूमः श्लेष्मसमुच्छिन्नो ॥४३॥ तर्पण और पुटपाक के प्रारम्भ और अन्त में गरम पानी में भिगोये वस्त्र से स्वेद देना चाहिये तथा इनके पीछे और कफ के बढ़ा होने पर धूम उत्तम है ॥४३॥
यथादोषोपयुक्तं तु नातिप्रबलमोजसा । रोगमाश्च्योतनं हन्ति सेकस्तु बलवत्तरम् ॥४४॥
दोष के अनुसार उपयुक्त आश्च्योतन थोड़े रोग को अपनी शक्ति से नष्ट कर देता है । सेक बड़े हुए रोग को अपनी शक्ति से नष्ट करता है ।
वक्तव्य—सेक आश्च्योतन, चौथे दिन रोग व्यक्त हो जाने पर बरतने चाहिये, यथा— “प्रागोवाह्यामये कार्यत्रिरां लघु भोजनम् । उपवाससूर्यहं वा स्यान्नक्तं वाऽप्यशानं ज्यहम् ॥ तत्तश्चतुर्थे दिवसे व्याधि संजातलक्षणम् । समीह्याश्च्योतनैः सेकैः यथास्वप्रुपादेयेत् ॥४४॥”