सामग्री पर जाएँ
भारतकोश
सुश्रुत संहिता

सुश्रुत संहिता

Sushruta Samhita

महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished872 पृष्ठ

पृष्ठ 694, कुल 872 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 694

६१८

सुश्रुतसंहिता

[ अ० १८ ]

तौ त्रिधेवोपयुज्येते रोगेषु पुटपाकवत् ।

ये सेक और आश्च्योतन, पुटपाक की भाँति स्नेहन, लेखन, रोपण-इन तीन रूपों में बरते जाते हैं। इनके पेपण-और आलोडन द्रव्य पुटपाक की भाँति हैं। सम्यग्योग हीनयोग मिथ्यायोग-पुटपाक के समान हैं।

लेखने सम चाष्टौ वा बिन्दवः स्नेहिके दश ॥४५॥

आश्च्योतने प्रयोज्यतया द्वादशैव तु रोपणे ।

सेकस्य द्विगुणः काळः पुटपाकात् परो मतः ॥४६॥

लेखन आश्च्योतन में सात-या आठ बूँद, स्नेहिक में दस, रोपण आश्च्योतन में बारह बूँद बरतनी चाहिए।

परिषेक का धारण काळ पुटपाक से दुगुना है, अर्थात्—लेखन में—दो सौ, स्नेहन में चार सौ, रोपण परिषेक में छे सौ गिनने तक है ॥४५,४६॥

अथवा कार्यनिर्वृत्तेरुपयोगो यथाक्रमम् ।

अथवा धीरे धीरे रोग की शान्ति, स्वाभाविक वर्ण का आना, क्रियापाटव, वेदनाशान्ति, जब तक हो, तब तक बरते।

पूर्वापराह्नि मध्याह्ने रुजाकालेषु चोभयोः ॥४७॥

कफज रोग में—लेखन आश्च्योतन पूर्वाह्नि में, वातज में स्नेहन आश्च्योतन, अपराह्नि में, रक्तपित्त में रोपण आश्च्योतन सेक मध्याह्नि में बरते। वेदना समय में सेक, आश्च्योतन, सब समय बरते ॥४७॥

योगयोगान् स्नेहसेके तर्पणोक्तान् प्रचक्षते ।

सेक एवं आश्च्योतन के सम्यग् योग, अयोग आदि के लक्षण तर्पण की भाँति जाने।

रोगाच्छिरसि संभूतान् दत्त्वाऽतिप्रबलान् गुणान् ॥४८॥

करोति शिरसो वस्तिरुक्ता ये मूर्धतेलिकाः ।

शुद्धदेहस्य सायाह्ने यथाव्याध्यशितस्य तु ॥४९॥

ऋज्ज्वासीनस्य वधनीयादृस्ति कोशं ततो दृढम् ।

यथाव्याधिभृत्तस्नेहपूर्णं संयम्य धारयेत् ॥५०॥

तर्पणोक्तं दशगुणं यथादोषं विधानवित् ।

शिर में उत्पन्न अतिप्रबल रोगों को नष्ट करके, शिरोंवस्ति, मूर्धा में तेल लगाने के गुणों को उत्पन्न करती है। इसके लिये वमन विरेचनादि से शरीर का या नस्य आदि से शिर का शोधन करके, सायंकाल में रोग के अनुसार (व्याधि प्रतीषेक) भोजन करके, सीधे बैठे हुए रोगी के शिरपर वस्तिकोश को मजबूती से बाँध देवे। रोग के अनुसार सिद्ध किये स्नेह से इस वस्तिपुटक को भर देवे। रोगी मुख को बन्द किये इसको तर्पण से दस गुने अधिक समय तक या दोष के अनुसार (कफ में छे हजार, पित्त में आठ हजार, वात में दस हजार मात्रा पर्यन्त) धारण करे। बारम्बार में—

“विधितस्तस्य निषण्णस्य पीठे जानुसमे मूर्धौ ।

शुद्धाकस्विन्नदेहस्य दिनान्तो गन्धमाहिषम् ॥

द्वादशांगुलावेस्तीर्णं चर्मपट्टं शिरःसमम् ।

आकर्णवन्धनस्थाने ललाटे वस्त्रवेष्टिते ॥

चैलवैगिकया बद्ध्वा माषकल्केन लेपयेत् ।

ततो यथा व्याधिभृत्तं स्नेहं कोणं निषेचयेत् ॥

ऊर्ध्वं केशसुवो यावद् द्रर्धगुलं धारयेच्छ तम् ।

आवक्रनासिकोत्स्लेदात् दशाऽष्टौषट्चलादिषु ॥

मात्रासहस्राणि अरुजैवैकम्-स्कन्धादिमदयेत् ।

सुकस्नेहस्य परमं सप्ताहं तस्य सेवनम् ॥४८-५०॥

व्यक्तरूपेषु दोषेषु शुद्धकायस्य केवले ॥५१॥

नेत्र एव स्थिते दोषे प्राप्तमञ्जनमाचरेत् ।

लेखनं रोपणं चापि प्रसादनमथापि वा ॥५२॥

दोष के लक्षण स्पष्ट होने पर, स्नेहपान, वमनादि से शुद्ध हुए पुरुष में, किसी अन्य दोष से दोष के मिले न होने पर, दोष के नेत्र में ही स्थित रहने पर, युक्त (जो ठीक हो) अंजन करे। यह अंजन लेखन, रोपण और प्रसादन भेद से तीन प्रकार का है ॥५१,५२॥

तत्र पञ्च रसान् व्यस्तानांचैकरसवर्जितान् ।

पञ्चधा लेखनं युक्त्याद्यथादोषमतन्द्रितः ॥५३॥

मधुर रस को छोड़कर पांच रसवाले द्रव्यों को पांच प्रकार से (वात पित्त, कफ, रक्त, सन्निपात भेद से) दोष के अनुसार, बिना आलस्य के सावधानी से लेखन अंजन बरते। दोष के अनुसार वात में अम्ल लवण, पित्त में तिक्त कषाय, श्लेष्म में कटु, तिक्त कषाय, रक्त में पित्त के समान, सन्निपात में दो या तीन रसों को मिलाकर बरते ॥५३॥

नेत्रवर्त्मसिराकोशलोतःशृङ्गाटकश्रितम् ।

मुखनासाक्षिभिर्दोषमोजसा-स्त्रावयेत्तु तत् ॥५४॥

लेखन अंजन अथनी शक्ति से नेत्र, पलक, नेत्रविरा, नेत्र-कोश, नेत्रलोत या शृङ्गाटक मर्म में आश्रित दोष को नाश, सुख तथा नेत्र से बहाता है ॥५४॥

कषायं तिक्ततं वाऽपि सस्नेहं रोपणं मतम् ।

तस्नेहशैत्यादृण्यं स्याद्दृष्टेष्टे बलवर्धनम् ॥५५॥

कषाय, तिक्त, ईषस्नेहेयुक्त अंजन रोपण कहा है। यह स्निग्ध एवं शीतल होने से वर्ण के लिये हितकारी और दृष्टि का बल बढ़ानेवाला है ॥५५॥

मधुरं स्नेहसंपन्नमञ्जनं तु प्रसादनम् ।

दृष्टिदोषप्रसादार्थं स्नेहनाशं च तद्वितम् ॥५६॥

प्रसादन अंजन—मधुर एवं स्नेह से युक्त होता है। दृष्टि-दोष की निर्मलता के लिये और स्नेहन के लिये उत्तम है ॥५६॥ यथादोषं प्रयोज्यानि तानि रोगविशारदैः ।

अञ्जतानि यथोक्तानि प्राङ्गसायाह्नात्रिषु ॥५७॥

रोगों में कुशल व्यक्ति इनको दोषों के अनुसार, प्रातः सायं या रात्रि में बरते। पूर्वाह्नि में—कफ रोग में लेखन अंजन,