सुश्रुत संहिता
Sushruta Samhita
महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)
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उत्तरतन्त्रम्
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वायाह में—वातज में, रात्रि में पित्तजन्म रोगों में बरते ॥५७॥
गुटिकारसचूर्णाणि त्रिविधान्यञ्जनानि तु ।
यथापूर्वं बलं तेषां श्रेष्ठमाहुर्मनोषिणः ॥५८॥
गुटिका, रसक्रिया और चूर्ण भेद से अञ्जन तीन प्रकार के हैं । इनमें शक्ति की उत्कृष्टता पूर्व क्रम से है, ऐसा बुद्धिमान् कहते हैं । गुटिका सबसे अधिक शक्तिशाली, रसक्रिया मध्यम, चूर्ण हीन ॥५८॥
हरेणुमात्रा वर्तिः स्यात्लेखनस्य प्रमाणतः ।
प्रसादनस्य चाध्यर्घा द्विगुणा रोपणस्य च ॥५९॥
लेखन अञ्जन की वर्ति का प्रमाण—(विषकर लगाने की मात्रा)—मटर के बराबर, प्रसादन अञ्जन की डेढ़ मटर के बराबर, रोपण अञ्जन की दो मटर के बराबर है ॥५९॥
रसाञ्जनस्य मात्रा तु यथावर्तिमिता मता ।
रसक्रिया की मात्रा उनके अपने अनुसार बनाई वर्ति के प्रमाण में होती है । इसमें लेखन रसक्रिया अञ्जन की मात्रा लेखनवर्ति की भाँति, रोपण की रोपण वर्ति की भाँति, प्रसादन की प्रसादनवर्ति की भाँति होती है ।
द्वित्रिचतुःशलाकाश्च चूर्णस्याप्यनुपूर्वशः ॥६०॥
क्रमशः—लेखन चूर्णांजन की दो शलाका, रोपण की तीन, प्रसादनांजन की चार शलाका मात्रा है ॥६०॥
तेषां तुल्यगुणान्येव विदध्याद्वाजनान्यपि ।
सोवणं राजतं ज्ञात्रं ताम् वैद्यर्थकांस्थजम् ॥६१॥
आयसानि च योज्यानि शलाकाश्च यथाक्रमम् ।
इन अञ्जनों के लिये इनके समान गुणवाले पात्र बरते, यथा—मधुरांजन स्वर्ण में, अम्ल चांदी में, लवणअञ्जन सींग के बने, कषाय अञ्जन ताम् या लोहे के, कटुक-वैद्यर्थ (बिल्वौर) के, तिक कांसी के, शीतांजन नलादि में रक्खें । शलाकार्थ भी—इसी क्रम से धातुओं की बनाये ॥६१॥
वक्त्रयोर्मुकुलाकारा कलायपरिमण्डला ॥६२॥
अष्टाङ्गुला तनुमध्ये सुकृता साधुनिमहा ।
ये शलाकार्थ किनारों पर कील के आकार की, मोटाई में मटर के बराबर, आठ अङ्गुल लम्बी बीज में से पतली, अच्छी प्रकार बनी, सुखपूर्वक पकड़ने योग्य होनी चाहिये ॥६२॥
औदुम्बर्यशमजा वाऽपि शारीरी वा द्विता भवेत् ॥६३॥
अथवा ताम् की, बिल्वौर आदि प्रशर की, सींग या अस्थि आदि की भी बनाई जा सकती है । यथा—आयसी रोपण, ताम्रा लेख्ये, हैमी प्रसादने । शेषा अपि यथादोषं मर्याज्या रसकौचिदेः” ॥६३॥
वामेनास्ति विनिर्भुज्य हस्तेन सुसमाहितः ।
शलाकया दक्षिणेन क्षिपेत् कानौनमञ्जनम् ॥६४॥
अपाङ्गच' वा यथायोगं कुर्याच्छचापि गतागतम् ।
वत्सर्पलेपि वा यत्तदङ्गुल्येव प्रयोजयेत् ॥६५॥
वाम हाथ से आँख को टेंका करके (खोलकर), सावधानी से, दक्षिण हाथ में पकड़ी शलाका से अंजन को कनीनिका भाग से अथवा अपांग भाग से या जैसा ठीक समझे वैसे लगाये, इसमें शलाका को आगे पीछे चलाये । जिस अंजन को पलकों पर लगाया जाता है, उसे अङ्गुली से ही लगाये (यथा काजल-रसक्रिया) ॥६४, ६५॥
अस्ति नात्यन्तयोरुज्ज्याद्वाधमाताऽपि वा भिषक् ।
आंख के किनारों (कनीनिका, अपाङ्ग) पर बहुत अधिक अंजन न लगाये, और अंजन लगाते समय आंख को हानि भी न पहुँचाये ।
न चानिर्बान्तदोषेऽक्षिण धावनं संप्रयोजयेत् ॥६६॥
दोषः प्रतिनिवृत्तः सन् हन्याद् दृष्ट्वैव तथा ।
निश्चित रूप में अशु आदि से दोष के न निकल जाने तक आंखों को न धोये । क्योंकि असमय में धोने से वापिस आया दोष दृष्टि बल को नष्ट करता है ॥६६॥
गतदोषमपेताश्च पश्येद्यत् सम्यगम्भसा ॥६७॥
प्रक्षाल्यास्ति यथादोषं कार्यं प्रत्यञ्जनं ततः ।
दोष निकल जाने पर, अशु बन्द हो जाने पर, आंख को पानी से भलीप्रकार धोकर दोष के अनुसार पीछे से प्रत्यंजन बरते ॥६७॥
श्रमोदावतंरुदितमद्यकोधभयज्वरः ॥६८॥
वेगाघातशिरोदोषेश्चातीनां नेष्यतेऽञ्जनम् ।
रागरुक्ततिमिरास्त्रावशूलसंरम्भसंभवात् ॥६९॥
श्रम, उदावतं, रुदन, मद्य, कोध, भय, ज्वर, उपस्थित वेगों का रोकना, शिरोदोष से पीड़ित पुरुषों में अंजन नहीं करना चाहिये । इनमें अंजन करने से सुखी, पीड़ा, तिमिर, स्त्राव, शूल, सूजन उत्पन्न हो जाती है ॥६८, ६९॥
निद्राक्षये क्रियाऽऋक्ति, प्रवाते दृगबलक्षयम् ।
रजोधमहते रागस्त्रावाधीमन्यसंभवम् ॥७०॥
संरम्भशूलो नस्यान्ते, शिरोरुजि शिरोरुजम् ।
शिरःस्नातेऽतिशीते च रवावतुदितेऽपि च ॥७१॥
दोषस्थैर्यादपार्थ स्याद्विशेषोत्कलेशं करोति च ।
अजीर्णऽप्येवसेव स्यात् श्लोतोगार्गवरोधनात् ॥७२॥
दोषवेगोदये दन्तं कुर्यात्चास्तानुपद्रवात् ।
तस्मात् परिहरन् दोषानञ्जनं साधु योजयेत् ॥७३॥
नींद न आने पर लगाया अंजन क्रिया (निमेष-उन्मेष में) हानि करता है । वायु के सामने बैठकर क्रिया अञ्जन दृष्टि बल को नष्ट करता है । रज और धूम से युक्त आंख में अंजन सुखी, स्त्राव अधिमन्य उत्पन्न करता है । नस्य के अन्त में सूजन और शूल, शिरो रोग में शिरो वेदना करता है । शिर समेत