सुश्रुत संहिता
Sushruta Samhita
महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)
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के बदा होने पर दिया अञ्जन-खुखीं, सूजन आदि उपद्रवं करता हे । इसल्यि दोषों को वचाते हुए वेद्य अञ्जन को भी प्रकार करे ||७०-७३॥। , छेखनस्य विशेषेण काठ एष प्रकीवितः। लेखन अञ्जन के च्य ही यह उपयुक्त प्रतिषेध नियम रहै | भ्यापद्श्च जयेदेताः सेकाश्च्योतनरेपनेः ।७४॥ यथास्वं घूमकवखनोस्यश्चापि ससुल्िताः। . अकालङ्कत अज्ञन् से उलन्न रोग आदि हानियों को सेक, आश्च्योतन्, लेप, दोषों के अपने अनुखार धूम कवल, नस्य आदि से शान्त करे ॥७४॥ विशदं ख्घ्वनालरावि क्रियापट सुनिम॑लम् ॥।७५॥ संशान्तोपद्रवं नेत्रं विरिक्तं सम्यशादिशेत्। छेखन अज्ञन के सम्यग् योग से आंख निर्मल, घु, स्नाव रहित, देखने मे वाभा रहित, अति खच्छ, हो जाती दै ओर रोग-उषद्रवों को शान्ति होती है ॥७५॥ ड जिय दारुणदुरवणे' खस्तं रुक्षमतीव च ॥७६॥ - नेतरं विरेकातियोगे स्यन्दते चातिमात्रशः । ठेखन अञ्न के अतियोग से- आंख कुटि, कटिन, बुरे रंग कौ, दी, -अतिरक्ष होती है, अतिशय पानी बहता है ॥ तत्र सतपणं काय विधानं चानिखापहम् ॥७७॥ ; - रख अतियोग मे सेतपंण एवं वातनाशक उपचार करे | , : अक्षि मन्दविरिकतस्यादुद्भ्रतरदोषवत्। ~ शथनस्याज्जनेस्तज्र दितं दोषाषसेचनम् ॥७ ॥ _. -छेलन के दीन योग मे--आंख उत्कट दोप युक्त होती ६। इख अवस्था में धूम, नस्य ओर अञ्जन से दोषों को बहाना सतम् [9 स्नेहवणवलोपेतं प्रसन्न" दोषषर्थितम्। _ ज्यं प्रसादने सम्यगुपयुक्तेऽक्षि निवतम् ॥७६॥ अखादन अञ्जन के सम्थग् योग मे-- आंख स्तेहवणं एवं 9 बठ से युक्त; निमंट, दोषरदित, खव क्रियाओं मे समथं ( धूप, “ आदि को षहने योय) -रोग शान्ति होती ह ॥७६॥ . किच्िद्धीनविकारं स्यात्तपंणाद्धि कृतादति।
१
7 - ॐ क
= त
ध जल हौनविकारयुक्त होती है ॥ ~ = व रक्षं भेषजं शस्यते शरद ॥८०॥ ' ‡ ग कफनाशक, सक्ष, मृदु ओषध उत्तम है । (भृदु-खीत ) ।|८०॥ से त; : स ध
साधारणमपि ज्ञयमेवं रोपणलक्षणम्। ~ ~ = ~ ` भ्रसादनवदाच्ट तस्मिन् युक्तेऽतिभेषजम् ॥2१॥
~ भ्रसादाजन के अतियोग मे- तपण के अधिकःकंसे की |
क क | ॥ 1 ५. ५.५
कि न [१ ऋ । - द ॥ 1 1 नतिः *4
| सुश्रतसंहिता
स्नान किये या अतिशीत अवस्था मेँ या सूं केन उदय होने पर किया अज्ञन दोघ के न बहाने से निरथक एवं दोष इद्धि करनेवाला होता है } खोतो मागं के रुके होने से अजीण मेँ
किया अञ्जन मी निरथक एवं दोष को वदानेवाला है | दोषों
` || खरम) के आठ माग, तप्र; स्वणै, चाँदी, पकं एक ८ ' इसप्रकार से कुशल वैय ये ग्थारह -भाग केकर मृषा मे बन्द । |
करके इनको; खेर सिरदया; या छा्नो की [आगमे गख करके गोबर के रस मे, गोमू मे, दधिं मँ गायके षी कमपु | मे" तेर-मच्य वचामन्जा सरव॑गन्धोदक (लादि गण) मे, वा
रोपण अञ्जन के सम्यग् योग, अतियोग कै | लक्षण [अ | प्रस अज्ञन की माति सखमश्षने चाहिये ॥८१॥ शद स्नेहनं रोपणं वाऽपि हीनयुक्तमपाथेकम् । प्रसादन ओर रोपण अञ्जन दीन मात्रा मे बरतने से निर्. रहते है । (अ कतेग्यं मात्रया तस्मादज्ञनं सिद्धिमिच्छता । द् इसलिये सफठता चाहनेवाला वेय माता से अञ्खन करे || पुटपाकक्रिया्यासु करियास्वेषे (कै) व रुल्पना। सह खशश्चाञ्जनेषु बाजेनोक्तन पूजिताः ॥८३॥ पुटपाक आदि कल्यों म तथा अनुक्त अञ्जनो मे इतौ टेलन रोपण, प्रसादन आदि बीज से इजा सप मँ कल्पना की जा सकती है ॥८३॥ | टष्टेवखविबरद्धयथे' याप्यरोगक्षयाय च । | राजाहीन्यञ्जनाम्याणि निबोधेमान्यतः परम् ॥८५॥ दृष्टिर को बढ़ाने के ल्य, वाप्य रोग को श्चीण करे कै व्यि, राजाओं के खयि योग्य श्रेष्ठ अञ्जनं को यक्षते सुनो । अष्टो भागनञ्जनस्य नीलोलकस्तमलिषः। = ओदुम्बरं शातङ्कम्भं राजतं च समासतः ॥८५॥ एकाद्ञ्चतान् भगस्तु योजयेत् कुशो भिषक् । सृषाक्षिप्ठं तदाध्मातमाधरृतं जातवेदसि ॥2८६॥ खदिरारमन्तकाङ्गारेगोशङृदूभिरथापि वा। =. गवां शष्द्रसे मूत्रे दभ्नि सपिंषि माक्षिके॥७॥ ˆ तेढमदयवसामञ्जसवेगन्धोदकेषु च । - द्राक्षारसेत्रिफलारसेषु सद्िमेषु च ॥८८॥ सारिवादिकषाये' च कषाये चोसखडादिके । निषेचयेत् प्रथक् चेन ध्मातं ध्मातं पुनः पुनः ॥८९॥ ततोऽन्तरीक्षे सप्राहं ष्ठोतबद्ं स्थितं जके। _ विशोष्य चणेयनमुक्तां स्फटिकं विद्म तथा ॥&०॥ कालानुलारिवां चापि युचिरावाप्य योगतः। एतच्चणोशक्लनं रं निहितं भाजने युभे ||€१॥ ध & ४. दन्तस्फटिकवदूयशङ्खशेडासनोद्धवे। ८ ातङ्कम्भेऽथ शाङ्ग वा राजते वा सुसंस्छते। ˆ सहसपाकवत् पूजां छृत्वा राज्ञः प्रयोजयेत् ॥९२॥ तेनान्जिताक्चो चपतिभेवेत् सवेजनप्रियः। `` | अधृष्यः सवभूतानां दृष्टिरोगविवर्जितः ॥६३॥ , `
नील कमक क ` समानः: कान्तिवालेःलोतोऽन्जनं (कालय . |
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