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भारतकोश
सुश्रुत संहिता

सुश्रुत संहिता

Sushruta Samhita

महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished872 पृष्ठ

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पृष्ठ 697

अ० १६ ] ८१

उत्तरतन्त्रम्

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कषाय में उत्प्लादि गण के कषाय में बुझाये। इस प्रकार से बार बार गरम करके इन सब द्रव्यों में बुझाता जाये। फिर इसे एक पोटली में बांधकर वर्षों जल में सात दिन रक्खे। पीछे से इसको सुखाकर चूर्ण करे, इसमें मोती, स्फटिक, विदुम ( मूंगा ), कालानुसारिवा, इनको पवित्र वैद्य अल्प मात्रा में मिलाये। इस उत्तम अंजन को दाँत, मणि, वैद्यूर्य, शंख, पत्थर या विजयसार के अथवा सोने, सौग, चांदी के अच्छे बने पात्र में रक्खे। सहस्रपाक की भाँति शंख एवं नगाड़ों से पूजा करके, राजा के लिये बरते। उस अंजन को आँख में लगाकर राजा सब मनुष्यों का प्रिय बनता है, सब प्राणियों से अतिरक्त एवं दृष्टि रोगों से रहित होता है ॥८५६३॥

कुष्ठ चन्दनमेलाश्च पत्रं मधुकमळजन्म । मेघश्रृङ्गस्य पुष्पाणि वक्रं रत्नानि सप्त च ॥६४॥ उत्पलस्य बृहत्योश्च पद्मस्यापि च केशरम् । नागपुष्पसुगौराणि पिप्पली तुत्थमुत्तमम् ॥६५॥ कुक्कुटाण्डकपालानि दार्वीं पथ्यां सरोचनाम् । मरिचान्यक्षमज्जानं तुल्यां च गृहगोधिकाम् ॥६६॥ कृत्वा सूक्ष्मं ततश्चूर्णं न्यसेदभ्यर्च्य पूर्ववत् । एतद्भद्रोदयं नाम सदैवाहंति भूमिपः ॥६७॥ कृठ, चन्दन, इलायची, तेजपात, मुलेहटी, अज्जन, मेघ-शृंगी के पुष्प, तगर, सातोरत्न ( पद्मराग, मरकत, नील, वैद्यूर्य, सुका, प्रवाल, पुष्पराग ), कमल, कटेरी, बड़ीकटेरी के फूल, कमल केशर, नागकेशर, खस, पिप्पली, तुत्थ, ( खर्पर तुत्थ ), मुर्गी के अण्डे के छिलके, दारूहल्दी, हरड, गौरोचना, मरिच, वेहेडे की गिरी, गृहगोधिका ( छिपकली ) इनको बराबर लेकर सूक्ष्म चूर्ण करे। इसमें छिपकली सब चूर्ण के बराबर ले। पूर्व की भाँति पूजा करके पात्र में रख दे। यह भद्रोदय नामक अज्जन राजा के बरतने के सदा योग्य है। ( डल्हन ने पुष्प-राग के स्थान पर स्वर्ण को रत्न माना है ) ॥६४-६७॥

वक्रं समरिचं चैव मांसीं जैलेयमेव च । तुल्याशानि समानैस्तैः समग्रैश्च मनःशिला ॥६८॥ पत्रस्य भागाश्चत्वारो द्विगुणं सर्वतोऽज्जनम् । तावच्च यष्टीमधुकं पूर्ववत्तदज्जनम् ॥६९॥ तगर, मरिच, जटामांसी, शिलारस—ये प्रत्येक समान, और सब के बराबर मैनसिल, तेजपात एक द्रव्य की अपेक्षा चारगुणा, अज्जन सम्पूर्ण द्रव्यों से दुगुना, मुलेहटी भी सुरमे के बराबर, यह अज्जन पूर्व की भाँति गुणकारी है ॥६८,६९॥ मनःशिला देवकाष्ठं रजन्थौ त्रिफलोषणम् । लाक्षालशुनमक्षिष्टासेन्धवैलाः समाश्रिकाः ॥१००॥ रोधं सावरकं चूर्णमायसं ताम्रमेव च । कालानुसारिवां चैव कुक्कुटाण्डदलानि च ॥१०१॥

तुल्यानि पयसा पिष्टा गुटिकां कारयेद्वृषः । कण्डूतिमिरशुक्लामरुकराज्युपशान्तये ॥१०२॥ मैनसिल, देवदारु, हल्दी, दारूहल्दी, त्रिफला, लाव, लहसुन, मजीत, सेन्धव, इलायची, माशिक ( स्वर्णमाशिकभस्म ), सावरलोष, लोह और ताम्र की भस्म, कालानुसारिवा, मुर्ग के अण्डों के छिलके, ये सब समान भाग लेकर दूध के साथ पीसकर गोळियाँ बनाये। कण्डू, तिमिर, शुक्लाम, लाव रेखा को शान्त करता है। ( माशिक से कोई मधु लेते हैं ) ॥१००-१०२॥ कांस्यापमाजिनमसी मधुकं सेन्धवं तथा । एरण्डमूलं च समं बृहत्यंशद्रयान्वितम् ॥१०३॥ आजेन पयसा पिष्टा ताम्रपात्रं प्रलेपयेत् । सप्तकृत्वस्तु ता वत्थशङ्खायाशुष्का रुजापहाः ॥१०४॥ कांसी को रगड़ने से बनाईं स्थाही, मुलेहटी, सेन्धव, एरण्डमूल, प्रत्येक समान भाग, बड़ी कटेरी के फल और मूल—एक द्रव्य से दुगुने लेकर इनको बकरी के दूध के साथ पीसकर ताम्रपात्र में लेप करे। इस प्रकार सात बार करे। इन वर्तियों को छाया में सुखाये—ये ददनाशक हैं ॥१०३,१०४॥

पथ्यातुत्थकयष्ट्याह्वितुल्यैमरिचषोडशा । पथ्या सर्वविकारेषु वर्तिः शीतान्मुषेपिता ॥१०५॥ हरड, तुत्थ, मुलेहटी, प्रत्येक समान भाग, मरिच सोलह भाग को शीतल जल से पीसकर वर्ति बनाये। यह षोडशावर्ति नेत्र के सब रोगों में हितकारी है ॥१०५॥ रसक्रियाविधानेन यथोक्तविधिकोविदः । पिण्डाज्जनानि कुर्वीत यथायोगमतन्द्रितः ॥१०६॥ यथोक्तविधि को जाननेवाले वैद्य—रस क्रिया को विधि से—पिण्डाज्जनों ( शिलापुष्ट पर पिसकर किये जानेवाले अज्जनों ) को योग के अनुसार सावधानी पूर्वक ( जिससे आँखों में क्षत न हो ) बनाये ॥१०६॥

इति मुश्रुतसंहितायामुत्तरतन्त्रान्तर्गते शालाक्यतन्त्रे क्रियाकल्पो नामाष्टादशोऽध्यायः ॥१२॥

एकोनविंशतितमोऽध्यायः

अथातो नयनाभिघातप्रतिषेधं व्याख्यास्यामः ॥११॥ यथोवाच भगवान् धन्वन्तरिः ॥१२॥ अब इसके आगे नयनाभिघातप्रतिषेध का व्याख्यान करेंगे। जैसा कि भगवान् धन्वन्तरि ने कहा था ॥११,१२॥ अभ्याहृते तु नयने बहुधा नराणां संरम्भरागमुमुलासु रजसु धीमान् । नस्यास्यलेपपरिषेचनतर्पणाद्य- मुक्तं पुनः क्षतजपित्तजशलपथ्यम् ॥१३॥ तीक्ष्णजन्, धूप, धूल, धुंवे आदि से मनुष्यों की आँखों पर अनेक रूप में आघात हो जाता है, इससे सूजन, सुखों,