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भारतकोश
सुश्रुत संहिता

सुश्रुत संहिता

Sushruta Samhita

महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished872 पृष्ठ

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सुश्रुतसंहिता

[ अ० १६ ]

और तीव्र वेदना होती है। इसके लिये नस्य, मुखलेप, परि-वेचन, तर्पण आदि एवं रक्ताभिष्यन्द, पित्ताभिष्यन्द की चिकित्सा करे ॥

वस्तु-व्य-तीक्ष्णजनाति परिकिल्लष्टेषु नेत्रेषु वातातपधूमरज-व्यापारकोटमक्षिकामशकस्यार्थादिभिरभिहतेषु दिवाकराग्नि-चन्द्रग्रहनक्षत्र-क्रमण-कर्म-विविधरूप-प्रक्षेणाश्रयभिहतेषु दुर्बलेषु नेत्रेषु रागदाहतोदशोफपाकषर्पादि वेदनासु”—आदि बहुत प्रकार से आघात होता है ॥३॥

दृष्टिप्रसादजननं विधिमाशु कुर्यात् स्निग्धैर्हिमैश्च मधुरैश्च तथा प्रयोगैः ।

इसमें दृष्टि को प्रसन्न करनेवाली विधि शीघ्र करते, स्निग्ध, हिम ( शीतल ), मधुर वस्तुओं का प्रयोग करे !

स्वेदाग्निधूमभयशोकरुजाभिघातै- रभ्याहतामपि तथैव भिषक् चिकित्सेत् ॥४॥

स्वेद, अग्नि, धुंवे, भय, शोक, पीड़ा, आघात आदि से आँख दुखने पर भी इसी प्रकार चिकित्सा करे ॥४॥

सद्याहते नयन एष विधिसतदूढ्यं स्यन्देरितो भवति दोषमवेद्य कार्यः ।

यह उपचार तुरन्त सात दिन से पहले पहले करना चाहिये। इसके पीछे दोष को देखकर अभिष्यन्द की चिकित्सा करे।

अभ्याहन्तं नयनमौषधथास्वाद्यप- संस्वेदितं भवति तन्निरुक्तं क्षणेन ॥५॥

चोट लगी आँखपर ( चोम होने पर ) मुख की फूंक की गरम वाष्प से स्वेदन देने पर आँख तुरन्त वेदना रहित हो जाती है ॥५॥

साधयं क्षतं पटलमेकमुभे तु कृच्छ्रं श्रीणि क्षतानि पटलानि विबर्जयेत् ।

स्यात् पिच्छितं च नयनं क्षति चात्रसन्नं ।

क्षस्तं न्युतं च हतहक् च भवेत् न्यायम् ॥६॥

विस्तीर्णदृष्टि तुरुरागमसत्प्रदर्शि,

साधयं यथास्थितमनाविलदर्शनं च ।

प्रथम पटल में हुआ क्षत साधय है, दो पटलों का क्षत कष्टसाध्य है, तीन पटलों का क्षत असाध्य है। पिच्छित आँख या दबी हुई आँख, शिथिल, लटकती हुई, दृष्टि नष्ट हो जानेपर भी आँख साध्य है। जिसमें दृष्टि फैल गई हो, सूक्ष्म-पतली हो गई हो, सुखी आ गई हो, असत् ( न हुई वस्तु को देखनेवाली-अमित दृष्टि ) दृष्टि साध्य है। ठीक प्रकार से स्थित, साफ स्पष्ट देखनेवाली दृष्टि साध्य है ॥६॥

प्राणोपरोधवमनजुतकण्ठरोधै-

रुग्न्स्यमाशु नयनं यदतिप्रविष्टम् ॥७॥

यदि नेत्र अन्दर बहुत दब गई हो तो—गला ढबाने से, वमन से, छींक से, श्वास को रोककर—आँख को बाहर लाना चाहिये ॥७॥

नेत्रे बिलम्बिनि विधिर्विहितः पुरस्ता-

दुच्छिन्नं शिरसि वार्यवसेचनं च ।

नेत्र के बाहर निकल आने की चिकित्सा पहले ( जिसने नेत्रकर्मण्यमभिन्नं लभ्यते तु यत् ) कह दी है। इसमें नाक से वायु को अन्तः खींचे, धिर पर ठंडा पानी डाले।

षट्समृतिर्नयनजा य इमे प्रदिष्टा

रोगा भवन्त्यमहतां महतां च तेभ्यः ॥८॥ स्तन्यप्रकोपकफमार्सुपित्तरक्तै-

बौलाक्षिवत्संभव एव कुक्कुणकोऽन्या ।

आँख के जो ये छिहत्तर रोग कहे हैं, ये रोग बालकों की तथा बड़ों की होते हैं। दूध के प्रकोप से, कफ, वायु, पित्त, रक्त के कारण बालकों की पलकों में कुक्कुणक नाम का एक दूसरा रोग होता है ॥८॥

मृदनाति नेत्रमतिकण्डुमथाक्षिकूटं

नासाल्ललाटमपि तेन शिशुः स नित्यम् ॥९॥

सूर्यप्रभां न सहते क्षवति प्रबद्धं

तस्याहरेदुधिरमाशु विनिष्ठिलेच्छ्व ।

१ काश्यप संहिता में—

“यदा माता कुमारस्य मधुराणि निषेवते ।

मत्स्यं मांसं पयः शार्कं नवनीतं तथा दधि ॥

सुरासवं पिष्टमयं तिलपिष्टारुलाजिकम् ।

अभिष्यन्दीनि सर्वाणि काले काले निषेवते ॥

भुक्त्वा भुक्त्वा दिवा श्वेतं विसन्ना च बिबुध्यते ।

तस्य दोषाः प्रकुपिता दूरं गत्वा च तिष्ठते ॥

दोषेणावृत्तमार्गात्मास्ततःस्तन्यं च दूष्यते ।

प्रदुष्टदोषसन्नं च यदा पिवति दारकः ॥

लवणाम्लनिषेवित्वान्माता पुत्री रसादिह ।

आहारदोषात्तस्यास्तु वातस्थानान्नभोजिनः ॥

अभोक्ष्यामन्नं क्षवेत न च क्षीवति दुर्भनाः ।

नासिकां परिमृदनाति न च वाच्छ्रुति दुःखितः ॥

ललाटमक्षिकूटं च नासां च परिमर्दति ।

नेत्रं कण्डूयतेऽभोक्ष्यं पाणिना चाप्यतोष तु ॥

सप्रकाशं न सहते अश्रुवास्य प्रवर्तते ।

वत्सनि स्वययुश्चास्य जानोयात् कुक्कुणकम् ।

तस्य चिकित्सतं श्रेष्ठं ग्याख्यास्यामि यथा तथा ।

धार्त्री तु वामयेद्युक्तं तस्य चैव विपाच्यते ।

तस्यावान्तविरिक्ताया निदुःखं च स्तनावुभो ।

भोजनानि च सर्वाणि यथायुक्तं प्रदापयेत् ॥”