सुश्रुत संहिता
Sushruta Samhita
महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)
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उत्तरतन्त्रम्
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श्रीद्राग्युतैश्च कटुभिः प्रतिसारयेत्
मातुः शिशोरभिहितं च विधिं विदध्यात् ॥१०॥
इस रोग में बच्चा आँख को मलता है, बहुत खाज होती है। अधिकट्ट, नासिका, ललाट को बच्चा सदा मलता रहता है, प्रकाश को सहन नहीं कर सकता, आँख से निरन्तर पानी बहता है। इसमें जाँक से रक्त निकाले या हारसिंगार आदि के पत्ते से लेखन करे। त्रिकटु को मधु में मिलाकर प्रतिसारण करे। माता और बच्चे के लिये कहीं हुई चिकित्सा करे।
वि० मन्तव्य—कुक्कुणक नामक रोग का प्रभाव वर्त्म पर अधिक होता है, अतः वर्त्म को उलटकर उसके स्तर पर लेखन एवं प्रतिसारण किया जाता है। लेखन करने से ही वधिर निकल जाता है। इस रोग में वर्त्म सूज जाते हैं। इसे "चीन्धी" कहते हैं। देखा गया है, कि ग्रामीण बृद्धार्प कुत्ता के शरीर पर प्रायः बैठनेवाली मक्षिका (यह मक्षिका दूसरी मक्षिकाओं की अपेक्षा बड़ी होती है, उसका वर्ण हरासा होता है) को पकड़कर वर्त्म के भीतरी स्तर पर छुआती हैं, और मक्षिका अपने पाँवों को स्वभावतः हिलाती है, पाँव लगाने से क्षत होता है फलतः रक्त निकल जाता है और रोग शान्त हो जाता है। छिन्का सहित चाकस् का चूर्ण डालने से भी लाभ होता है। इस रोग को "रोहा" भी कहते हैं। हमारा विचार है, कि बच्चों में जो "रोहे" होते हैं, वही अथवा उसी की जाति का यह रोग भी है ॥६,१०॥
तं वामयेत्तु मधुसैन्धवसंप्रयुक्तैः
पीतं पयः खलु फलेः खरमक्षरीणाम् ॥११॥
स्यात्पिपलोलवणमाक्षिकसंयुतैर्वा
दूध के साथ मधु, सैन्धव, चिरचिते की बाल के चावल पिलाकर बच्चे को वमन कराये। अथवा पिपली लवण, मधु-दूध में मिलाकर वमन कराये ॥११॥
नेनं वमन्तमपि वामयितुं यतते ।
बच्चेको स्वयं वमन हो रहा हो तो इसको कराने की दवाई न देवे।
दत्त्वा वचामशतदुग्धमुजे प्रयोज्य-
मूर्ध्वं ततः फल्युतं वमनं विधिज्ञः ॥१२॥
दूध और अन्न खानेवाले बच्चे को बच्चा से वमन कराये। अन्नखानेवाले बच्चे को मैनफल से वमन कराये ॥१२॥
जम्बूवाग्प्रधाज्यणुदलैः परिधावतार्थ-
कायं कषायमवसेचनमेव चापि ।
पलकों को धोने के लिये—जामुन, आम, आवला, अरम-नक इनका कषाय बरतना चाहिये। इसी कषाय से परिषेक करे।
आरुच्योतने च हितमत्र घृतं गुडूची-
सिद्धं तथाऽऽहुरपि च त्रिफलाविषकम् ॥१३॥
गिलोय से सिद्ध किया तथा त्रिफला से सिद्ध किया घृत इसमें आरुच्योतन के लिये उत्तम है ॥१३॥
नेपालजामरिचजङ्गुरसाञ्जनानि
सिन्धुप्रसृतगुडमाक्षिकसंयुतानि ।
स्याद्वज्रजं मधुरसामधुकाप्रकैर्वा
मैनसिल, मरिच, शंख, रसौत, सैन्धव, गुड और मधु से मिलाकर बनाया अञ्जन अथवा मूर्वा, मुलेहठी और आम इनका अञ्जन उत्तम है।
कृष्णायसं घृतपयोमधु वाऽपि दग्धम् ॥१४॥
कृष्णलोहचूर्ण, घी, दूध, और मधु इनको अन्तर्धूम विधि से जलाकर अंजन करे। यथा—“लोहचूर्ण च सर्पिश्च मधुक्षौरं च दाहयेत्। एतच्चूर्णाञ्जनं पिष्टं कुमारपानां कुक्कुणके ॥१४॥
व्योषं पलाण्डु मधुकं लवणोत्तमं च ।
लाक्षां च गैरिकयुतां कुटिकाञ्जनं वा ।
निम्बबल्लदं मधुकदाविं सताम्रलोघ-
मिच्छन्ति चात्रभिषजोऽज्रजमंशतुल्यम् ॥१५॥
त्रिकटु, प्याज, मुलेहठी, सैन्धव, लाख, गेरु इनसे अथवा नीम के पत्ते, मुलेहठी, दारुहल्दी, ताम्रभस्म, लोघ, प्रत्येक समान भाग—इनसे, गुटिका अंजन बनाकर कुक्कुणक में बरते ॥
स्रोतोजगङ्गदधिसैन्धवमध पक्षं
शुक्रं शिशोर्नुदति भावितमञ्जनं ।
स्यन्दे कफादभिहितं क्रममाचरेच्च
बालस्य रोगकुशलोऽक्षिगदं जिघ्रांसुः ॥१६॥
गाय की दही से शंख और सैन्धव को पीसकर—स्रोतांजन पर साड़े सात दिन बार-बार लेप करे। फिर इस स्रोतांजन को पीसकर वर्त्ति बनाये। यह वर्त्ति अञ्जन करने पर बच्चों के शुक्र रोग को नष्ट करती है। कफाभिष्यन्द में कहीं चिकित्सा को, बालकों की आँख के रोगों को नष्ट करने की इच्छावाला वैसे बरते। (क्योंकि बालकों में कफ की अधिकता रहती है) ॥१६॥
समुद्र इव गम्भीरं नैव शक्यं चिकित्सितम् ।
वक्तुं निरवशेषेण श्लोकानामयुतैरपि ॥१७॥
सहस्रैरपि वा प्रोक्तमर्थमल्पमतितैरः ।
तर्कप्रन्थाथैरहितो नैव गुह्यात्यपण्डितः ॥१८॥
चिकित्सा शास्त्र समुद्र की भाँति गम्भीर है, हजारों श्लोकों से भी सम्पूर्ण रूप में इसको नहीं कह सकते। थोड़ी बुद्धिवाला मनुष्य जो तर्कसे ग्रन्थ के अर्थ को नहीं समझता, वह हजारों श्लोकों से कहे हुए विषय को भी नहीं समझ सकता ॥१७,१८॥
तद्विदं बहुगूढार्थं चिकित्साबोजसीरितम् ।
कुशलेनाभिपन्नं तद्विद्वांऽभिप्रोहति ॥१९॥
तस्मान्मतिमता नित्यं नानाशाखायैर्दर्शिता ।
सर्वभूतमागाधर्थं शास्त्रमागमबुद्धिना ॥२०॥