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भारतकोश
सुश्रुत संहिता

सुश्रुत संहिता

Sushruta Samhita

महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished872 पृष्ठ

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सुश्रुतसंहिता

[ अ० १० ]

इसलिये अतिशय गम्भीर अर्थवाला चिकित्सा बीज यहाँ कह दिया है, यह बीज कुशल वैद्य में जाना जाकर अनेक रूप में अंकुरित होता है। इसलिये बुद्धिमान् को नित्य प्रति नाना-शास्त्रों को देखते हुए, शास्त्र ज्ञान से वैद्य को सम्पूर्ण एवं गम्भीर अर्थवाले शास्त्र को सदा बुद्धि से समझना चाहिये ॥१६,२०॥

“सूत्रं बुद्धिमतामल्पमप्यनल्पज्ञानायतनं भवति, तस्माद् बुद्धिमतामूहापोहवितर्काः ॥”

चरक वि० अ० ८।१५२।

इति सुश्रुतसंहितायामुत्तरतन्त्रान्तर्गते शाळाक्यतन्त्रे नयना-भिषातचिकित्सितं नामकोनविशोऽध्यायः ॥१६॥

विंशतितमोऽध्यायः

अथातः कर्णगतरोगविज्ञानीयमध्यायं व्याख्यास्यामः ॥१॥ यथोवाच भगवान् धन्वन्तरिः ॥२॥

अव इत्के आगे कर्णगतरोगविज्ञानीय अध्याय का व्याख्यान करेंगे—जैसा कि भगवान् धन्वन्तरि ने कहा था।

वि० मन्तव्य—इस अध्याय में कर्णविवर में होनेवाले रोगों का वर्णन है और कर्णपाली-कर्णशकुली के रोगों का वर्णन सू० अ० १६ तथा चि० अ० २५ में किया जा चुका है ॥

कर्णशूलं प्रणादश्च बाधिर्यं द्वेड एव च।

कर्णस्त्रावः कर्णकण्ठः कर्णवर्चस्त्तथैव च ॥३॥

कृमिकर्णप्रतीनाहो विद्रविद्रिष्विधस्तथा।

कर्णपाकः पूतिकर्णस्तथैवाग्नश्चतुर्विधम् ॥४॥

कर्णर्बुदं सप्तविधं शोफश्चापि चतुर्विधः।

एते कर्णगता रोगा अष्टाविंशतिरीरिताः ॥५॥

कर्णशूल, कर्णप्रणाद, बाधिर्य, कर्णद्वेड, कर्णस्त्राव, कर्णकण्ठ, कर्णवर्च, कृमिकर्ण, प्रतिनाह, दो प्रकार की विद्रवि (दोषविद्रवि, क्षतविद्रवि), कर्णपाक, पूतिकर्ण, चार प्रकार के अर्श (वात, पित्त, कफ और सन्निपातज), सातप्रकार का कर्णर्बुद (वात, पित्त, कफ, रक्त, मांस, मेद, सन्निपातज), चार प्रकार का शोफ (वात, पित्त, कफ, सन्निपातज) ये अष्टाईस कर्णगत रोग हैं ॥३-५॥

समीरणः श्रोत्रगतोऽन्यथाचरः

समन्ततः शूलमतीव कर्णयोः।

करोति दोषैश्च यथास्वमावृतः

स कर्णशूलः कथितो दुराचरः ॥६॥

श्रोत्र गत वायु, कफ, पित्त दोषों से—अपने आप आवृत होकर, विमार्ग में गति करता हुआ कानों में अतितीव्रशूल चारों ओर करता है। यह शूल कष्ट साध्य है ॥६॥

वक्तव्य—मून्छां दाहो ज्वरः कासो हृत्तासो वमयुत्पत्ता। उपद्रवाः कर्णशूले भवन्त्येते मरिष्यतः ॥६॥

यदा तु नाडीषु विमार्गभागतः

स एव शब्दाभिबहासु तिष्ठति।

श्रुणोति शब्दान् विविधास्तदा नरः

प्रणादमेन कथयन्ति चामयम् ॥७॥

जब यह वायु विमार्ग में आकर शब्द को ले जानेवाली नाड़ियों में पहुँचता है, तब मनुष्य नानाप्रकार के शब्दों को सुनता है, इस रोग को कर्णप्रणाद कहते हैं। यथा—

“शिरोगतो यदा वायुः श्रोत्रयोः प्रतिपद्यते।

तदा तु विविधान् शब्दान् समीरयति कर्णयोः ॥

भुंगारकौक्ष्नादं वा मण्डककाकयोस्तथा।

तन्त्रीं मुदं गशब्दं वा समतुर्यस्वनं तथा ॥

गीताध्ययनवंशानां निर्धोर्ध्वं द्ध्वेडनं तथा।

अपामिव पतन्तीनां शकटस्थैव गच्छतः ॥

क्षसतामिव सर्पाणां स्रष्टाः श्रूयते स्वनः” ॥७॥

स एव शब्दानुबहा यदा सिराः

कफानुयातो व्यनुसृत्य तिष्ठति।

तदा नरस्याप्रतिकारसेविनो

भवेत्तु बाधिर्यमसंशयं खलु ॥८॥

यही वायु कफ से मिलकर जब शब्द को ले जानेवाली सिराओं में फैलकर रह जाता है, तब उस समय चिकित्सा न करने से पुरुष को निःसन्देह बाधिर्य उत्पन्न हो जाता है।

वि० मन्तव्य—बाधिर्य का पूर्वरूप ऊन्धैः श्रुति—ऊँचे सुनना नामक विकार होता है ॥८॥

श्रमात् क्षयद्रव्यकृपायभोजनात्

समीरणः शब्दपथे प्रतिष्ठितः।

विरिक्तशोर्णस्य च शीतसेविनः

करोति हि द्ध्वेडमतीव कर्णयोः ॥९॥

श्रम से, क्षय से (धातुक्षय से), रक्तकृपाय भोजन से, कृपित वायु शब्दमार्ग में रुक कर, या शिरोंविरेचन लिये शीतसेवन करनेवाले पुरुष के कानों में अतिशय द्ध्वेड (अत्युक्त शब्द) करता है।

यथा—“माकृतः कफवाताभ्यां संसृष्टः शोणितेन च। कर्णद्वेडं संजनयेत् द्ध्वेडने वेणुषोषवत् ॥९॥

शिरोंभिषातादथवा निमज्जतो

जले प्रपाकादथवाऽपि विद्रवेः।

श्ववेत्तु पूर्यं श्रवणोऽनिष्ठावृतः

स कर्णसंस्त्राव इति प्रकीर्तितः ॥१०॥

शिर पर चोट लगने से या पानी में गोता मारने पर कान में पानी भर जाने अथवा विद्रवि के पक जाने से वायु से आवृत कान से पूर्य बहती है, इसे कर्ण संस्त्राव कहते हैं ॥१०॥