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भारतकोश
सुश्रुत संहिता

सुश्रुत संहिता

Sushruta Samhita

महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished872 पृष्ठ

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अ० ११०]

उत्तरतन्त्रम्

६४५

कफेन कण्डः प्रचितेन कर्णयो-

भूशं भवेत् खोतसि कर्णसंज्ञिते ।

कर्ण खोतसों में कफ के बहुत संचित होने से कानों में बहुत कण्डू होती है ।

विशेषिते श्लेष्माणि पित्ततेजस

नृणां भवेत् खोतसि कर्णगूथकः ॥११॥

पित्त की उष्णमा से खोतों में कफ के सूख जाने पर मनुष्यों में कर्ण गूथ (कर्णवर्चस्) बनता है ॥११॥

स कर्णवित्को द्रवतां यदा गतो

विलायितो घ्राणमुखं प्रपद्यते ।

तदा स कर्णप्रतिनाहसंज्ञितो

भवेद्विकारः शिरसोऽभितापनः ॥१२॥

जब यह कर्णमूल (कर्णगूथ) पिघलकर द्रवरूप होकर नासा एवं मुख में आता है, तब इसको कर्ण प्रतिनाह नाम से कहते हैं, यह रोग सम्पूर्ण शिर को पीड़ित करता है ॥१२॥

यदा तु मूच्छन्त्यथवाऽपि जन्तवः

सृजन्त्यपत्यान्यथवाऽपि मक्षिकाः ।

तद्वज्रन्तवाच्छ्वणो निरुच्यते

भिषगिभिराद्यैः क्रमिकर्णको गदः ॥१३॥

जब क्रमि कान में गिर पड़ते हैं, अथवा मक्खियाँ कान में आपड़े, बच्चे दे दें तब इन क्रमियों के होने से पुरातन वैद्य क्रमिकर्ण नाम से कहते हैं ॥१३॥

वि० मन्तव्य—जैसे अन्य व्रणों में कर्ण २ क्रमि उत्पन्न हो जाते हैं अथवा किरौनी मक्खी बैठने के कारण क्रमि उत्पन्न हो जाते हैं वैसे ही जब कर्ण विवर में क्रमि उत्पन्न होते हैं तब उस दशा का नाम “क्रमिकर्ण” है । श्री डब्लूनाचार्य की व्याख्या के अनुसार एवं श्री भावमिश्र के कथनानुसार यह रोग तीन प्रकार का माना जा सकता है—१-जिसमें क्रमिपतिका एवं शतपदी (गोजर तथा कानसलाई नामक जन्तु) आदि के घुस जाने से, इसका उल्लेख भी श्री भावमिश्र के शब्दों में—

पतङ्गाः शतपद्यश्च कर्णखोतः प्रविश्य हि ।

भरति व्याकुलवर्णं हि भूशं कुर्वन्ति वेदनाम् ।

कर्णो निस्तुद्यते यस्य तथा च फर्फरायते ।

कोटे चरति रुक्तीव निष्पन्दे मन्दवेदना । कर्णरोगाधिकार । २—मांस कोथजाः क्रुमयः (डरलन) = मांसरक्त के सड़ने से उत्पन्न क्रमि ।—३ किरौनी मक्खी के अण्डा गिराने से उत्पन्न क्रमि ॥१३॥

॥ विदेह ने कहा है—

“श्लेष्मापित्तजलोन्मिश्रं कोथं शोणितमांसगे ।

मूच्छन्ति जन्तवस्तत्र कृष्णास्ताम्राः सितारूपाः ॥

भक्षयन्तीव ते कर्णं कुर्वन्तो विविधा रुजः ।

क्रमिकर्णं तु तं विद्यात् सभिपातप्रकोपजम् ॥

क्षताभिघातप्रभवस्तु विदधि-

भवेत्तथा दोषकृतोऽपरः पुनः ।

सरत्कपीतारुणमस्त्रमाद्यवेत

प्रतोदधुमायनदाहचोषवान् ॥१४॥

चोट लगने से एक प्रकार की विदधि उत्पन्न होती है, दोषजन्य दूसरी विदधि है । इसमें ठाल, पीला, अरुणवर्ण का रक्त बहता है, चुभने की सी वेदना, धूमसा निकलता प्रतीत होता है, दाह, चोष (जलन) होती है ।

वि० मन्तव्य—कर्णविदधि—कान को फुन्सी का नाम है ॥१४॥

भवेत् प्रपाकः खलु पित्तकोपतो

विकोथविकलेदकरश्च कर्णयोः ।

पित्त के प्रकोप से कानों में-सड़ना, क्लेद युक्त पाक हो जाता है, इसे कर्ण पाक कहते हैं ।

स्थिते कफे खोतसि पित्ततेजसा

विलाग्यमाने भुजसंप्रतापवान् ॥१५॥

अवेदनो वाऽप्यथवा सवेदनो

घनं स्रवेत् पूतिं च पूतिकर्णकः ।

खोतों में कफ के रक्त जाने पर पित्त की उष्णमा से इसके पिघल जाने के कारण अतिशय जलनेवाला, वेदनारहित या वेदनायुक्त, घड एवं दुर्गन्धवाला खाव होता है, इसे पूतिकर्णक कहते हैं ॥१५॥

प्रदिष्टलिङ्गान्यरशांसि तत्तव-

स्तथैव शोफाबुद्धलिङ्गमितिम् ।

मया पुरस्तात् प्रसमीद्य योजये-

दिहैव तावत् प्रयतो भिषगवरः ॥१६॥

अर्श के, शोफ के तथा अबुद्ध के कहे हुए लक्षणों को परमार्थ रूप से देखकर, बुद्धिमान् वैद्य उनको यहां पर लागू कर लेवे ।

वि० मन्तव्य—अर्थात् कर्णविवर में अर्श—मांसाकुर मत्से, शोफ-व्रणशोथ-शोथ तथा अबुद्ध भी होते हैं । इनके लक्षण अर्श आदि के समान ही होते हैं ॥१६॥

इति सुश्रुतसंहितायामुत्तरतन्त्रान्तर्गते शालाक्यतन्त्रे कर्णगतरोग-विज्ञानीयो नाम विशतितमोऽध्यायः ॥१०॥

एकविंशतितमोऽध्यायः

अथातः कर्णगतरोगप्रतिषेधं व्याख्यास्यामः ॥१॥

यथोवाच भगवान् धन्वन्तरिः ॥२॥

अब इसके आगे कर्णगतरोगप्रतिषेध का व्याख्यान करेंगे—जैसा कि भगवान् धन्वन्तरि ने कहा था ॥१,२॥

सामान्यं कर्णरोगेषु घृतपानं रसायनम् ।

अन्यायामोऽशिरःस्तनं ब्रह्मचर्यमकथ्यन्म् ॥३॥