सुश्रुत संहिता
Sushruta Samhita
महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)
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पाठ करके, कई रोग मांस रस से मोजन अथ करते हँ) ।॥२॥
कणश प्रणादे च बाधियच्वेडयोरपि ।
चतुणौसपि रोगाणां सामान्यं भेषजं विदुः ॥४॥ कणश, कणंप्रखाद, वबाधिय ओर कणद्वेड इन
रोगों मे सामान्य ओषध है ।४॥। |
स्निग्धं बातहरे; स्वेदेन स्नेह विरेचितम् ।
नाडीस्वेदेरुपचरे वििण्डस्वेदेस्तथेव च ।\५॥
रोगी को स्नेह पान ओर अभ्यंग से स्निग्ध करके व।तष््र
द्रव्यो से स्वेद देकर एेरण्ड तैल, बादाम, रोगन आदि स्नेद्रव्यों
से विरेचन देवे । नाडीस्वेद ओर पिण्डस्वेद बरते ॥५।॥।
बित्वेरण्डाकवषाभूद धिव्थोन्मत्तजियुभिः
वस्तगन्धाश्गन्धाभ्यां तकोरीयववेणुभिः ||६॥
आरनाख्श्तेरे भिनाडास्वेदः प्रयोजितः ।
कृफवातसम॒त्थानं कणंगं निरस्यति ॥७॥ विल्व, एरण्ड, आक, पुननवा, केथ, धत्तरा, सुहांजना बस्तगन्धा, अश्वगन्धा, अरणी, वांखके जौ, इनको काजी में पकाकर दिया गया नाड़ीस्वेद-कफ-वात से उत्पन्न कणश को नष्ट करता हे ॥६.७) मीनङक्कुटखावानां मांसजेः पयसाऽपि वा । पिण्डः स्वेदं च कुर्वीत कणेशूढनिवारणम् || मछरी, सुगा, टेर इनके मांस सेया दूष के मावे (खोया) से पिण्डस्वेदन करे, यह कणशूल को नष्ट करता दै ॥॥ अश्वत्थपन्रखर्छं वा पिधाय बहुपत्रकम् । तदङ्गारेः सुसपूण निदध्याच्छुवणोपरि ॥€॥ यन्तेङं च्यवते तस्मात् खस्छादङ्गारतापितात् । = तेत् प्रप्र ्रवणखोतः सदयो गृह्णाति वेदनाम् ॥१०॥ पीपठ के बहुत से कोमल पत्ते छेकर उनसे एक दोहना
(विवाह आदि मे जिखमं द्रव वस्तु परोसी जाती है). बनाकर उसमें तेर भर दे | इसको ऊपर से भी पीपल के पत्तो से दप दे (एक प्रकार कौ मूषा बन जाये) या कोई ओर वस्तु रख „ देवे । इन अगारं की गर्मी से जो तेल चूता है वह जब कान ह के खोर्तो मे जाता दै, तो वेदना को तुरन्त बन्द कर देता है । < ` वक्तव्य--तदङ्गारेः संपृणम्" के स्थान पर तैलाक्तमस्तु
मस्तु मे मिगोकर दोहना बनाये । इसमे अङ्गारे रख देवे | फिर मूषा आदि कौ जरूरत न्दी । कोई टीकाकार इस दोहने मे छोटा सा छेद रखने को कहते हँ । इस छेद को कर्णञ्लोत पर रख देवे । इसमे तेर के . स्थान पर षी भरने को भी कदा
हे ॥६,१०॥ |
सुश्र॒तसंहित।
सामान्यतः सब कणं रोगों म घृतपान, रसायन सेवन
व्यायाम न करना, शिरखमेत स्नान न करना, ब्रह्मचयं ओर न
बोलना (कम बोलना) पथ्य हे । (रसायन के स्थान प्र रसाशन `
के डालने मे उत्तम हे । अथवा-आद्रक का रख; मधु; ॑
ते, इनको थोड़ा गरम करके कान मे डालने से वेदना.
. वेशावङखनायुक्त मूत्रे -चाजाविके भिष ।
सम्पृणम् पाठ खक है । इसमे पीपर के गीते पत्तों को षै |`
| खश | |
क्षोमगुग्गुल्वगुरुमि सघ्युतधू पयेच्च तम्। | भक्तोपरि दितं सपिवस्तिकमे च पूजितम् ॥१६। अकूसी, गुग्युल, अगर, ओर घी इनसे इसको धप करे भोजन के पीछे धृतपान (रात में) ओर वस्तिकर्म करे ॥११॥ निरजनो निशि तत्सर्पिः पीत्वोपरि पिवेत् पयः मधेवस्तिषु नस्ये च मस्तिष्के परिषेचने ॥१२॥ ञजतपाक बलात प्रञ्ञस्तं चापि भोज्ने। ` रात मे मनुष्य भोजन न करके धृतपान करे ओर पौष । गरम दुष पीये । शिरोबस्ति, नस्य, शिर के परिषेचन मे ओर भोजन मेँ शतपाकी बलात बरते ॥१२। कण्टकारीमजाक्षीरे पक्त्वा क्षीरेण तेन च ॥१३॥ विपचेत् कुक्छकट वसां कणेयोस्तसरपूरणम् । | कटेरी चाखल, इखको आठ गुणे दुष मे ओर दुरे चारगुणा पानी लेकर पकाये । इस दूध से मुगे की वसा-ए कुडव सिद्ध करे | यष्ट वसा कानों मे उठे ॥१३॥ तण्डुलीयकमूलानि फरूमङ्कोखजं तथा ॥१४॥
अदि खकेन्दुकान्मूङं सर देवदारु च ।
लशुन श्गवेरं च तथा वं्ञावटेखनम् ॥१५॥
कृल्केरेषां तथाऽम्डेश्च पचेत् स्नेहं चतुर्धिधम् ।
` वेदनायाः प्रशान्त्यथे' हितं तत्कणैपूरणम् .॥१६॥
चौलाई की जड़, अङ्कोट का फल, क्षिटी, केन्द्रकमूह, ` चीड़; देवदार, लहसुन, सोंठ, बांस के छिलके, इनके कलक
से, दधि-तक्र सुरा-कांजी इनमे घी तेकवसा मजा ये चारों स्नेह
सिद्ध करे। यह स्नेह वेदना की शान्ति के व्यि कानमे. मरे |॥१४-१६॥ ` | लनुनाद्रकशिभ्रणां सुरङ्गया मूलकस्य च ।
कदल्याः स्वरखः श्रष्ठः कदुष्णः कणेपूरणे ॥१५॥
शरद्गवेररसः कोद्र सेन्धवं तेख्मेव च । -
कदुष्णं कणयोद्यमेतद्वा वेदनापदम्.॥१८॥ , लहसुन, आद्रक; सदानन, सु रगी (मीढ सहजन), मू, केखा, इनका स्वर, गुनगुनाता गरम-(जितना सह्य €)
१ न, १९ 1. + ४
होती ह ॥१७,१८॥
सर्पिः पचेत्तेन कर्णं पूरयेत् कणयूटिन्ः १ .॥ लय करी ओर मेद के मूत्रमें घास का छिलका क्छ _ | मे बरतकर वैद घी को, पकाय, यद धेत 'कंणंशुल्वदि | केकानमे उलि ॥१९॥- = 3 महतः पश्चमूरस्य.काण्डमष्टादश्ह्ल्म् । कषोमेणावेश्ट्य खंलिच्य तेठेनादीपयेत्ततः॥२०॥ 4 ` ५. > #
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