सुश्रुत संहिता
Sushruta Samhita
महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)
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उत्तरतन्त्रम्
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यत्तैलं च्यवते तैभ्यो घृतेभ्यो भाजन्तोपरि । ज्ञेयं तदीपिकातैलं सद्यो गुह्णाति वेदनाम् ॥२१॥
दीपिका तेल—बृहत्पंचमूल के अट्टारह अंगुल लम्बे टुकड़े (मोटे टुकड़े) लेकर इस पर अलसी का वख़ लपेटकर तेल डुबाये । तेल से गीला करके इसको एक पात्र के ऊपर रखकर जलाये । जलाने से जो तैल पात्र में गिरे, वह दीपिका तेल है । इस तेल को कान में डालने से वेदना तुरन्त नष्ट होता है ।
वि० मन्तव्य—विल्व आदि वृक्षों की प्रशाखा के अङुली के से मोटे ८-८ अंगुल लम्बे, ५ टुकड़े लेकर रेशमी कपड़ा में लपेट, तैल में भिगो, चिमटा से पकड़कर एक ओर अग्नि लगा देवे और उसके नीचे कटोरी रख देवे, जलते समय इसमें से बून्द-बून्द तैल टपकता है, इसी तैल का नाम ‘दीपिका’ तैल है । यह भी तैल पाक का एक प्रकार है । इस विधि से तैल का खरपाक होता है, और कर्ण में डालने के लिये खरपाक ही होना चाहिये ॥२१॥
कुर्यादेवं भद्रकाष्ठे कुष्ठे काष्ठे च सारले । मतिमान् दीपिकातैलं कर्णशूलनिबर्हणम् ॥२२॥ बुद्धिमान् वैद्य इसी विधि से देवदारु, कुष्ठ, चीड़ की लकड़ी से भी दीपिका तेल बनाये, यह कर्णशूल को नष्ट करता है ।
वि० मन्तव्य—देवदारु तथा चीड़ की लकड़ी को एक ओर से प्रज्वलित करने पर उसमें से तैल गिरता है, यही टर्पिन का तैल-तारपीन का तैल कहलाता है । यह कर्णशूल एवं कर्ण-खाव में भी लाभ करता है, और सड़े-गले सब व्रणों में लगाने से लाभ करता है, यह शोषन भी है और रोपण भी है । विधि-रता में भी लाभ करता है ॥२२॥
अर्काङ्गुराम्लपिष्टास्तेलात्कान् लवणान्वितान् । सन्निद्ध्यात् स्तुहीकाण्डे कोरिते तच्छदावृते ॥२३॥ पुटपाकक्रमसविज्ञान् पीडयेदारसागमात् । सुखोष्णं तद्रसं कर्णं दापयेच्छूलशान्तये ॥२४॥ कपित्थमातुलुङ्गाम्लशुङ्कररसः शुभैः । सुखोष्णः पूरयेत् कर्णं तच्छूलविनिवृत्तये ॥२५॥ कर्णं कोष्णेन चुकेण पूरयेत् कर्णशूलिनः । समुद्रफेनचूर्णं युक्त्या चाप्यवचूर्णयेत् ॥२६॥
आक के अंकुरों (कोमलाग्र भागों) को कांजी से पीसकर इसमें तेल और नमक मिला ले । फिर थोर का एक टुकड़ा लेकर उसे बीच में से खोलला करके उसमें यह कल्क भरकर, टुकड़े को थोर के पत्तों से लपेट देवे । और निचोड़कर रख को ले लेवे । फिर इस काण्ड को पुटपाक की विधि से पकाये । इस रस को सुहाता हुआ गरम-गरम कान में शूल की शान्ति के लिये डाले । कैथ, बिजौरा, आद्रक इनके रस को सुहाता
गरम करके कान में डाले, इससे शूल नष्ट होता है । कर्णशूल-वाले रोगी के कान में सुहाता गरम चुक डाले । अथवा युक्ति से (फूलकार द्वारा) समुद्रफेन का चूर्ण कान में डाले ।
वक्तव्य—‘यन्मत्त्वादियुच्यो भाण्डे समुद्रश्रीद्रकाञ्चिकं । धान्यराशो त्रिरात्रस्थं शुक्तं चुक्तं तदुच्यते ॥’
वि० मन्तव्य—कर्णविवर में समुद्रफेन का चूर्ण डालकर ऊपर से निम्बू रस अथवा काञ्जी की ५-७ बून्द डालते हैं, बून्दें डालने पर उफान आता है, इसे देखकर धवराना नहीं चाहिये ॥२३-२६॥
अष्टानामिह मूत्राणां मूत्रेणान्यतमेन तु । कोष्णेन पूरयेत् कर्णं कर्णशूलोपशान्तये ॥२७॥ कर्णशूल की शान्ति के लिये आठों मूत्रों में से किसी एक मूत्र को सुहाता गरम कान में डाले ॥२७॥
मूत्रेण्वम्लेषु वातघ्ने गणे च क्वथिते भिषक् । पंचेच्छतुविधं स्नेहं पूरणं तच्छुक्तं कर्णयोः ॥२८॥ वैद्य आठों मूत्रों में या कांजी आदि अम्लों में अथवा वातघ्नगण (भद्रदाल्यादि) में घ्री, तैल, वसा और मज्जा चारों स्नेह सिद्ध करके कान में डाले ॥२८॥
एता एव क्रियाः कुर्यात् पित्राग्नेः पित्रासंयुते । पित्तं शुक्तं कर्णशूलं ये यही चिकित्सा पित्तनाशक द्रव्यो से करे ।
काकोल्यादी दशक्षीरं तित्तं चात्र हितं हविः ॥२९॥ क्षीरवृक्षप्रवालेषु मधुके चन्दने तथा । कल्कक्वाथे परं पक्वं शर्करामधुकेः सरैः ॥३०॥
काकोल्यादिगण के कल्क से दसगुने दूध में सिद्ध किया घृत उत्तम है । बरमाद आदि क्षीरी वृक्षों के पत्तों के क्वाथ में काकोल्यादि गण से घृत सिद्ध करे । मुलेहटी और चन्दन के क्वाथ एवं कल्क से घृत सिद्ध करे । शर्करा और मुलेहटी एवं विरेचन द्रव्यों के क्वाथ में घृत सिद्ध करे । शर्करा मुलेहटी का कल्क, विरेचन द्रव्यों का क्वाथ द्रव कार्य में बरते ॥२९,३०॥
इक्षुगुदीसर्पपस्तैहो सकफे पूरणे हितौ । तित्तौषधानां यूषाश्च स्वेदाश्च कफनाशनाः ॥३१॥ कफयुक्त कर्णशूल में हिंगोत का तेल या सरसों का तेल डाले । तित्त औषधियों का यूष और कफनाश (रूख स्वेद) स्वेद उत्तम है ॥३१॥
सुरसादी कृतं तैलं पञ्चमूले महत्त्वपि । मातुलुङ्गरसः शुक्तं लघुनाद्रकयो रसः ॥३२॥ एकैकः पूरणे पथ्यस्तैलं तेष्वपि वा कृतम् ।
तीक्ष्णा मूधविरेकाश्च कवलाश्चात्र पूजिताः ॥३३॥ सुरसादिगण में या बृहत् पंचमूल में बनाया तैल, बिजौरा का रस, शुक्त, लहसुन या आद्रक का रस एक-एक वस्तु या इनसे सिद्ध किया तैल कान में डालने के लिये उत्तम है । तीक्ष्ण शिरोविरेचन, तथा कवल उत्तम हैं ॥३२,३३॥