सुश्रुत संहिता
Sushruta Samhita
महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)
पृष्ठ 704, कुल 872 में से
संदर्भ में पढ़ें< ` दष्ट
कणंशूर्विधिः छरस्तः पित्तध्नः ओणितावृते ) .रक्तयुक्त कणश म पित्तनाशक सम्पूणं विधि को वरते ।
` शूलप्रणाद बाधियच्वेडानां त॒ प्रकीतितम् ।३४॥।
सामान्यतो, विशेषेण वाधियं पूरणं णु
गवां मूत्रेण विल्वानि. पिष्ट्वा ररं विपाचयेत् ॥३५॥
संजर च सदुग्धं च बाधियं कणपूरणप् ।
कणश, कणंप्रणाद, - वाधियं च्वेड इनको सामान्य
चिकित्सा फह दी ै। बाधियं रोग के व्यि विशेष चिकित्खा
व.
सुनो-गाय के मूत्र से विल्व को पीखकर ते पकाये | पकाते समय इसमे द्रवकाय जल ओर दुध से (दूध ओर जल ते से
चार गुणे) करे, इस तेर को कान मे डार ।३४,२९।
सितामधुकबिम्बोभिः सिद्ध वाऽऽजे पयस्यपि ॥३६॥
बिम्बोक्वाथे विमथ्योष्णं शोतीभूतं सदुदधृतम् । पुनः पचेहशक्षीरं सितासधुकचन्दनैः ॥(२७॥
बिस्वास्बुगाढं तत्तेढं बाधियं कणपूरणम् । शकरा, मुखुहटी ओर कन्दूरी इनके कल्क से बकरी क -दुष मे तेर पकाये । इस तेर को गरम-गरम कन्दूरी के क्वाथ “मे डाख्कर मल। ठंडा होने पर जो ऊपर आ जाये, उसे
निकालकर फिर से शकरा, मुरेदटी, चन्दन इनके, कल्क के साय दसगुणे दघ मे पकाय । इस तेर को विल्व के.क्वाथ से गाढा बनाकर बधिरता मे कान मे" भरे ॥३६.३५॥ बद्यते यः प्रतिश्याये विधिः सोऽत्यन्न पूजितः.\३८॥ प्रतिश्यायमे जो विधि कैगे- वह मी यहां श्रष्ठहै
| २३८ ॥
बातभ्याधिषु यश्चोक्तो विधिः स च दितो भवेत् । . `~ ~ वातव्याधि मे जो चिविस्सा कदी है; वह भी यहा पर बरते |
कृणघ्रावे पृतिकृण तथेव कृमिकणके ॥३९। समान कम कुकी त योगान् वेरेषिकानपि। कण्व, पूतिकण ओर इमिकणं में एक समान चिकित्सा ्ः करे, विशेषयो्गो को मी इमे" बरते ॥३६॥
शिरोविरेचनं चेवं धूपन परण तथा ॥४०। भ्रमाजंन धावन च वीद्य वीद्याव चारयेत्। राजघ्ृक्षादितोयेन सुरसादिगणेन वा॥४१॥ िरोविरेचन, धूपन, कान मे" भरना, प्रमाजन ओर „ ^ प्रक्ालन इन कायो को राजषृश्चादि. (आरग्वधादि) कषाय से या खरसादि गण से-दोष, दूष्य, मल क्रा विवार करके करे ॥
. क्वाथं पच्रकषाय॑ . कृणमक्षाखन काय चूणरेषां च प्रणम् । त कपित्थरसयोजितम् ॥४९॥
सुश्रतसंहिता `
रस मिलाकर, इनमे मधु डाङ्कर कणलात्र मे' भरे | ची |
`. पूरणाथे' प्रशंसन्ति तैखं वा तेविपाचितम् ॥४॥
धिसकर मधु मिलकर डालना उत्तम दै । निशुण्डी व द, पे
तेल) सेन्धव, षर का धुवाखो, गुड़ ओरमधु इनका ९६ 4
योजितो मधुना वाऽपि कणसावे प्रस्यते। [ भ*२|
लाक्षा रसाञ्जनं सजश्चूणितं कणपृरणम् ॥४४॥
सञ्वरं महावृक्षजम्ब्वान्रप्रसवायुतम्। ुरीरकषौद्रमण्डूकौ सिद्ध तैकं च पूजितम् ॥४१॥
कान को धौने तथा कानमे चूणं भरने मे श
(तिन्दुकान्यमया आदि श्लोक मे कदे) के क्वाथ मे' कय क
दक्ष की छाल का चूण, वनकापांखी फल का रख मधु इङ्ग
मिलाकर कान के लाव म डालना उत्तम दै । छाल, रसौर राक इनका चृणं कान में . मरना उत्तम है। सरबाल, योर
जामुन, आम इनके कोमल पत्ते, ठेकर इनका क्वाय कर इसमे ककटशरङ्गी, मधु ओर मण्टरकी (बाह्ली) इनका ' कलं मिखाक्रर तैक सिद्ध करे ।
वक्तव्य--“कणप्रश्चालनं कायम्" इतना पद् सुरषादि
गणेन वा, इसके साथ जोढने से अथ ठीक हो जाता है ॥ ४२
४१ ||
तिन्दुकान्यभया रोधं समङ्गाऽऽमल्कं मधु। पूरणं चात्र पथ्यं स्याकपित्थरसयोनितम् ॥४९॥ ` | ८
तिन्दुक (तदू); हरड, रोध, समंगा (राजवती), आल्,
इनके चूण मे मधु ओर केथ का रख मिलाकर कान मे -डाल्ना उत्तम हे । यह पंचकषाय चूण दे ।॥४६॥ .. | रसमास्रकपित्थानां मधूकथ वशाछ्जम् । ठ
त्रियङ्कमधुकाम्बष्ठाधातकौञिख्पणिभिः । | ` मञ्जिष्टारोघ्रलाक्षामिः क पिर्थस्य रसेन वा ॥४९॥
पचेत्तेखं तदाखरावमवगृह्णाति पूरणात्। = ` आम, कैथ, महभ, धव ओर शार इनका स्वरख अछा |
ल्ग या मिलाकर अथवां इनसे सिद्ध किया तेल काम्
डालना उत्तम है 1 प्रियंगु, मुरेहटी, पाठा, धातकी मेनर्षिह
पृशनिपणी, मंजीठ, लोध लाख, इनसे या केथके रवसे.
सिदध करे । यह तैर कान मँ डालने से लाव को बन्द क १
है ॥४७,४८॥| “ | छ घृष्टं रजाञ्जनं नायौः क्षीरेण मधुसंयुतम् ॥४९। र तत्प्रशस्तं चिरोत्थेऽपिसा्रामे पूतिकणेके। _ `
` निगण्डीस्वरसस्तेठं सिन्धुधूमरजो गुडः ॥५०।
पूरणः पृतिकणेस्य जमनो मघुसखंयुतः। >. पुरातन कणंलाव या पूतिकणं मे भी रसौत को ५५ 4