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भारतकोश
सुश्रुत संहिता

सुश्रुत संहिता

Sushruta Samhita

महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished872 पृष्ठ

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सुश्रुतसंहिता

[ अ० २२ ]

घ्राणाश्रितं पित्तमर्सुषि कुर्या-

द्यस्मिन् विकारे बल्वार्द्ध पाकः ॥८॥

तं नासिकापाकमिति व्यवस्थे-

द्विकलेदकोथावपि यत्र दृष्टौ ।

नासा में स्थित पित्त जिस रोग में छोटी-छोटी फुंसियाँ पैदा कर दे, और जबर्दस्त पाक भी हो जाये, इस रोग को नासा-पाक कहते हैं । इसमें क्लेद ( आर्द्रता ) और कोथ ( सड़ना ) भी देखा जाता है ॥८॥

चतुर्विधं द्विप्रभवं द्विमागं

वक्ष्यामि भूयः खलु रक्तपित्तम् ॥९॥

बात, पित्त, कफ, सन्निपातजन्य चार प्रकार के, यकृत और प्लीहा दो से उत्पन्न होनेवाले, ऊपर और नीचे दो मार्गों से होनेवाले रक्त पित्त को आगे विस्तार से कहूँगा ।

वि० मन्तव्य—नासारन्ध्रों से निकलने बहने अथवा बूंद २ टपकनेवाले रक्त को 'नकसीर' कहते हैं । देखा गया है कि इस रोग में रक्तपित्त के पूर्वरूप एवं अन्य लक्षण नहीं होते और यदि ही तो उसे 'रक्तपित्त' ही मानना चाहिये परन्तु इस रक्त के दूषित होने की जिज्ञासा करने पर रक्तपित्त में वर्णित रक्तपित्त एवं जीव शोणित की विधि से ही परीक्षा करनी चाहिये ॥

वकव्य—द्विप्रभवम्—से स्निग्ध एवं लूष भेद से या आमा-शय और पक्वाशय भेद से दो प्रकार का मानते हैं ॥९॥

(तल्लक्षणं नासिकरक्तपित्तं

जानीहि नासाप्रभवप्रवृत्तम् ।)

दोषैर्विदग्धैरथवाऽपि जन्तो-

ल्लंटादेशेऽभिहतस्य तैस्तु ।

नासा ध्वेत् पूयमस्तुविमिश्रं

तं पूयरक्तं प्रवदन्ति रोगम् ॥१०॥

पित्त-रक्त की अधिकता से विदग्ध हुए दोषों के कारण या माथे पर आघात लगने के कारण रोगी की नासा से रक्त से मिश्रित पूय निकलती है, इस रोग को पूयरक्त कहते हैं ॥१०॥

घ्राणाश्रिते मर्मणि संप्रदुष्टे

यस्यानिलो नासिकया निरेति ॥११॥

कफानुयातो बहुगः सशब्द-

स्तं रोगमाहुः क्षवथुं विधिज्ञाः ।

नासिका में स्थित, श्लेष्माटक मर्म के दूषित होने पर वायु, कफ से मिलकर बहुतवार शब्द के साथ नासिका से निकलती है, इस रोग को क्षवथु ( छींक ) कहते हैं । ( संप्रदुष्टे के स्थान पर संप्रदुष्टः पाठ भी है जो ठीक है—अर्थात् घ्राणाश्रित मर्म में—दूषितवायु कफ से मिलकर शब्द के साथ बाहर आती है ) ॥११॥

तीक्ष्णोपयोगादतिजिघ्रतो वा

भावान् कटूनर्कनिरीक्षणाद्वा ॥१२॥

सूत्रादिभिर्वा तरुणास्थिमर्म-

ण्युद्वाटितेऽन्यः क्षवथुनिरेति ।

तीक्ष्ण ( मरिच-लाल मरिच आदि ) वस्तुओं के खाने से, या इतर आदि वस्तुओं के बहुत सूँघने से, कटु वस्तुओं ( तम्बाकू सूँघनी आदि ) के सूँघने से, सूत्र को देखने से, नाक में धागा आदि डालने से (जैसा कि नैति में करते हैं), तरुणास्थि या मर्म के विक्षोभ से, आगन्तुज छींक आती है ॥१२॥

प्रश्नयते नासिकयैव यश्च

सान्द्रो विदग्धो लवणः कफस्तु ॥१३॥

प्राक् संचितो मूर्धन्ति पित्ततप्त-

स्तं भ्रंशथुं न्याधिमुदाहरन्ति ।

शिर में पहले संचित हुआ घड़, विदग्धलवण, कफ, पित्त की गरमी से नासा से ही जिस रोगी में नीचे बहता है, इस रोग को भ्रंशथु कहते हैं । ( मुख से नहीं आता ) ।

वि० मन्तव्य—भ्रंशथु—इस रोग में सौंद अधिक आता है फलतः शिर की दुर्बलता का अनुभव होता है ॥१३॥

प्राणे भ्रशं दाहसमन्विते तु

विनिःसरेद्भूम इवेह वायुः ॥१४॥

नासा प्रदीप्तिव च यस्य जन्तो-

न्याधि तु तं दीप्तमुदाहरन्ति ।

अति जलन युक्त नासा से घूम के समान जिसमें वायु बाहर आती हो, रोगी की नासा जलती हुई सी रहती हो, इस रोग को दीप्त कहते हैं ॥१४॥

कफानुयातो वायुरुदानसंज्ञो

यदा स्वमाग विगुणः स्थितः स्यात् ॥१५॥

प्राणं वृणोतीत्य तदा स रोगो

नासाप्रतीनाह इति प्रदिष्टः ।

उदान संज्ञक वायु कफ से मिलकर अपने मार्ग में जब विकृत होकर स्थित हो जाता है, और नासिका को बन्द कर देता है, तब इस रोग को नासा प्रतिनाह कहते हैं ॥१५॥

अजस्मच्छं सल्लिप्रकाशं

यस्याविर्णं क्षवतोह नासा ॥१६॥

रात्रौ विशेषेण हि तं विकारं

नासापरिखावमिति व्यवस्थेतु ।

जिस रोगी की नासा से निरन्तर, स्वच्छ, पानी के समान, बिना किसी विशेष रंग का खाव बहता रहता है, विशेषकर यह खाव रात्रि में होता है ( शीत समय में ), इस रोग को नासा परिखाव कहते हैं ॥१६॥

घ्राणाश्रिते श्लेष्मणि मासूतेन

पित्तेन गाढं परिशोषिते च ॥१७॥