सामग्री पर जाएँ
भारतकोश
सुश्रुत संहिता

सुश्रुत संहिता

Sushruta Samhita

महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished872 पृष्ठ

पृष्ठ 707, कुल 872 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 707

अ २१ | समुच्छवसिस्युथ्वंसधश्च इच्छा

दयस्तस्य नाकस्तापरिखौष उक्तः

नासिका में स्थित कफ के वायु ओर पित्त से अतिश्चय रूप पलाये जाने से; रोगी कठिन से ऊपर ओर नीचे श्वास छेता ह. इख रोग को नासापरिशोष कदा दे ॥१७॥

दोषखिभिस्तेः प्रथगेकशश्च

ब्रयात्तथाऽजासि तथव जोफान्‌ ॥१८]

लाङक्यसिद्धान्तसवेद्य चापि सवीत्मकं सप्तममवेद्‌ तु ।

` वातादि तीन दोषों से अलग-अलग, तथा सन्निपात से

चार प्रकार के अश एवं चार प्रकार के शोफ होते हं । शाराक्य

सिद्धान्त के विचार से निदानोक्त छे अवुदांके सिवाय सन्नि

` परातजन्य भी सातवां अवेद्‌ होता है ॥१८॥

रोगः प्रतिश्याय इहोपदिष्टः स वदयते पद्चविधः पुरस्तात्‌ ॥१६॥ यहा पर जो पांच प्रकार का प्रतिश्याय का दै, उसे आगे

कदंगे ॥१६॥ र ( नासास्रोतोगता रोगाक्िशदेकश्च कीर्तिताः । सोतःपथे यद्धिपुखं कोशवचावु द भवेत्‌ ।॥२०॥)

( इस प्रकार से नासासोत के इकतीस रोग यहां कह दिये । है। नाषारन्ध मे जो बड़ा खा कोश जैखा होता है वह अषद्‌

कहलाता है ॥२०॥)

निदानेऽ्ांसि निर्दिष्ान्येवं तानि ` विभावयेत्‌ ॥२१॥ रोफास्तु ओफविज्ञाना नासास्तोतोव्यवस्थिताः।

नासाखोत मे व्यवस्थित शोफ को शोफ के लक्षणों से, ओर । अश्‌ को निदान मे कदे रक्षणो से पहचानना चादिये ॥२१॥

इति भरीसुश्रुतसंहितायायुत्तरतन्ान्तगंते शालाक्यतन्त्र नासागतरोगविज्ञानीयो नाम दार्विशोऽध्यायः ॥२२॥ `

प्न न य ष

ब्रयोविशतितमोऽध्यायः अथातो नासागतरोगभरतिषेधं व्याख्यास्यामः ॥१॥ - यथोवाच भगवान्‌ धन्वन्तरिः ॥२॥ नि भवे नाखागत रोग प्रतिषेध का व्याख्यान करेगे-जैखा भगवान्‌ धन्वन्तरि ने कहा था ॥१,२॥ पूवोिष्टे पूतिनस्ये चः जन्तो { ~ स्नेहस्वेदौ छदनं खंसनं च ।

~ यकत भक्तं तीचदणमल्पं ख्घुस्या- ` . दुष्णं तोयं धूमपानं च काठे ॥॥३॥ भगनस ओर पूतिनाख भे रोगी कौ स्नेहन, स्वेदन, बमन,

9 ¢ $ ‡

१) एः ) ॥ ५ =

ह) क्वच ऋ

(५. ~ च, न त भ, (+ ` 9 १4 व १ त 1 न त ^ स त, क ७ च ~ # च -- प ग क + ^~ "5 त क चः क ॥

छत्तरतन्त्रम्‌

। तीच्ण, अल्प एवं ` लधुभोजन भोजन समय में

पीने को गरमपानी तथा धूमपान काल में धूमपान |. ॥३॥ | सम्पूण रूप म करे ॥८॥

नक 1 1 क ^. 5 1

६५१ दिङ् व्योषं वत्सकाख्यं शिवादी |

॥ लाक्षा बीजं सोरभं,कटफटं च उग्रा कुष्ठं तीद्णगन्धा विडङ्गं =

्रषठं नित्यं चाबपीडे करम्‌ ॥४॥ हींग, रिकडटु, इन्द्रजो, श्वेत पुननवा ( शेफालिका ), खाल

ठलसी के बीज, कटफल, बच, कूठ, सुहांजना, वायविडंग, करंज

इनका नित्य प्रति अवपीडन के रूप मे नस्य देवे ॥४] तेद्रव्येः साषेपं मूत्रयुक्त

तें धोमान्नस्यहेतोः पचेत ।

इन्दं द्रव्यो से गोमू के साथ सरसों का तेर नस्य क

लिये बुद्धिमान वेद्य बनाये । |

नासापाके पित्तहस्संविधानं

काय सव बाह्यमाभ्यन्तर च ॥९॥

हृत्वा रक्तं क्चरब्क्षत्व चश्च |

साञ्याः सेका योजनीयाश्च ठेपाः।

नासापाक में ब्राह्म एवं अन्तः उपचार पित्तनारक चिकरित्वा सम्पूणं रूप मे करे । रक्त को निकालकर बरगद आदि क्षीरी- वृक्षां की छार घी के साथ मिलाकरख्ेप म ओर परिषिकमें

बरतनी चाहिये । ( बाह्य उपचार खेप, अभ्यंग, परषेकादिः

आमभ्यन्तर-आहार, स्तेहषान, विरेचनादि ) ॥५॥

वदयाम्युध्वं रक्तपित्तोपञान्ति |

नासा रक्त पित्त को चिकिर्षा आगे रक्त पित्त प्रतिषेध मे.

( नासादृत्ते जलम देयं आदि ) करगे ।

नाडो वस्यात्‌ पूयरक्ते चिकित्सा ॥€॥ |

पूयरक्त मे चिकिस्छा--( विखपनाडी स्तन रोग में कही )

नाडी बण की चिकित्सा करे ॥६॥ |

वान्ते सम्यक्‌ चावपीडं वदन्ति तीच्णं धमं शोधनं चात्र नस्यम्‌ ।

पूयरक्त मे मली प्रकार वमन होने पर अवपीडन नस्य देवे

.| तीद्णधूम, शोधन नस्य देवे ॥

तप्यं नस्यं मूधवेरे चनीये- ध

नाञ्या चूणे क्षवथो भरंशथो च ॥७॥

कयीत्‌ स्वेदान्‌ मूष्नि वातामयष्नान्‌

. स्निग्धान्‌ धमान्‌ यदयदन्यद्धितं च ।

क्षवथुः ओर भ्रंशथु रोग मे--प्रधमन नस्यनाडी से देवे

शिरो विरेचन द्रग्यों का चूण नासा मे ए के । प्रषमन नस्य एवं

चरणो से कफ कम हो जाने प्र बातरोग नाक स्वेद शिरपर `

देवे । स्निग्धधूम तथा अन्य जो हितकारो ( शिरोबस्ति आदि)

` | हो वह करे ॥७॥

दीप्र रोगे पैत्तिकं संविधानं म ` -.इयोत्‌ सवं स्वादु यच्छीतटं च ॥६॥ ^~

` दीप्र रोग मे पित्त चिकित्सा एवं मधुर एवं शीतल जि {र 9१