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भारतकोश
सुश्रुत संहिता

सुश्रुत संहिता

Sushruta Samhita

महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished872 पृष्ठ

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पृष्ठ 708

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नासानाहे स्नेहपानं प्रधानं स्तिग्धा धमा मूधेवस्तिश्च नित्यम्‌ ।

बलातेरु सबेथेवोपयोज्यं

वातम्याधाबन्यदुक्तं च यद्यत्‌ ।&।। नाखानाह यें स्नेह पान ( भोजन के पीठे ) उत्तम दै

स्नेहनधूस शिरोबस्ति ( साल्वण उपनाह आदि ) प्रशस्त हे ।

बला तैल पान, अभ्यंग, शिरोविरेचन आदि सब कामों मे

बरते, एवं वातव्याधि मेँ कदे दूसरे अणुतेक आदि भी बरते ।६।

नासास्रावे घ्राणतश्चूणसुक्तं

. नाज्या देयं योऽवपीडञ्च तीदच्णः |

तीदणं धमं द्‌वदावग्निकाभ्यां

| मासं वाऽऽजं युक्तमत्रादिशन्ति ॥१०॥

नासालाव मे शिरोविरेचन दर्व्योंका चूण नाकसे देवे

तीण अवपीडन को ( हियुव्योषं वत्षकाख्यं ) नाड़ी से नाक म दे । देवद्‌ार, चि्रक से तीद्ण धूम देवे, भोजन मे बकरी

का मांस उपयोगी हे ॥१०॥

नासासओोषे क्षीरसपिः प्रधानं सिद्धं तें चाणुकल्पेन नस्यम्‌ । सर्पिःपानं भोजनं जाङ्गखेश्च

स्नेहः स्वेदः स्नेहिकश्चापि धमः ॥११॥ „ ~ नासखथोषमंदूषसे निकाला घी श्रेष्ठ दै। अणुकल्यना `. (अणुतेलविधि-बातव्याधि में कही है ) से बनाया तैक नस्य मे

देवे । मोजन ॐ साथ. घृतपान, जंगल मांस के साथ भोजन स्नेहन करे, स्वेद देवे, स्नेहिकधूम (मधच्छिशादि) वरते ॥१९१॥ 5 शेषाच्‌ रोगान्‌ घ्राणजान्‌ सन्नियच्छे-. | दुक्त तषां यद्यथा संविधानम्‌ ॥१२॥ नासाजन्य शेषरोर्गो को ( अन्द, ओोफ, अशं की ) चिकित्खा, उनको अपनी अपनी चिकित्सा के अनुसार करे | १२। इतिश्री सुश्चतसहितायामुत्तरन्तान्तगते शाराक्यतन्धे नासारोगप्रतिषेषो नाम जयोविशोऽप्यायः (२३

चतुविशतितमोऽध्यायः

अथातः प्रतिश्यायप्रतिषेधं व्याख्यास्यामः ॥१॥ यथोवाच भगवान्‌ धन्वन्तरिः ॥२॥ | „अब इसके आगे प्रतिश्यायगप्रतिषेध का व्याख्यान करगे जसा किं भगवान्‌ धन्वन्तरि ने कहा था ॥१,२] . नारीप्रसङ्गः शिरसोऽभितापो “~ “ धमो स्नः शीतमतिप्रतापः सखधारण . मूत्रपुरीषयोश्च < `. ~ सथः प्रतिश्यायनिदानयक्तम्‌॥

निदान-अतिशय खरीसंग से. शिर मे अभिताप पीडा

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हि

ठ 8 कने ।से ( धुवं से धूप आदिते), शीतल वस्तुओं से अतिसेवन

युश्रुतसं हिता

| .रोगी कशः, अतिपाण्ड्वण (फोका), उष्णस्शबाल, तथा धाः

प्रतीत होती है ॥७.८॥

बार-बार बहता है, रोगी का दिखाब श्वेत रइता हं

` | खाज का अनुभव दोता ह ॥६॥

कई | जाता दै, पका इआ हो या अपक्वं हो, उसे खननिपरातज 1

| || अ. सेयासिर

प्रतिश्याय उत्पन्न

पर शीत

होता

ल्गने

हे ॥३॥

से, मलमूत्र के र

|

|

चयं गता मूधेनि सार्तादय

धथक्‌ समस्ताश्च तथव ओणितम्‌। प्रकोप्यमाणा विविधैः प्रकोपणै-

दणां प्रतिश्यायकरा भवन्ति हि॥४॥ ` शिर म~ वातादि तीनों दीष ओर रक्त धरयकृपृथक्‌

समस्त रूप मे एकत्रित होकर नानाप्रकार के प्रकोप कारणो प्रकुपित किये हए मनुष्यो म प्रतिरयायरोग उयन्न करते है ॥४|| ` जिरोगुरुत्वं क्षवथोः प्रवतेनं <

तथाऽङ्गमदंः परिहृ्टसेमता | उपद्रवाश्चाप्यपरे प्रथग्विधां ^ चणा प्रतिश्यायपुरःसराः स्प्रताः॥९॥ पूवरूप चिर मे भारीपन, छीके आना, अंगो का टला. रोमांचता, अन्य दूसरे नानाप्रकार के उपद्रव, ( ज्वर, अरोचक ` आदि ); प्रतिश्याय के आगे होनेवले पूवस्य है ॥५॥

आनद्धा पिहिता नासा तयुखावप्रवतिनी । गरताल्वोष्ठलोषश्च निस्तोदः अङ्कयोस्तथा ॥६॥

स्वरोपघातश्च भवेतप्रतिश्यायेऽनिखात्मके। | वातजन्यप्रतिश्याय --नाकख्की इई तथा श्वास मेँ रुकावट ^

होती है, इसमे पतला लाव होता है, गला तालु ओर ओढ दला

रहता दहै, शंख प्रदेशों में चुभने की सी ददं दोतीःहै, स्वरवः जाता. हे ॥६॥ 4 उष्णः सपीतकः स्लावो घ्राणात्‌ सरवति पेत्तिके ॥७॥

छृशोऽतिपाण्डुः सन्तप्रो मवेत्तष्णानि (भि) पीडितः।

सधम सहसा बर्न वमतीव चःमानवः ॥८॥ , . `

पित्तजग्रतिश्याय मे- नासा से गरम, पीरलाव बहता ४

से पीड़ित रहता हे । नाखा से अचानक धूमयुक्त आग निकः 9

कफः कफठृते प्राणाच्छुक्छः शीतः खवेन्युहुः । युक्छावभासः शूनाक्षो भवेद्‌ गुरुखिरोखः ॥९॥

शिरोगरोष्ठताख्नां कण्डूयनमतीव च ।

कफजन्य॒प्रतिश्याय मे- नासिका से, श्वेत, ` यीतलः

मारी, शिर-मुख मे भारीपन, शिर, गखा, - ताट्ल ओर ओट ^ ।

भूत्वा भूवा प्रतिश्यायो योऽकसपादविनिवतेते ॥ संपक्वो बाऽप्यपक्वो वा सं सवंप्रभवः स्छतः। लिङ्गानि चेव सवषां पीनसानां च सवजे ॥१५॥ ,

जो प्रतिश्यायं बार-बार होकर अचानक स्वय शन