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भारतकोश
सुश्रुत संहिता

सुश्रुत संहिता

Sushruta Samhita

महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished872 पृष्ठ

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अ० २६]

उत्तरतन्त्रम्

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(भद्राव्यादि), तथा काकोल्यादि मधुर द्रव्यों से सिद्ध घृत पान और नस्य में उत्तम है। क्षयकास नाशक घृत (कुलीर शुक्ति चक्रेणलावान्-आदि से कहा) इसमें अतिशय पथ्य है।

वि० मन्तव्य—क्षयजनित शिरोरोग में—बृहणविधि अर्थात् वादाम का हलुआ, खीर, मालपूआ, अखरोट, वादाम आदि सूखे फल एवं खसखस, मगद आदि पुष्टिकारक विशेषतः मस्तिष्क को पुष्ट करनेवाले आहारों का प्रयोग करे ॥२५॥

कृमिभिर्भक्ष्यमाणस्य वक्ष्यते शिरसः क्रिया ॥२६॥ नस्यं हि शोणितं दद्यात्तेन मूर्च्छन्ति जनतवः।

मत्ताः शोणितगन्धेन सभायान्ति यतस्ततः ॥२७॥

जिस रोगी के शिर को कृमि खाते हैं—उसकी चिकित्सा के लिये रक्त का नस्य देवे इसमें कृमि मद्युक्त हो जाते हैं, रक्त के गन्ध से मत्त होकर कृमि हृधर-उधर से नाक से बाहर आ जाते हैं।

वक्तव्य—“रक्त को देखकर या उसकी गन्ध से कई पुरुषों को मूर्च्छा आ जाती है, इसी प्रकार कृमि भी रक्त की तीव्र गन्ध से मूर्च्छित हो जाते हैं। इसी से कहा है—

पृथिव्यमस्तमोरूपं रक्तगन्धश्च तन्मयः।

तस्माद् रक्तस्य गन्धेन मूर्च्छन्ति सुवि मानवाः—सु० ॥

तेषां निर्हरणं कार्यं ततो मूर्ध्वविरेचनैः।

हरवशिप्रकृबीजैर्वा कांस्यनीलीसमायुतैः ॥२८॥

कृमिघ्नैरवपीडेक्ष्य मूत्रपिष्टैरुपाचरेत्।

पूतिमत्स्ययुतान् धूमान् कृमिघ्नांश्च प्रयोजयेत् ॥२९॥

इसके पीछे कृमियों को शिरोविरेचन से बाहर करना चाहिये। इसके लिये छोटा सुहाजना (कटुषहजन) के बीज, कांस्य नील मिलाकर नस्य देवे (या विडंग, मरिच, अपामार्ग आदि से देवे) कृमिनाशक द्रव्यों को मूत्र में पीसकर अवपीडन नस्य देवे। सड़ी मछली (सूखी मछली—जो नमक में रखकर बेची जाती है। एवं कृमिघ्न वस्तुओं से मिलाकर धूम देवे।

वि० मन्तव्य—उक्त उपायों से कृमि निकल जाते हैं और निम्नलिखित कृमिनाशक विविध अन्नो एवं पानों से उनकी उत्पत्ति रुक जाती है ॥२८, २९॥

भोजनानि कृमिघ्नानि पानानि विविधानि च।

कृमि प्रतिषेध में बताये धान्याम्ल आदि कृमिघ्न-नाना-प्रकार के भोजन, पान देवे।

सूर्यावर्तं विधातव्यं नस्यकर्मोदिभेषजम् ॥३०॥

भोजनं जाङ्गलप्रायं क्षीरान्नविकृतिघृतम्।

सूर्यावर्तं में नस्य आदि चिकित्सा करे। भोजन में मुख्यतः जांगलमसि, दूध से बने खाद्य पदार्थ, घृत देवे।

वि० मन्तव्य—निरामिषभोजियों के लिये—खीर, रबड़ी

आदि दुग्ध के पदार्थ देवे परन्तु वे अत्यन्त शीतल हों, यथा—खीर आदि को रात्रि में बनाकर ओस में घर दिया जाय अथवा जिलेबी को दूध अथवा गुलाब जल में भिगोकर ओस में घर दिया जाय और प्रातः खाया जाय ॥३०॥

तथाऽधमेदके व्याधौ प्राप्तमन्यरूचं यद्भवत् ॥३१॥

शिरीषमूलकफलैरवपीडोऽनयोर्हितः।

वंशमूलककपूरैरवपीडं प्रयोजयेत् ॥३२॥

अवपीडो हितश्चात्र वचामागधिकायुतः।

मधुकेनावपीडो वा मधुना सह संयुतः ॥३३॥

मनःशिलावपीडो वा मधुना चन्दनेन वा।

अर्धावमेदक में भी यही उपचार करे, तथा स्नेह, सिरावेध, अवपीडक आदि जो योग्य उपचार हो वह भी करे। सूर्यावर्त्त और अर्धावमेदक में—शिरीषमूल एवं फल से अवपीडन नस्य देवे। बांस की जड़ और कपूर इनसे अवपीडन नस्य दे। पिप्पली और बच से अवपीडन नस्य देवे। मुलेहटी का रस मधु मिलाकर अवपीडन रूप से देवे। मुलेहटी, मेनसिल और मधु से या मुलेहटी, चन्दन और मधु से अवपीडन नस्य दे ॥

तेषामन्ते हितं नस्यं सर्पिर्मधुरसान्वितम् ॥३४॥

अवपीडन नस्यों के पीछे काकोल्यादिगण के रस से सिद्ध घृत का नस्य देवे।

वि० मन्तव्य—अर्द्धावमेदक में भी शीतल आहार ही लाभप्रद होता है देखिये श्लो० ३० का वि० व० ॥३४॥

सारिवोत्पलकुष्ठानि मधुकं चाम्ल्येषितम्।

सपित्तैल्युतो लेपो द्वयोरपि सुखावहः ॥३५॥

एष एव प्रयोक्तव्यः शिरोरोगे कफात्मके।

सारिवा, कमल, कूठ, मुलेहटी इनको कांजी से पीसकर घी और तैल मिलाकर सूर्यावर्त्त, अर्धावमेदक में शिर पर लेप करे। कफजन्य शिरोरोग में भी यही उपचार करे ॥३५॥

अनन्तवाते कर्तव्यः सूर्यावर्तहरो विधिः ॥३६॥

सिरान्यधश्च कर्तव्योऽनन्तवातप्रशान्तये।

आहारश्च विद्यातव्यो वातपित्तविनाशनः ॥३७॥

मधुमस्तकसंयावघृतपूरैश्च भोजनम्।

अनन्तवात में सूर्यावर्त्त नाशक विधि करते। अनन्तवात की शान्ति के लिये सिरावेधविधि करनी चाहिये। वात-पित्त नाशक आहार देवे। इसके लिये मधु मस्तक (पूरनपोली या शहद की पोली जिसमें शहद ही मरा होता है), संयाव (लप्सी) घृतपूर (बेवर) देवे।

वि० मन्तव्य—अनन्तवात में भी वात पित्त विनाशक विधि करे यथा सूर्यावर्त्त एवं अर्द्धावमेदक में कहीं है ॥३६, ३७॥

क्षीरसर्पिः प्रशंसन्ति नस्ये पाने च शङ्के ॥३८॥